सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

जातिवाद खत्म करने के नाम पर हिंदूओं के साथ सियासी छल कैसे किया जा रहा है इसके पीछे के षड़यंत्र को समझना क्यों आवश्यक है ?

ज्योतिबा फुले जी के दादा जी को बाजीराव पेशवा ने 100 बीघे जमीन दान  में दी थी ।यह जमीन करमुक्त थी । डॉक्टर अंबेडकर जी को एक ब्राह्मण शिक्षक ने पढ़ने में पूरी मदद की थी ।बावजूद इनलोगों ने जातीय विद्वेष को प्रश्रय दिया ,साथ ही  हिंदु धर्म को त्याज्य बताया  ।निश्चय ही  इनके विद्रोह के पीछे अंग्रेजों की भूमिका रही थी ।अंग्रेज  ब्राह्मणों को अलग थलग  कर पस्त कर देना चाहते थे , क्योंकि ब्रिटिश सत्ता के प्रति मुखर विरोध का नेतृत्व ब्राह्मण ही कर रहे थे ।
        हिंदु धर्म में बुराइयां हैं ,पर वह तो सभी धर्मों में हैं ।अंग्रेज भी तो प्रथम श्रेणी की बोगी में भारतीयों को यात्रा नहीं करने देते थे ।ब्रिटेन के होटल और रेस्टुरेंट में भारतीयों का प्रवेश वर्जित था ।आज ऐसा है क्या ?अंग्रेजों ने सुधार किया ।
                 वर्ण व्यवस्था में सबसे ज्यादा  आक्रोश शूद्र के प्रति किए जाने वाले आचरण के निर्देशों  को पढ़कर होता है । लेकिन निरुक्त के अनुसार तो वर्ण तीन ही थे और ये जातिवाचक नहीं थे ।
                      शूद्र शब्द निश्चित रूप से शत्रु का वाचक था । शत्रुओं  के प्रति नफरत तो हर देश और समुदाय में होती है ।
                           शूद्र शब्द के अंतर्गत कुछ जातियों की सूची जोड़कर फूट डालने की  साजिश की गई थी ।यह बौद्ध शासकों के  समय शुरू हुआ और मुगलकाल में परवान चढ़ा ।
                              बौद्धों के बारे में तरह तरह की भ्रांतियां हैं ।उन्हें सत्य और अहिंसा का पुजारी माना जाता है ।लेकिन तिब्बत ,बर्मा आदि तमाम देशों के बौद्ध बीफ (गोमांस) भी खाते हैं , पोर्क (सूअर का मांस ) भी ।उनके झूठ बोलने का प्रमाण यह है कि अश्वघोष (बौद्ध ) और पुष्पदंत (जैन ) जैसे कवियों ने श्रीकृष्ण और श्रीराम को भी बौद्ध धर्म ग्रहण करते हुए बताया है ।मुझे पूर्ण विश्वास है कि   चंद्रगुप्त मौर्य के जैन और सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने की बात भी झूठ ही है ।
                                 अब कहा जा रहा है कि बौद्धों ने  वैदिक धर्म की हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई थी ।हद है यार !बीफ और पोर्क खाने वाला हिंसा के खिलाफ आवाज क्यों उठाएगा ?
                                    कोई इस्लाम के गुण गा रहा है ,तो कोई क्रिश्चियन का ।गाते रही ,लेकिन यह राह विनाश की है । यदि  आप सबों को लगता है कि हिंदु धर्म के खिलाफ जहर उगलते रहने से तुम  भारत के सत्ताधीश बने रहोगे ,तो यह भ्रम है। फूट गुलामी पैदा करती है , सत्ता नहीं ।
                                       मुहम्मद पैगम्बर ने इस्लाम ग्रहण करने वाले  गैर सैयदों  को अंसार कहा था जिसका सही शब्द annexure है। ऋषियों ने उन सबों को पौनिया कहा जिन्होंने उनके धर्म को मान लिया। पौनिया का  अंग्रेजी  रूप कंपेनियन (companion) है जिसका अर्थ साथी है ।
                                          बौद्धों ने धर्म परिवर्तन को बाध्य करने के लिए पौनिया समुदाय को शूद्र कहकर जलील किया । निश्चय ही ऋषियों के पौनिया बौद्धों  और मुसलमानों के शत्रु थे। आज शत्रु ही मित्र बन गए हैं। इसे वाशिंगटन सिंड्रोम कहते हैं ।
                               जय श्रीकृष्ण

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