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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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छटी बात - ज्ञान में ज्ञातृत्व और ज्ञेयत्वका भेद भी औपाधिक ही है । देश काल और वस्तु भेद का निषेध हों जाने पर ज्ञान से पृथक ज्ञेयकी उपस्थित अपने आप ही कट जाती है । ज्ञेय के बिना ज्ञातत्व के व्यवहारिक सिद्वि नहीं हो सकती । ज्ञेय और ज्ञाता दोनों ही दोनों ही एक दूसरे की अपेक्षा रखते हैं : परन्तु ज्ञान दोनों की , दोनों में से किसी एक कि अथवा और किसी अन्य की अपेक्षा रखे बिना स्व़त सिद्ध है । यदि ज्ञेयरूप विषय भी ज्ञान से पूर्व सिद्ध है , ऐसा माना जाय तो अननुभूत होने कारण वह केवल कल्पना होगी । अनुभव बिना पदार्थ की सिद्धि नहीं हो सकती। यह जो भिन्न भिन्न विषय और इनकी समष्टि ज्ञेयरुप से पृथक प्रतीत होती है , वह क्या ज्ञान से बहिर्देश में है अथवा ज्ञान के अन्तर्देश में ? पहली बात तो यह है कि ज्ञान में बहिर्देश और अन्तर्देश कल्पना नितांत असंगत है । दूसरी यह कि ज्ञेय विषयों को बहिर्देश में मानने पर उसके साथ ज्ञान का कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता । यदि अन्तदेश की कल्पना नितांत असंगत है । दूसरी यह ज्ञेय विषयों को बहिदेश में मानने पर उसके साथ ज्ञान का कोई संबंध नहीं हो सकता है यदि अन्तदेश ही माने तो ज्ञान व्यापक व्याप्य भाव सम्बन्ध स्वीकार करना पड़ेगा। यह सम्बन्ध भी ज्ञान को विषय का उपादान कारण माने सम्भव नहीं है । तब क्या ज्ञान परिणाम को प्राप्त होकर विषय का रूप ग्रहण करता है ? ऐसी स्थिति में परिणाम की एक धारा अथवा क्रम स्वीकार करना पड़ेगा । यह बात तभी स्वीकार की जा सकती हैं, जब काल की क्षणिकता का आरोप उसके प्रकाशक ज्ञान पर किया जाय , परंतु अध्यस्तके गुण दोष अधिष्ठान स्पर्श भी नहीं कर सकते । आदि रहित अन्य रहित ज्ञान में विषयों की उपस्थिति के लिए एक क्षण अथवा भिन्न क्षण ही नहीं । यह भी एक प्रश्न है कि विषय सप्पूर्ण ज्ञान में है अथवा ज्ञान के एक अंश में ज्ञान में अंशता पूर्णतः आदि तो कल्पित है । फिर यदि ज्ञान का परिणाम माने भी तो क्या उसका कोई आकार है जो दूध से दही के समान रुपान्तरित होगा और क्या वह रुपान्तर भी ज्ञानस्वरूप नहीं होगा ? ऐसी स्थिति में प्रथम रूप द्वितीय रूप का भेद विचार हीनो को द्वारा कल्पित एवं केवल विवर्त मात्रा होगा । ज्ञेय विषय का निराकरण हो जाने पर ज्ञातृत्वकी कल्पना का कोई कारण ही नहीं है ।
सातवीं बात
ज्ञान हेतुफलात्मक नहीं है ज्ञान की उत्पत्ति स्वीकार करने पर उसके प्राग भाव की अर्थात उसकी उत्पत्ति के पहले की स्थिति बतानी पड़ेगी । परन्तु ज्ञान के बिना उसकी भी स्थिति नहीं बतलायी जा सकती अभिप्राय यह कि ज्ञान का जन्म नहीं होता । अन्त करण की विचार की जननी है । विचार के द्वारा वृत्यात्मक ज्ञान परि पुष्ट भ्रान्ति का निर्वतक होता है प्रक्रिया ग्रन्थों के अनुसार यह क्षण रहित वृत्ति का को और अपने व्यक्तित्व को भी बधित कर देता है जब यह स्वयं बधित होता है तब कोई अपना कार्य या फल छोड़कर बाधित होता है तब कोई अपना कार्य या फल छोड़कर बाधित हो और वह ज्ञान वृत्ति की निवृत्ति के अनन्तर रहे , तब द्वैत बना ही रहा । हेतुता और फलता की कल्पना ही मिटती है । हेतु और फल तो कुछ है ही नहीं जिनकी ज्ञान से निवृत्ति होती हो अज्ञान घट के उपादान कारण मृति का के समान जगत का उपादान नहीं है । यह अज्ञान है यह कल्पना सिद्वि के लिए कल्पित है इसलिए ज्ञान वृत्ति से अज्ञान है यह कल्पना भी ज्ञान विवर्त ही है । इसलिए ज्ञान वृत्ति से अज्ञान का ध्वंस नहीं होता , पत्युत कल्पना अवि विचार दशा में ही है । ज्ञान दृष्टि से हेतु फलात्मक भेद सर्वथा ही असिद्व है ।
आठवीं बात
ज्ञान में यथार्थ ही अयथार्थ और परोक्ष अपरोक्षका भेद भी नहीं है । व्यवहार में जो ज्ञान में यथार्थता आदि भेद किए जाते हैं, यदि वास्तव में विचार करके देखें तो कल्पित विषय गत भेद ही ज्ञान पर आरोपित होते हैं । स्वप्न हाथी झूठा है परन्तु स्वप्न में हाथी का देखना झूठा नहीं है । हाथी नहीं था हमारी जाग्रतकालीन स्मृति का यही स्वरूप है । हाथी देखा ही नहीं था ,यह नहीं हाथी की असत्ता ज्ञान की असत्ताकी प्रयोजक नहीं हो सकती । अव विचार दशा में हाथी की अयथार्था का आरोप ज्ञान पर कर दिया जाता है । इसी प्रकार ज्ञान की परोक्षता भी विचारणीय है । परोक्ष अपरोक्ष का भेद घटादि पदार्थों में होता है या उनके ज्ञान में ?, क्या ज्ञान भी कभी अपने से दूर होता है । यदि ऐसा मान लें पृथ्वी पर घट है और अन्त करण में ज्ञान तब भी तो घट ज्ञान अपने अन्त करण में ही रहा। उसकी परोक्षता कहां हुई । घटगत परोक्षाताका ही आरोप ज्ञान पर हुआ । यह तो छोटी बात है आश्रयत्व विषयत्व आदि विभाग से रहित अद्वितीय चित्स्वरुप ज्ञान में अयर्थार्थता और परोक्षता की कथा का कोई प्रसंग ही नहीं है ।
जय श्री कृष्ण
दीपक कुमार द्विवेदी
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