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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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आत्मैवेदं सर्वम ब्रह्लौवेदं सर्वम एतदात्ममिदं सर्वम नेह नानास्ति किंचन मृत्यो : से मृत्युमाप्रोति यह इह नानेव पश्यति इत्यादि ।
इस प्रकार अध्यारोपित जगत का सर्वथा अपवाद करती हुई श्रुतियां एक अद्वितीय अखण्ड ब्रहासत्ता का प्रतिपादन करती है इससे स्पष्ट ही है कि उपनिषदों में यत्र तत्र जगतकी सृष्टि , लय आदि सम्बन्धी जो द्वैत बोधक श्रुतिया पायी जाती है , उनका प्रयोजन द्वैत मत के प्रतिपादन नहीं है ; किंतु शुद्ध ब्रह्म में जगत का अध्यारोप करके उसके। अपवादद्वारा एक अखण्ड अद्वितीय निर्गुण ब्रह्म सत्ता की सिद्धि ही उनका लक्ष्य है
उपनिषद के उपदेश क्रम में
अध्यारोपावादाभ्यां निष्प्रपंच प्रपञ्च्यते
यही सिद्धांत कार्यान्वित हुआ है इसके अतिरिक्त तत्वोपदेशका और कोई प्रकार नहीं है कि जिसके द्वारा परमार्थदृष्टया जीवन के अपने ही एक अद्वितीय अखण्ड स्वरूप में अनादि काल से चला आता हुआ यह जगदभ्रम निवृत्त हो सके जीव अपने वास्तविक अद्वितीय अखण्डस्वरुप प्रतिष्ठित होकर शाश्वत शान्ति प्राप्त कर सकें
ज्ञानस्वरूप नित्यबोधय निजरूप आत्मा में प्रतिष्ठित होकर शाश्वत शान्तिमय हो जाना ही जीव का परम पुरुषार्थ की प्राप्ति औपनिषद ज्ञाननिष्ठाद्वारा ही होती है । बिना तत्वनिष्ठा हुए कैवल्यकी प्राप्ति नहीं होती, यह उपनिषद का सिद्धांत है
ऋते ज्ञानान्न मुक्ति :
उपनिषत तत्वज्ञान की महिमा वर्णन करते हुए मुण्डक श्रुति कहती हैं
वेदान्त ज्ञान सुनिश्चिततार्थ :
संन्याससयोगाद्यतय: शुद्वसत्वा: ।
ये ब्रहालोकेषु परान्तकाले परामृता परिमुच्चन्ति सर्वे।।
इस प्रकार कठ श्रुतियां अपरोक्ष आत्म ज्ञानी के लिए ही शाश्वत सुख शांति की प्राप्ति का निर्देश करती है और अन्यके लिए उसका सर्वथा निषेध करती हुई कहती हैं
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा
स्तेषा सुखं शाश्वत नेतरेषाम्
तेषां शान्ति शाश्वाति नेतरेषाम।
इस प्रकार उपनिषद का स्पष्ट उपदेश है कि यादि जीव स्थाई सुख शान्ति की प्राप्ति करना चाहता है तो उसे आत्मनुभूति के लिए प्रयत्नशील होना पड़ेगा , अध्यात्मकी ओर बढ़े बिना स्थायी सुख शान्ति की प्राप्ति असम्भव है।
इसलिए सर्वकल्याणकारी वेद जीवन कर्म उपासना और ज्ञान के उपदेश द्वारा अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ाता है । जो जिस अवस्था में , उसी अवस्था में अध्यात्म की ओर नियोजित करना ही वेद का लक्ष्य है । वेद के कर्म काण्ड और उपासना काण्ड का चरम उद्देश्य है कि जीव अधिकारानुसार कर्मोपासनामे प्रवृत्ति होकर अन्त करण की शुद्धि द्वारा तत्व ज्ञान का अधिकारी बने और परमात्मनिष्ठान होकर शाश्वत सुख शांति प्राप्त करे । इस सर्वकल्याणकारी वैदिक सिद्धांतन्तो का सक्रिय व्यावहारिक रूप निष्पन्न हुआ है । जगतीतल पर समाज व्यवस्था का उज्जवल आर्दश रूप भारतीय वर्णाश्रम धर्म व्यवस्था समाजिक व्यवहार को उतमताके उत्कृष्ट शिखर पर रखती हुई उसे परमार्थ का साधन बनाकर जीव को सतोन्नतिको पथपर प्रतिष्ठित रखकर उसे पूर्तताकी ओर ले जाती है । वेदमूलक धर्माशास्र वर्णाश्रम धर्मों का इस प्रकार से विधान करता है कि जो जिस जिस श्रेणी में जिस अवस्था में जहां है वही अपना धर्म पालन करता हुआ स्वाभाविक रूप से अध्यात्मकी ओर बढ़ता जाय । इसलिए उपनिषन्नमूलक उपदेश है कि धर्म शास्त्र के अनुसार
स्व स्व कर्मण्यभित संसिद्वि लभते नर: ।।
१८।४५
यह शास्त्रविधिमुत्सज्य वर्तते कामकारत: ।
न स सिद्विमवाप्रोति न सुख न परां गतिम ।।
तस्माच्छास्रं प्रमाण ते कार्यव्यवास्थितौ।
ज्ञात्वा शास्रविधानोक्त कर्म कर्तुमिहार्हसि
(१६।२३-२४)
इस प्रकार कर्म क्षेत्र में शास्रोंत्क स्वधर्म पालन ही समस्त वेदोक्त ज्ञान का सार और सर्वोन्नतिका मूल है । इसलिए समान्य धर्म वर्णन करता हुआ वेदमूलक सनातन धर्म शास्त्र प्रत्येक जीवन को व्यष्टि रूप में और समस्त विश्व को समष्टि रुप में वेदका यह सनातन सन्देश दे रहा है कि यदि सुख शांति चाहते हो तो स्व धर्म पालन करते हुए अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ो ।
भगवती श्रुति प्रत्येक जीवन को प्रत्येक अवस्था में अपने पवित्र अंग में उठाकर अध्यात्म में प्रतिष्ठित करने तत्पर है । भारतीयो जागो श्रुति भगवती तुम्हें जगा रही है
उतष्ठिता जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत
पवित्र भूखण्ड भारत में तुम्हारा जन्म हुआ है
अध्यात्म विद्या तुम्हारे घर की वस्तु है उसका समुचित लाभ उठाकर स्वयं शाश्वत सुख शांति प्राप्त करो और दुख में भरे विश्व को सुख शांति का परमोज्वल पथ प्रदर्शित करो, अन्यथा तुम्हारे हाथ में उपनिषद की ज्ञान राशि कलंकित हो रही है।
जय श्री कृष्ण
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