सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

आज तक लोकतंत्र में सनातनी ने जिसका भी भरपूर समर्थन किया उससे भी क्यों छला जाता है.??

आज तक लोकतंत्र में सनातनी ने जिसका भी भरपूर समर्थन किया उससे भी क्यों छला जाता है.??

जो इसके समर्थन से ही सत्ता का आनन्द लेता है वह सत्ता जीवी भी इसे ही क्यों दुत्कार देता है.??

इस यक्ष प्रश्न का एक ही उत्तर है कि सनातनी आपने धर्म के प्रति धर्मनिष्ठ नहीं है।

जो आपने पंथ, मज हब के प्रति कट्टर है उसके लिए सत्ता जीवी किसी भी प्रकार से चरण चाटुकार बनकर कार्य करने को लालायित रहता है।

एक बार पीछे मुड़कर देखें कि हमने क्या - क्या छोड़ा.......

१. चोटियाँ छोड़ी...
२ . टोपी, पगड़ी छोड़ी...
३ . तिलक, चंदन छोड़ा...
४ . अचकन कुर्ता छोड़ा... धोती छोड़ी...
५ . यज्ञोपवीत छोड़ा...
६ . संध्या वंदन छोड़ा...
७ . रामायण पाठ, गीता पाठ छोड़ा...
८ . स्त्रियों/कन्याओं ने साड़ी छोड़ी...बिछिया छोड़े.. चूड़ी छोड़ी... दुपट्टा , चुनरी छोड़ी... मांग, बिन्दी छोड़ी... जूड़ा छोड़ा...
९ . धन की दौड़ में बच्चे छोड़े ... (आया पालती है)
१० . संस्कृत छोड़ी...हिन्दी छोड़ी...(अधिकांश लोग उर्दू/आंग्ल मिश्रित हिंदी ही बोलते हैं)
११ . श्लोक छोड़े...लोरी छोड़ी...
१२ . बच्चों के सारे संस्कार छोड़े...(सोलह संस्कार में आरम्भ के ५ - ७ तक छोड़ दिया)
१३ . प्रातः सायं काल के हरि वंदन छोड़ी...
१४ . पांव लागूं, चरण स्पर्श, पैर छूना छोड़े...(good morning या हाथ मिलाने का ही प्रचलन हो गया है)
१५ . घर परिवार छोड़े... (अकेले सुख की चाह में संयुक्त परिवार को समाप्त कर एक परिवार बना दिया)
१६ . आदि आदि....

क्या अब कोई रीति या परंपरा बची है.??

ऊपर से नीचे तक ध्यान से देख चिंतन करें हम कहां और किस प्रकार सनातनी हैं.?? आज तो अधिकांश...
भारतीय हो... पर सनातनी नहीं ...!!
सिकुलर हो... वामी हो... (कु) बुद्धिजीवी हो...
या कुछ और हो... पर सनातनी नहीं...!!

कहीं पर भी उंगली रखकर बता दो कि हमारी परंपरा को हमने ऐसे जीवित रखा है।

जिस प्रकार से हम शनै: - शनै: बदल रहे हैं - शीघ्र ही समाप्त भी हो जाएंगे..!!

बौद्धों ने कभी सर मुंड़ाना नहीं छोड़ा...
सिक्खों ने भी सदैव पगड़ी का पालन किया...
मु S लमानों ने न दाढ़ी छोड़ी और न ही ५ बार नमाज पढ़ना छोड़ा...
ई साई भी Sunday को चर्च अवश्य ही जाता है...

तो फिर सनातनी आपने परंपराओं - संस्कारों से क्यों दूर हुआ.??

आज मन्दिर के घंटे घड़ियाल नगाड़े भी विद्युत चालित यंत्रों से ही किया जा रहा है।

कहाँ लुप्त हो गई - गुरुकुल की शिक्षा, यज्ञ, शस्त्र-शास्त्र, नित्य मंदिर जाने का संस्कार.?

हम अपने संस्कारों से विमुख हुए, इसी कारण हम विलुप्त हो रहे हैं।

और यही स्थिति रही तो माया सभ्यता के जैसा एक दिन सनतनी भी विलुप्त हो जाएंगे।

लौटें अपने परंपराओं की ओर...
अपनाएं अपने मूल संस्कारों को...

यह इतना कठिन भी नहीं है... एक बार कर के तो देखें...!!

जय सनातन धर्म 🙏🚩

जय महाकाल 🙏🌺🚩
#प्रेमझा

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