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मध्यकालीन भारतीय इतिहास में बहुत कुछ परिवर्तित करने की जरूरत है, न कि उसे सिलेबस से हटाने की !



मध्यकालीन भारतीय इतिहास में बहुत कुछ परिवर्तित करने की जरूरत है, न कि उसे सिलेबस से हटाने की !

वैचारिक पाखण्ड और नितान्त झूठा ऐतिहासिक लेखन रचने गढ़ने वाले वामपन्थी इतिहासकारों की कुत्सित स्थापनाएं : (सन्दर्भ ---- मध्यकालीन भारतीय इतिहास)

◆ राजपूत काल या पूर्व मध्यकाल जिसका ऐतिहासिक कालखण्ड ईस्वी 640 से 1200 तक है ---- को घनघोर अराजकता, पतन, दुर्व्यवस्था और अन्धकार काल(Dark Age) के रूप में चित्रित करना।

◆ पूर्व मध्यकाल के इस अत्यन्त महत्वपूर्ण कालखण्ड को सामन्ती व्यवस्था, ब्राह्मणवाद पुरोहितवाद से ग्रस्त प्रतिक्रियावादी सामाजिक धार्मिक संरचना वाला और बन्द अर्थव्यवस्था से युक्त पतित समाज मानना।

◆ शोषण, उत्पीड़न, भयानक अत्याचार की श्रृंखलाबद्ध कड़ियों को रचता, भाग्यवाद, नियतिवाद और स्थानीय अंधविश्वास, जड़ता, रूढ़ियों से घिरा समाज दर्शाना।

◆ जातियों उपजातियों में शतशः विभक्त और गतानुगतिक विश्वासों को ढोता एक मृत समाज दर्शाते हुए अनवरत यही चित्र खींचना।

◆ तुर्कों, मंगोलों, अफगानों, खिलजियों, पठानों जैसे असभ्य बर्बरों को नई सामाजिक धार्मिक क्रान्तिकारी व्यवस्था का उद्भावक घोषित करना।

◆ बर्बर इस्लाम के कट्टर मतवाद और नृशंस धर्मांतरण की प्रवृत्ति को छुपाकर उसके सामाजिक समानता, भ्रातृत्व, अमन चैन, मानवतावादी चेहरे को एकदम झूठ के रूप में प्रस्तुत करना।

◆ तुर्कों के माध्यम से स्थापित दिल्ली सल्तनत को एकदम भिन्न शासन प्रणाली, मुद्रा प्रणाली, सामाजिक बदलाव, आर्थिक परिवर्तन, प्रौद्योगिकी, तकनीकी क्रान्ति के युग का सूत्रपात करने वाला बतलाना। चांदी, सोने से जिसकी तिजोरी सदावर्त रही हो, उस भारत में असभ्य सुल्तान इल्तुतमिश और शिहाबुद्दीन गोर जैसे लुटेरे उचक्के मुद्रा प्रणाली के प्रवर्तक बताए गए।

◆ बर्बरों, असभ्यों को नगरीय क्रान्ति(मोहम्मद हबीब) और ग्रामीण क्रान्ति(अलाउद्दीन खिलजी द्वारा तुर्क प्रशासन को ग्रामीण क्षेत्र में प्रविष्ट कराकर अधिकतम आर्थिक उत्पीड़न करने की प्रवृत्ति को ग्रामीण क्रांति कहना इरफान हबीब जैसे बदमाश द्वारा) का अग्रदूत बतलाना।

◆ भारतीय साहित्य संस्कृति, शिल्प, स्थापत्य, कला, संगीत, सामाजिक समरसता का सूत्रपात करने वाला बतलाना।

◆ अत्याचारियों, धर्मांध शासकों को भारतीय सांस्कृतिक विरासत का संरक्षणकर्ता बताना।

◆ अलाउद्दीन खिलजी जैसे बर्बर, असभ्य धर्मांध व्यक्ति को नव आर्थिक नीति ---- बाजार नियन्त्रण नीति और अधिकतम कर दोहन प्रणाली लागू करने के एवज में मध्यकालीन इतिहास के भीतर समाजवादी अर्थशास्त्र को लागू करने वाला प्रथम सुल्तान बताना।

◆ व्यापारियों, विक्रेताओं से अन्न जबरिया खींचकर उसे राजकीय गोदाम में रखने तथा 4 लाख 75 हजार की विशाल सेना रखकर पूरे देश में इस्लामिक साम्राज्यवाद और धर्मांतरण की नीति जारी रखने के लिए सैन्य मशीनरी को तैनात करने व उसके भरण पोषण के लिए एक आततायी राजकीय नीति को लागू करने वाले निर्दयी शासक को आर्थिक क्षेत्र के भीतर "PDS प्रणाली" का प्रवर्तक कहकर इरफान हबीब जैसा दुष्ट इतिहासकार इस अलाउद्दीन खिलजी का महिमामंडन करता है।

