सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

बौद्ध दर्शन एवं वैदिक दर्शन में क्या समानता है आइए जानें

वेदसम्मत षड्दर्शनों में से सबसे प्रभावी दर्शन सांख्य रहा। 
बौद्ध दर्शनों में सबसे प्रभावी महायानियों का दर्शन रहा। 
सांख्य दर्शन अनीश्वरवादी है और महायान दर्शन ईश्वरवादी है। 

नागार्जुन ने माध्यमिक शून्यवाद अपनाया, उन्होंने परमतत्व को शून्य तो बताया पर वह शून्य आत्यंतिक शून्य अथवा एबसलूट ज़ीरो नहीं था। वह व्याख्या की सीमा से बाहर होने से शून्य था। 
आदि शंकर ने भी ब्रह्म को शून्य बताया और वह शून्य भी परमशून्य या एबसलूट जीरो नहीं था। उन्होंने भी यह शून्य उसके अनिर्वचनीय होने से कहा अर्थात् व्याख्याविहीन होने से।
अंतर बस इतना था नागार्जुन ने अपने उस शून्य को न सत् न असत् कहा लेकिन शंकराचार्य ने अपने शून्य को एकमात्र सत् कहा। इसके अतिरिक्त कोई भेद नहीं। 

आचार्य विज्ञान भिक्षु अद्वैत के बहुत बड़े विद्वान हुए उन्होंने आदि शंकर को जब प्रच्छन्न बौद्ध अर्थात् छिपा हुआ बौद्ध कहा तो इस पर आश्चर्य कैसा?? वैसे भी शंकर ने वास्तव में हीनयानियों को परास्त किया था, महायान से कोई विशेष विवाद की स्थिति बनती नहीं दिखती। 

न्याय दर्शन के टीका में महर्षि वात्स्यायन ने जिस शून्यवाद का भयंकर खंडन किया था वह वास्तव में आत्यंतिक शून्य का विरोध था। 
आज से आठ सौ वर्ष पहले अचानक गोरखपंथी नाथ संप्रदाय का ऐसा आविर्भाव हुआ कि सारे मत मैदान छोड़कर ग़ायब होने लगे। गोरख ने कहा कि बसती न सून्यम, सून्यम न बसती, तो इसका स्पष्ट अर्थ यहीं था कि नागार्जुन ने जो अपने हृदय सूत्र में कहा था कि वह न रूपविहीन हैं और न रूपवान, उसी का दोहराव था। आगे गोरख ने कहा अगम अगोचर ऐसा अर्थात जो है तो मगर इंद्रियों के अनुभव से भिन्न है अर्थात् अनिर्वचनीय। 



अलग अलग दर्शन के नाम पर लोग लड़ रहे हैं लेकिन यह लड़ाई तभी तक है जब तक आप दर्शन में ऊपर ऊपर तैर रहे हैं। जब आप एक बार आप गहरा गोता लगाते हैं, उस परमतत्व को महसूस कर लेते हैं तो ये अलग अलग नाम भेद वाले सारे दर्शन एक ही नज़र आते हैं। 

आज बौद्ध दर्शन, जोग परम्परा एवं वैदिक दर्शन के बीच जो लोग द्वन्द पैदा कर रहे हैं अथवा यह दिखावा कर रहे हैं मानों अवैदिक मत कुछ अलग हैं और वैदिक मत कुछ अलग, या वैदिक मत अकेले आस्तिक हैं और बौद्ध मत आदि नास्तिक, वह सब वास्तव में कभी दर्शन पढ़े ही नहीं और उस परमतत्व को तो कभी एक क्षण मात्र के लिए महसूस भी नहीं किया। जिस क्षण वह परमतत्व अपने आत्मा को छू भर लेता है सब नामभेद, संज्ञाभेद एक क्षण में ध्वस्त हो जाते हैं। सब भारतीय दर्शन अपने लगने लगते हैं। 

डॉ भूपेन्द्र सिंह
लोकसंस्कृति विज्ञानी

टिप्पणियाँ

  1. मैं पूर्णतः असहमत हूं। इन्होंने मात्र एकपक्ष बताकर साम्यता स्थापित करने का असफल प्रयास किया है। तृपटिकों के ज्ञान की बात करिए– ??? लेखक तृपटिकों से भागते हुए दिख रहे हैं

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  2. उन्हें SANATAN samiksha LIVE पर आकर ज्ञान फैलाना चाहिए

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