सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

2014 के पहले छह, सात ऐतिहासिक तिथियां व अविस्मरणीय घटनाएं ऐसी हैं जिनके द्वारा हमारी जातीय नियति तय हुई है। इसे ठीक से जानने की जरूरत है :

        2014 के पहले छह, सात ऐतिहासिक तिथियां व अविस्मरणीय घटनाएं ऐसी हैं जिनके द्वारा हमारी जातीय नियति तय हुई है। इसे ठीक से जानने की जरूरत है : 

◆ १) 712 ईस्वी : सिंध पर अरब आक्रमण और इस्लाम का भारतीय मनीषा व हिन्दू जीवन धरातल में प्रवेश। हालांकि अरबों व इस्लाम के आक्रामक साम्राज्यवादी चरित्र को सुयोग्य हिन्दू शासकों की प्रबल प्रतिरोधक क्षमता ने 300 वर्षों तक निस्तेज किये रखा।

◆ २) 1192 ईस्वी में पुनः तुर्क सेल्जुक गोर सत्ता के अन्तर्गत इस्लाम धर्म का राजनीतिक शक्ति के रूप में उत्थान व तत्पश्चात हिन्दुओं के राजनीतिक, सामाजिक सांस्कृतिक वैचारिक जीवन का अनवरत श्रीहीन होते जाना।

इस्लामीकरण की यह प्रक्रिया हिन्दुत्व के जीवन पर मर्माघात थी।

यह 1192 ईस्वी से लेकर बेरोकटोक 1757 ईस्वी तक चली। 600 वर्षों तक अबाध रूप से इस्लाम का प्रसार जारी रहा।

◆ ३) इस दौरान हिन्दू जातीय उत्थान व जातीय आत्मगौरव की प्रतिक्रिया हुई जिसकी श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति मराठा स्वराज और हिन्दू पद पादशाही के रूप में छत्रपति शिवाजी व पेशवाओं के माध्यम से हुई। 1674 ईस्वी से लेकर 1802 ईस्वी तक यह हिन्दू जागरण एक सकारात्मक प्रबल उत्प्रेरक बल के रूप में हमारे बीच मौजूद रहा।

यह कालखण्ड (1674 --- 1802 ) बहुत महत्वपूर्ण है हमारे ऐतिहासिक यात्रा को समझने के लिए।

◆ ४) 1757 ईस्वी में यूरोपीय शक्तियों में से एक ब्रिटिशर्स ने ईसाइयत और यूरोपीय साम्राज्यवादी अभियान की सफल आधारशिला हमारी भूमि पर सम्पन्न की।

यह हिन्दू जीवन धरातल और जातीय अवबोध के आत्मकेन्द्र में दूसरा सबसे बड़ा मर्माघात था।

यहां से यूरोपीय प्रबोधन, वैज्ञानिक औद्योगिक चेतना व साम्राज्यवादी औपनिवेशिक क्रियाविधि ने हमारे जातीय स्वत्व का अपहरण ही कर डाला। 

ढंग से देखा जाए तो भारतीय जातीय मनीषा का सर्वाधिक घातक, बेध्य व त्रासद अध्याय यहां से आरम्भ होता है :

1757 ईस्वी से लेकर 1947 ईस्वी के दौरान।

बंगाल नवजागरण, धर्म समाज सुधार आंदोलन, औपनिवेशिक राजनीतिक संवैधानिक सुधार व विभिन्न अधिनियमों की सिलसिलेवार कड़ियाँ ---- 1773, 1784, 1791, 1813, 1833, 1844, 1858, 1861, 1885, 1892, 1906, 1909, 1916, 1919, 1927, 1931, 1932, 1935, 1942, 1945, 1946, 1947, 26 नवम्बर 1949 ----- ये सब एक ही धागे में पिरोई हुई लड़ियाँ हैं जिन्हें अलग करके नहीं देख सकते हम।