◆ अलाउद्दीन खिलजी, गयासुद्दीन तुगलक, मोहम्मद तुगलक तथा फिरोज तुगलक को भू राजस्व नीति नियन्ता और कृषि अर्थशास्त्री के रूप में इन धूर्त इतिहासकारों द्वारा दर्शाया जाना।

◆ मोहम्मद बिन तुगलक तो एम एस स्वामीनाथन के हरित क्रान्ति वाली कृषि प्रणाली का आदि प्रवर्तक ठहरा दिया गया इस बदमाश इतिहासकार द्वारा। सस्यावर्तन पद्धति(रोटेशन क्रॉप्स) का पिता यह पागल सुल्तान कहा गया। इतना ही नही पगले की 5 सिरफिरी योजनाओं में राजधानी परिवर्तन और कराचिल अभियान को तो इन मूर्ख इतिहासकारों ने एक नवप्रवर्तनकारी कदम बता डाला। जबकि राजधानी परिवर्तन से  इस्लाम का प्रसार उत्तर भारत के साथ क्षिप्रतर वेग से दक्षिणी भारत में भी हुआ।

◆ फिरोज तुगलक को इन दोगले इतिहासकारों ने मॉडर्न इंजीनियरिंग, मॉडर्न इकोनॉमिक सिस्टम का प्रवर्तक --- कारखाना प्रणाली का विशेषज्, नहर संजाल प्रणाली का सूत्रधार ---- अपने एम विश्वेश्वरैया और सबसे बड़े टेक्नोक्रेट प्रधानमंत्री चाचा नेहरू का पितामह बता दिया। 

◆ फिरोज तुगलक को बड़के इतिहासकार सतीशचन्द्र और इरफान हबीब 'जनकल्याणकारी राज्य'(Welfare State) का आदि संचालक बतलाते हुए भावविभोर हो जाते हैं। अशोक, चन्द्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त के बाद 1000 बरसों के पश्चात भारत आनन्द और समृद्धि के उदधि में स्नानरत होकर हर्षनाद करता दिखता है।

◆ भारतीय संस्कृति और गंगा जमुनी सामासिक संस्कृति का कहना ही क्या ? कोई मन्दिर, तीर्थ स्थल, उपासना केन्द्र और हिन्दू शिक्षण संस्थान न होगा जो इस दौरान विमर्दित और ध्वस्त न हुआ हो तथा जिसके अवशेषों पर मस्जिद न खड़ी की गई हो। लेकिन इन सब चर्चाओं को छुपाकर इन बर्बर शासकों को बड़े बड़े नगरों, शहरों, कला केंद्रों को बसाते, उर्वर करते दर्शाया गया। शहरीकरण की प्रक्रिया और उसके विस्तार को तो इतनी बार इतने भद्दे ढंग से इन मक्कार इतिहासकारों ने रेखांकित किया है कि हंसी लगती है। ऐसे लगता है भारत ने कभी काशी, चम्पा, मथुरा, पाटलिपुत्र, वैशाली, प्रतिष्ठान, उज्जैन, पुष्कलावती कुछ देखा ही न था !

◆ मुगलों के बारे में तो कहना ही क्या ? चाचा नेहरू ही अकबर को भारतीय राष्ट्रवाद का पिता तथा अखिल भारतीय संघवाद का प्रवर्तक मानते हैं।

◆ नराधम औरंगजेब, कामुक जहांगीर, ऐय्याश शाहजहाँ, अफीमची हुमायूँ, धर्मांध बाबर इनका हीरो है। कोई इतना बड़ा चित्रकार है कि बस सोते जगते एक कूची फेर दे तो पिकासो मूत मारें। कभी ढंग से ठर्रा चढ़ा ले और अनारकली को बाहों में लेकर झमाझम कर दे तो सम्पूर्ण रीतिकाल पानी भरने लगे। एकाध इतना विद्वान था कि सायण, विद्यारण्य, शंकराचार्य बल्लभाचार्य सब उसके सम्मुख पानी भरते थे। वह लघु अकबर भारत के आध्यात्मिक ज्ञानपुंज को सम्पूर्ण ब्रह्मांड तक प्रसारित कराने का श्रेय पा सका।

                   【कितना लिखें साथियों ---- इन नीच अपघातक इतिहासकारों ने जितना चाहा, जैसा चाहा झूठ प्रपन्च रचा। बौद्धिक ज्ञान के रूप में इस अनीतिपूर्ण तथ्य/अर्द्धसत्य को परोसा।】


साभार
कुमार शिव जी

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