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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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पोस्ट का टाइटल देख कर कई मित्रों के मन में यह प्रश्न जरुर उठेगा कि यह क्या बेहूदा बात है की बाढ़ अच्छी है | पहले जब बाढ़ आती थी तो वह जल के साथ पहाड़ों की उपजाऊ मिटटी भी साथ में लेकर आती थी | बाढ़ का पानी सारे क्षेत्र में एकसमान रूप से खड़ा हो जाता था 15 -20 दिनों बाद जब पानी उतरता था तो एक तो भूमिगत जल रिचार्ज हो जाता था दूसरा पहाड़ों की उपजाऊ मिटटी खेतों में रह जाती थी फिर जब इस पर फसल पैदा होती थी उसको ना तो किसी गंदे यूरिया की जरूरत होती थी ना ही किसी अन्य रासायनिक उर्वरक की | लोगो छोटे छोटे गावं में रहते थे यह गावं अक्सर किसी उच्चें स्थान पर बसे होते थे | बाढ़ का पानी गावं को कोई नुकसान नहीं करता था १५-२० दिनों की बात होती थी | सब घरों में सनातन HOME स्टोरेज होती थी साल भर का अनाज घरों में ही स्टोर होता था | कोई चिल पों नहीं होती थी | सारा काम प्रकृति से फ्री में करवाया जाता था | प्रकृति और इंसान का पूर्ण सामजस्य था | मनुष्य ने अपने आप को प्रकृति के अनुसार ढाला हुआ था | यह था बाढ़ को अपने लाभ के लिए प्रयोग करने की सनातन व्यवस्था | जोकि प्रकृति की अनुरूप थी | क्योकि सनातन सभी जीव जंतुओं , पेड़ ,जंगल ,जानवरों ,नदिओं ,पहाड़ों आदि को मनुष्य के बराबर मानता है इसलिए सनातन व्यवस्थाओं के संरचना इस प्रकार की गयी है मनुष्य के द्वारा किसी अन्य के अधिकार का अतिक्रमण ना हो | इसलिए सनातन व्यवस्थाएं कभी प्रकृति से छेदछाड नहीं करती | हमारे यहाँ चूहा पकड़ने के लिए भी पिंजरा लगाया जाता है | चूहे को भी मारा नहीं जाता | यह सनातन व्यवस्था की खूबसूरती है की वह चूहे के RIGHT TO LIVE के सिद्धांत को पूर्ण सम्मान देती है | मच्छरदानी के पीछे भी यही theory काम करती है | इन्ही सनातन व्यवस्थाओं ने भारत को सन 1700 तक विश्व का नंबर एक अमीर देश बना कर रखा
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इसके बाद आया अंग्रेजों का दौर | अंग्रेजों के आगमन के साथ पूंजीवादी व्यवस्थों का दौर शुरू हुआ | कहाँ तो सनातन व्यवस्थाये प्रकृति के अनुरूप बनायीं जाती थी | अब अंग्रेजों ने प्रकृति को अपने अनुसार ढलना शुरू किया ताकि अधिक से अधिक मुनाफा कुछ चंद पूंजीपतियो तक पहुचाया जा सके | अंग्रेजों ने भारत में बाधों का निर्माण शुरू करवाया | जिसमे नदियों के जल को नियंत्रण कर करके बाढ़ को लगभग काबू कर लिया | अब बाढ़ के साथ जो उपजाऊ मिटटी बहकर आती थी वह बाधों के पीछे जमा होनी शुरू हो गयी | खेत में जो सनातन प्राकृतिक व्यवस्था के माध्यम से अपने आप उर्वरक पड जाते थे उनकी स्थान पर किसानो को हरित क्रांति , मॉडर्न खेती के नाम पर रासायनिक उर्वरक चिपकाये गए | अब यह रासयनिक उर्वरक कौन बनता है ,पूंजीवादी कम्पनीज | किसान गरीब और पूंजीवादी कम्पनीज आमीर होने लगी | यो कम प्रकृति फ्री में करती थी अब पैसे खर्च कर भी नहीं होता | पूंजीवादी इनफार्मेशन warfare टीवी समाचार पत्रों ने इन बांधों , हरित क्रांति , रासयनिक उर्वरको को विकास की चासनी में डुबो कर ऐसे पेश किया की जैसे पहले भारत के लोग भूखे मरते हों | अंग्रेजों के आने से पहले भारत कुल विश्व के कुल उत्पादन का लगभग 25 % हिस्सा रखता था | जो अंग्रेजो द्वारा भारत का विकास करने के करण 1950 में केवल 4% रह गया | नदियों पर बांध बन गए वह अब छोटे नालों जैसे दिखती हैं | बांधो के निर्माण के करण भारत के जैव विवधता समाप्त हो गयी | जिस सनातन भारत में कभी अकाल नाम का शब्द भी नहीं सुना था उसकी खेती का अंग्रेजों ने इतना विकास किया की वहां पर हर साल अकाल पड़ने लगे |बंगाल का अकाल इसका एक उधाहरण है | 1947 के बाद भी यही तंत्र चल रहा है और देश बरबाद हो रहा है जिसकों विकास ,developent ,growth ,gdp आदि भारी भरकम शब्दों की मीठी चाशनी में डुबोकर बेचा जा रहा है |
इस तरह हमने देखा कि कैसे पूंजीवादी व्यवस्था जो की अंग्रेजों की देन है | उसका मुख्य उदेश्य कुदरत को आपने अनुसार ढालना है | जबकि सनातन व्यवस्था में आपने आप को कुदरत के अनुसार ढालना है | इसलिए हमें नदियों पर नियन्त्रण करने के स्थान पर अपने आप पर नियंत्रण करना चहिये
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