◆ ५) फिर आती है स्वाधीनता आन्दोलन की नियति तिथि : 15 अगस्त 1947 ईस्वी।

शायद ही दुनिया मे कोई स्वतन्त्रता आंदोलन ऐसा हो जिसकी इतनी विद्रूप, बिडंबनामय परिणति हुई हो ---- आजादी और विभाजन के त्रासद अध्याय का वीभत्स ऐतिहासिक अंकन।

712 ईस्वी में अरब इस्लामिक सत्ता सिन्धु राज्य पर मुहम्मद बिन कासिम के हाथों भौतिक आकार लेकर आयी थी और 1235 वर्ष पश्चात इसी धर्म के एक शैतान, नराधम के हाथों उसी क्षेत्र में हमारी मातृभूमि की देह को फाड़ते हुए हमारा अंग भंग कर दिया गया।

यह था 1000 वर्षों का गंगा जमुनी संगम व मेलमिलापी समागम सत्संग और उसकी हास्यास्पद परिणति।

1947 ईस्वी के बाद भी धर्मनिरपेक्षता और भीषण छल प्रपन्च के सहारे यही गफलत आगे बढ़ायी गयी।

◆ ६) स्वाधीनता के बाद हमने यूरोपीय ईसाइयत की आधुनिक वैज्ञानिक चिन्तन पद्धति, अनुवादजीवी अवधारणात्मक वशीकरण की प्रक्रिया, लिजलिजी फूहड़ कुत्सित आधुनिक शिक्षा वैचारिकी आदि को बेशर्मी से अपनाया तथा यान्त्रिक तरीके से बेरोकटोक उसी औपनिवेशिक ढाँचे के भीतर उपलब्ध राजनीतिक प्रशासनिक मशीनरी, संवैधानिक प्राविधानों के तहत सतत भाव से गतिमान किये रखा।

यह प्रक्रिया सेक्युलरिज्म, धर्मनिरपेक्षता, गंगा जमुनी संस्कृति के फूहड़ वैचारिक ऊर्ध्व गमन और विकृत ऐतिहासिक लेखन व कुत्सित बौद्धिक संस्थागत अभियानों के तहत चलती आयी है।

इसमें बताइए ---- हिन्दू अस्मिता, हिन्दू जातीय आत्मबिम्ब, हिन्दू रूपक-बोध और हिन्दू सांस्कृतिक उपादान हैं कहाँ ??

इसी की शुरुआत 2014 ईस्वी से हुई है ----- इसकी नींव 6 जून 1674 ईस्वी में छत्रपति शिवाजी के हिन्दवी स्वराज के प्रस्थान बिन्दु से आरम्भ हुई और इसका चरमोत्कर्ष 1757 ईस्वी में दिल्ली सिंहासन पर रघुनाथ राव राघोवा के विजय दर्प के साथ पूरा हुआ था। फिर इसमें एक लम्बा व्यवधान आया और हमारा जातीय फलक अन्धकार के गहरे दलदल में भटकने लगा।

यह भटकते भटकते उस नरक यात्रा तक गया जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती !!

26 मई 2014 की तिथि इसीलिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण व अविस्मरणीय ऐतिहासिक दिवस की सूचक है।

इस तिथि के बाद से ------ [I N D I A] व [हिन् दु स्तान] जो बर्बर विजेताओं द्वारा हिन्दुओं को पददलित किये जाने के बाद दिए गए स्वत्वहीन विशेषण व पौरुषहीन राष्ट्रीयता-सूचक नाम हैं के बजाय ----- 【"भारतवर्ष"】 का अक्षुण्ण जातीय मानचित्र निर्मित होना आरम्भ हुआ है।

वही मानचित्र जिसे सिन्धु सरिता के तट पर वैदिक मंत्रोच्चार और आर्ष उद्घोष के साथ प्रकट किया गया था तथा 5000 वर्षों की अविराम ऐतिहासिक यात्रा के भीतर जिसने न जाने कितने रूप रंग कलेवर ग्रहण किये लेकिन इसकी मूलधारा सनातन, शाश्वत व अविच्छिन्न रही.....


      साभार
   कुमार शिव 

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