सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

हमारे राष्ट्र के ऐतिहासिक जीवन बोध तथा इतिहास लेखन के साथ नेहरू, इन्दिरा की कांग्रेस सरकार ने कैसे खिलवाड़ करने का प्रयास किया ?

आपको अंदाजा भी न होगा कि कितने सुनियोजित और कपटपूर्ण तरीके से हमारे राष्ट्र के ऐतिहासिक जीवन बोध तथा इतिहास लेखन को नेहरू, इन्दिरा के कांग्रेस शासनकाल में मनमाना रूप दिया गया !!

इस सच का खुलासा अरुण शौरी, राज थापर, सीताराम गोयल, शंकर शरण तथा तरुण विजय आदि ने बहुत विस्तार के साथ किया है।

सैयद नुरुल हसन के नेतृत्व में वामपंथी लेखकों की जमात जिसमें प्रोफेसर एस गोपाल(पहले एक प्रशासक थे, बाद में इन्दिरा जी की कृपा से JNU में प्रोफेसर बना दिए गए.), प्रोफेसर रोमिला थापर, राम शरण शर्मा, विपन चन्द्र, सतीशचंद्र, हरवंश मुखिया आदि को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, भारतीय इतिहास कांग्रेस, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, राष्ट्रीय एकता परिषद, NCERT जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संस्थानों में बिठलाकर भारत के इतिहास का विकृतीकरण कराया गया।

उस समय के समादृत इतिहासकार -----

(सर जी एस सरदेसाई
सर यदुनाथ सरकार
प्रोफेसर आर सी मजूमदार
प्रोफेसर के एम panikkar
प्रोफेसर किशोरी शरण लाल
सीताराम गोयल
प्रोफेसर के ए नीलकंठ शास्त्री)

के निष्पक्ष, गंभीर, तथ्यपरक ऐतिहासिक विश्लेषण को नकारते हुए इनमें से कइयों का मजाक उड़ाया गया।

जी एस सरदेसाई तथा यदुनाथ सरकार जैसे प्रतिष्ठित इतिहासकारों का ---- जुगाड़ू प्रोफेसर एस गोपाल ने "फैक्टोग्राफर" कहकर उपहास उड़ाया ! 

जबकि इन दोनों विद्वत इतिहासकारों के सम्मुख परफेसर एस गोपाल की हैसियत जिसे देखना जानना हो, वह 1973 ईस्वी में इसके द्वारा तैयार किए गए इतिहास प्रपत्र (कालपत्र) जो इन्दिरा गांधी की भड़ैती और चाटुकारिता का दयनीय नमूना है, पढ़कर देख ले ...

सत्तर अस्सी के दशक में भारतीय इतिहास लेखन के मिथ्याकरण को अंजाम देने में तत्पर नुरुल हसन की टीम के इस सच का खुलासा सीताराम गोयल की अति प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति स्टोरी ऑफ इस्लामिक इंपीरियलिज्म इन इण्डिया (1982), तथा प्रोफेसर के एस लाल के प्रसिद्ध लेख "इतिहास को दिया मनमाना मोड़" (वामपंथी कलुष कथा, संपादक तरुण विजय, 2002 ) में हुआ है।

और विस्तार से इसे आप शंकर शरण की प्रसिद्ध कृति ---- भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन पुस्तक , अरुण शौरी की चर्चित किताब द एमिनेंट हिस्टोरियंस --- देयर टेक्नालॉजी, देयर लाइन, देयर फ्रॉड (1998) तथा तरुण विजय द्वारा सम्पादित कृति "वामपंथी, कलुष कथा (दिल्ली, 2002) का अध्ययन करके जान सकते हैं।
बल्कि सबको इनका अध्ययन करना भी चाहिए।

1982 के राष्ट्रीय एकता परिषद तथा भारतीय इतिहास कांग्रेस के मंच से जो शैक्षिक निर्देश इतिहास लेखन के लिए दिए गए, उसे प्रोफेसर के एस लाल के शब्दों में सुनिए :

[ "मुसलमानों द्वारा जबरन कराए गए हिन्दुओं के धर्मांतरण का कहीं उल्लेख न किया जाए ; कही यह न लिखा जाए कि मन्दिर तोड़े गए और (वहां) मस्जिदें बनाई गई। ये निर्देश हर राज्य में पहुंचाए गए और उसके आधार पर पुस्तकें लिखी जाने लगीं। ये किताबें बिपन चन्द्र, सतीश चन्द्र, आर एस शर्मा और रोमिला थापर ने लिखी.... जब ये दिशा-निर्देश जगह-जगह पहुंचे तो वहां इनका विरोध शुरू हुआ, प्रदर्शन हुआ और इनके पक्ष में प्रचार भी खूब हुआ।"]

असलियत इतनी कुत्सित और घिनौनी है कि शंकर शरण की पुस्तक में निबद्ध "भारतीय मार्क्सवादियों के दुराग्रह" अध्याय पढ़ लीजिए, तथ्यवार, सन्दर्भ और घटनावार इस कलंक गाथा को देख सकेंगे आप सब....

वामपंथियों के इस बौद्धिक जिहाद के चलते राष्ट्रीय जीवन और संस्कृति कितनी हताहत हुई है, इन लेखकों को पढ़कर जानिए सभी लोग...

अक्षम्य अपराध किया है इन धूर्तों ने भारतीय राष्ट्र और उसकी चिन्तन धारा के साथ !

साभार
कुमार शिव जी 

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