सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

सभ्यता और संस्कृति -काफी महत्त्वपूर्ण शब्द हैं ये दोनो । इन्हें समझने के बाद भारत के इतिहास को समझना कैसे आसान हो जाता है ।

सभ्यता और संस्कृति -काफी महत्त्वपूर्ण शब्द हैं ये दोनो । इन्हें समझने के बाद भारत के इतिहास को समझना आसान हो जाता है ।
        सभ्यता क्या है ? यह उस योग्यता का नाम है जिसकी बदौलत हम एक दूसरे से बातचीत करने में सक्षम होते है और यह योग्यता भाष्यता है। आपकी भाषायें जिन लोगों से पूर्णतः भिन्न होते थे , आप उन लोगों से बातचीत ही नहीं कर सकते  और इसतरह पास में रहकर भी उनसे दूर ही रहेते थे  । इसतरह सम्भाषी लोग सभ्य और असंभाषी असभ्य कहलाते थे। वह समूह जिसमें सम्भाषी  लोग इकट्ठे होकर आपस में  विचार विमर्श करते हैं ,सभा कहलाता था।
                    संभाष्य लोगों के बीच ही समिति नामक संगठन होता था। यह उन लोगों का समूह होता था जो स्मृतियों के नाम से प्रचलित प्राचीन सूक्तों को याद तो रखते ही थे ,उनके अर्थ भी समझाने  में सक्षम होते थे ।स्मृति  का अर्थ गेय सूक्त या छंद था ।इसका आंग्ल रूप मीटर (metre ) है। चूंकि,समय के साथ   भाषा के स्वरूप कुछ बदल जाते हैं ,इसलिए नई पीढ़ी को उन्हें समझने में दिक्कत होती थी ।इसीलिए समिति का गठन किया जाता था । इसतरह सभ्यता और समिति संभाष्यता के ही अवयव थे। 
                  लिपि के प्रचार होने के पूर्व तक समिति को समाज में सर्वाधिक महत्त्व प्राप्त था , क्योंकि समिति के सदस्य ही स्मृतियों को याद रखते थे और पूरा समाज उनसे सुनकर अपनी परम्परा को याद रखते थे   । लेकिन लिपि के विकास के साथ मौखिक परम्परा का महत्त्व घटने लगा ।बावजूद लिपि को भाषा का सही सही अंकन करने की शक्ति प्राप्त करने में काफी समय लगा ।देवनागरी लिपि के जन्म के पूर्व किसी  लिपि को वैदिक ध्वनियों को व्यक्त करने के पूर्ण  योग्य नहीं माना जाता था ।
                     कच और देवयानी की कथा के माध्यम से भाषा और लिपि के बीच की दूरी को ही अभिव्यक्त किया गया था। कच यानी sketcher यानी अक्षर । देवयानी  विद्यावाणी यानी वाणी का बीज ।  शुक्राचार्य द्वारा सृजित विद्यावाणी  बृहस्पति पुत्र कच से सम्बंध जोड़ने में विफल रही, क्योंकि यह ऋग्वैदिक ध्वनियों को अंकित करने में सक्षम नहीं थी  ।
                      बृहस्पति  से आप क्या समझते हैं ? बन्धु,यह शब्द वृष्टिपदी  का अपभ्रंश है और  वर्षास्थली  वर्षाभूमि,भारतवर्ष  का पर्याय था । भारत वर्ष में गुरुजनों की सलाह को महत्त्वपूर्ण माना जाता था। गुरु का अर्थ प्रायः शिक्षक समझा जाता है ,पर यह लघु का विलोम है और  इसका वास्तविक अर्थ सिर्फ बड़ा है ।गुरुजन का  अर्थ है वृद्ध जन । वृद्ध और परिपक्व लोगों  के समूह को ही  संस्कृत में नासत्य और अंग्रेजी में सिनेट(senate) कहा था था । सीनेट के सदस्य ही गुरुगण बृहस्पति या सिर्फ बृहस्पति कहलाते थे। गुरुगण के प्रधान को गुरु गणेश कहते थे  अब इसी को बिगाडकर गोबर गणेश कहा जा रहा है।  बंधुगण,गुरु का ही पर्याय राजा शब्द है ।इसे अंग्रेजी के लार्ज (large ) शब्द से समझा जा सकता है। इसतरह गुरु गणेश ही राजेंद्र थे यानी प्रधान इंद्र। 
     
                     नासत्य  की  ही सलाह पर  चित्रकारों  का एक दल  शुक्राचार्य से ' स्वरन्  बीजनी  >संजीवनी  ' सीखने के लिए भेजा गया था। स्वरन् बीजनी यानी स्वर वर्णमाला। काफी मेहनत करके बृहस्पति द्वारा भेजे गए चित्रकारों ने फारसी वर्णमाला सीखी ।,पर उन्हें निराशा हुई यह देखकर कि यह वर्णमाला देववाणी को अंकित करने में सक्षम नहीं थे ।  
 सभा ,समिति और नासत्य नामक संस्थाओं के जिक्र सिर्फ ऋग्वेद में मिलते हैं ।
                       संस्कृति  और संस्कार शब्द मूलतः signs of script है ।बच्चों को संस्कार  देने का अर्थ था उन्हें वर्णमाला का ज्ञान देना। सोलह संस्कार सोलह स्वरों के प्रतीक थे। तथाकथित व्यंजनों  को  उच्चारण के योग्य बनाना ही  उन्हें संस्कार देना कहलाता था। इसीतरह बच्चों को जीने  योग्य बनाना यानी व्यावहारिक बनाना ही   उन्हें संस्कार देना कहलाता था। अक्षरज्ञान ही बच्चे को व्यावहारिक बना सकते हैं -ऐसी मान्यता थी । कहा गया है - माता शत्रु: पिता वैरी , येन बालो न पाठितः
    न शोभते सभा मध्ये ,हंस मध्ये  बको यथा
    सभा के बीच निरक्षर व्यक्ति वैसे ही होते हैं जैसे हंसों के बीच बगुला ।इस स्थिति के जिम्मेवार तो माता पिता ही होते हैं ।अतः मातापिता को अपठित संतान का शत्रु माना जाना चाहिए ।
  पुनः ,
   न चौरहार्यं न च राजहार्यं  न भ्रातृ भाज्यं न च भारकारि
    व्यये कृते  वर्धति एव  नित्यं  विद्या धनं सर्वधने प्रधानम् 
    अर्थात् विद्या वह धन है जिसे  न चोर चुरा सकता है , न राजा छीन सकता है , न भाई      बांट सकता है ।यह वैसा धन है जो बांटने से बढ़ता है ।इसी से इसे   सभी धनों में श्रेष्ठ माना जाता  है।      
          उपर्युक्त श्लोकों  के ही  आलोक में   मातापिता का दर्जा अक्षरों की सीख देनेवालों से निम्नतर माना जाने लगा।,जो कि सनातन धर्म के आदर्शों के प्रतिकूल था। 
          

टिप्पणियाँ