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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
सम्मेद शिखर पर विवाद की पृष्ठभूमि क्या है जैन समुदाय और जनजाति समुदाय एक दूसरे के आमने सामने क्यों है आईए जाने
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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सम्मेद शिखर के संबंध में अंतरराष्ट्रीय संथाल परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष नरेश कुमार मूर्मू ने कहा है कि अगर सरकार मरांग बुरु को जैनियों के चंगुल से मुक्त करने में विफल रही तो पाँचों राज्यों में संथाल विद्रोह होगा। आगे यह भी कहा कि हम चाहते हैं । कि सरकार दस्तावेज़ के आधार पर कदम उठाये और हेरफेर न करे। 1956 के राजपत्र में इस पर्वत को मरांग बुरु घोषित कर दिया गया था। जैन समुदाय अतीत में पारसनाथ के लिए क़ानूनी लड़ाई भी हार गया था।
संथालों के दूसरे बड़े संगठन आदिवासी सेंगल अभियान ने यह आरोप लगाया है कि जैनियों ने संथाल समाज के सर्वोच्च पूजा स्थल पर अवैध क़ब्ज़ा किया हुआ है। पूर्व सांसद सलखन मूर्मू ने भी आग लगाने वाला बयान देते हुए कहा है कि यदि यह क़ब्ज़ा जिसकी क़ानूनी लड़ाई वह जीते हुए हैं नहीं हटाया गया तो आदिवासी समाज सड़क पर उतरेगा।
होना तो यह चाहिए था कि इस मामले में जैन समुदाय के बड़े विद्वान लोग संथाल समुदाय के प्रमुख लोगों के साथ बैठकर बीच का रास्ता निकालते पर इससे झारखंड मुक्ति मोर्चा को कोई फ़ायदा नहीं होगा। झामूमो को असल फ़ायदा तब होगा जब जैन और आदिवासी आमने सामने आएँ और आदिवासी सेंटीमेंट को जगाकर वोट पक्का किया जा सके।
इन आदिवासी संगठनों को अनसुना करना उतना भी आसान नहीपहले की संरक्षक भारत की राष्ट्रपति महोदया हैं।
सम्मेद शिखर का विवाद एकाधिकार का विवाद है। कुछ समय पहले कुछ संथाल समुदाय के बच्चे वहाँ घूमने गए तो जैनियों ने उन्हें रोक दिया और गाली गलौज भी हुई। वहीं संथाल केवल इस पहाड़ के पूजा तक सीमित नहीं रहना चाहते वह यहाँ बलि भी करना चाहते हैं जो उनके पूजा का मुख्य रिवाज है जबकि जैन धर्म की बुनियाद ही बलि और हिंसा का विरोध है।
बीच का रास्ता यह है की जैन समाज अपना एकाधिकार छोड़े, जबकि संथाल समुदाय बलि की ज़िद। दोनों मिलकर इस पहाड़ को पूजें पर राजनीति ऐसा करने देगी, बहुत मुश्किल लगता है।
लोक संस्कृति विज्ञानी
डॉ भूपेंद्र सिंह
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