सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

सृष्टि के प्रारम्भ का मनुस्मृति सिद्धांत

मनुस्मृति के प्रथम अध्याय का कुछ बहुत जो मेरी समझ में आया प्रस्तुत है| Initial State of Universe-: प्रारम्भ में संसार तम प्रकृति से घिरा था, जो प्रत्यक्ष ज्ञात नहीं किया जा सकता, अनुमान करने योग्य कोई रूप नहीं था, जिससे वैज्ञानिक तर्क द्वारा लक्षण स्थापित किया जा सके, सर्वत्र सोते हुए के अनुसार अज्ञात स्थिति में था| God Particle-: जो सम्पूर्ण इंद्रियो के ज्ञान से परे है, सूक्ष्म , अव्यक्त , सनातन , सभी प्राणियों में व्यापक और अचिन्त्य रूप भगवान स्वयं उत्पन्न हुए| Creation of Atom -: आत्म स्वरुप के ज्ञानार्थ बुद्धि , तीनो गुण ( सत्व, रज , तम ) और विषयग्राही पंचेंद्रियो उत्पन्न हूयी| फिर अत्यंत तेजस्वी इन छहो तत्वो के सूक्ष्म अवयवो को उन्ही के सूक्ष्म विकारों में न्यास करके सभी प्राणियों की रचना हूई| Creation Of Universe-: प्रलयावस्था को नाश करने वाले लक्षण सृष्टि के सामर्थ्य से युक्त अव्यक्त स्वयंभू भगवान महाभूतादि पंचतत्वो को प्रकाश करते हुए व्यक्त हुए| सृष्टि करने की ईच्छा से मन सृष्टि को करता है और उससे आकाश उत्पन्न होता है| और आकाश का गुण 'शब्द' कहा जाता है| विकार युक्त आकाश से सब प्रकार के गंध को वहन करने वाले पवित्र वायु की उत्पत्ति होती है जिसका गुण ' स्पर्श' है| विकारवान वायु से अंधकार को नाश करने वाला प्रकाश से युक्त तेज उत्पन्न होता है, जिसका गुण रूप है| विकार वान तेज से जल उत्पन्न होता है जिसका गुण रस है, जल से गंध गुण वाली प्रथ्वी उत्पन्न होती है | समय के विभाग नक्षत्र, गृह ,नदी समुद्र पर्वत समतल भूमि और विषम भूमि की रचना हूयी| creation of jeev-: भगवान ने प्राणियों को उत्पन्न करने की ईच्छा से ध्यान से अपने शरीर में जल उत्पन्न कर उसमें बीज उत्पन्न किया| वह बीज सूर्य के समान तेजस्वी सुवर्ण अंडा हो गया उसमें से सभी लोको के पितामह ब्रम्हा जी उत्पन्न हुए| जल से जीव की उत्पत्ति हूई है , इसलिए जल को नार कहते हैं | नार जिसका पहले अयन हुआ, इसलिए उसका नाम नारायण हुआ| उस अंडे में ब्रह्मा ने रहकर उसके दो भाग किये और क्रमशः आकाश, प्रथ्वी और मध्य में स्वर्ग , आठो दिशाएं और आठ समुद्र जल के स्थान बनाए| सत् असत स्वरूप आत्मा से मन और ईश्वर से भी से अभिमान करने वाले तत्व अहंकार को उत्पन्न किया| छह सूक्ष्म अवयव ब्रह्म में आश्रय करते हैं, इसीलिए शरीर को ब्रह्ममूर्ति कहते हैं| मनुस्मृति प्रथम अध्याय

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