सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

उपनिषदों का एक अर्थ है , एक परमार्थ है

प्राणियों ब्राह्य अर्थोका प्रकाश करने वाली तथा नाना प्रकार से  उपकार करनेवाली अनेक विद्याएं है परन्तु परम पुरुषार्थ को प्रकाशित करने वाली परमार्थ को दिखलाने तथा परम उपकारिणी विद्या उपनिषद है । जिससे तत्व जिज्ञासु पुरूषों को परम शांति प्राप्त होती है , वह परमार्थ कहलाता है क्लेशग्रस्त जीवन के समस्त निवारण जिसमें हो , वह परम उपकार कहलाता है । 

तत्र को मोह : क: शोक एकत्वमनुश्यत । 

यह इशावास्तयोपनिषद्वाक्य एकत्वके साक्षात्कार रुपी उपनिषद विद्या से युक्त पुरूष के समूल शोक नाश को उदघोषित करता है 

मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थत: ।
 ( गौड़० आग ० २७) 

तथा 
तय सत्यं स आत्मा तत्वमसि ( छान्दोग्य ०।८।७) 
इत्यादि श्रुतियां उस उपनिषद्वद्याकी परमार्थताको घोषित करती है । 

फिर यह उपनिषद्विद्या क्लेशोके पात्र सांसारिक प्राणियोंयोको हठात् प्राप्त होनेवाला क्लोशोका उन्मूलन किस प्रकार करती है? इसका उत्तर श्वेताश्वतर उपनिषद् देती है 


ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानि: क्षीणै: क्लेशैर्जैन्मृत्युप्रहाणि: । 

परमात्मदेवको जानकर सारे बन्धन कट जाते हैं क्लोशो के क्षीण होने पर जन्म और मृत्यु से छुटकारा मिल जाता है। 


दुखोके मूलका नाश हुए बिना दुखोका आत्यन्तिक नाश नहीं बनता । यदि यद्यपि कर्म उपासना आदि धर्म अथवा खेत - घर आदि विषय तत्काल प्राप्त होनेवाले कुछ न कुछ दुखोकी निवृत्ति तो करते हैं, तथापि जिससे दुःखो की पुनः उत्पत्ति न हो , इस प्रकार की समस्त दुखों की अत्यंत निवृत्ति तो त्रिविध दुखोकि मूल की निवृत्ति हुए बिना सम्भव नहीं । 

दुख का मूल क्या है? विचारक लोग कहते कि दुख का मूल जन्म है । 

न स वै सशरीरस्य सत: प्रियाप्रिययोरहतिरिस्त 
     ( छान्दोग्य ० १।१२।१ ) 

निश्चय पूर्वक जबतक यह शरीर बना हुआ है तबतक सुख और दुख का निवारण नहीं हो सकता है 
इस प्रकार श्रुति मुख्यता जन्मके ही दुख का मूल कारण प्रतिपादन करती है । 

तब फिर जन्म का मूल कारण क्या है? वे ही तत्व परीक्षक उतर देते हैं कि जन्म का मूल कर्म है । यदि मनुष्य कर्म से विराम ले ले , तो उसके लिए अत्यंत दु:ख निवृत्ति हस्तामलकवत् हो जाय । अतः ममक्षुजनो को दूसरे उपायों के अनुसरण में संलग्न नहीं होना चाहिए ; परन्तु इसमें यह संदेह उठ सकता है कि पूर्व जन्मों में और इस जन्म में अबतक किये जाने वाले कर्मोका जो मूल है उसका नाश किये बिना कर्म विराम का संकल्प केवल कथन मात्र ही रह जायगा । 


तब सामान्यतः कर्म का मूल क्या है? इसके उत्तर में राग का नाम लिया जाता है । राग और उससे उपलक्षित द्वेष , भय आदि को भी दोष शब्द से ग्रहण करते हैं। जिस किसी वस्तु में जबतक राग या द्वेष होता है, तब तक उस वस्तु की प्राप्ति या परित्याग के लिए पर्यत्नरूप कर्म करते हुए ही लोग देखे जाते हैं ; जिस प्रकार जब तक भय रहता है , तब तक मनुष्य उस भय से छुटकारा पाने के लिए प्रयत्न करता ही है । 

इस दोष का मूल क्या है? अपने से अतिरिक्त दूसरे का भान होना ही दोष का मूल है, ऐसा ब्रहावेता लोग कहते हैं । जैसा कि वृहदारण्यक उपनिषद का वाक्य है 

द्वितीयाद्वै भयं भवति। 
निश्चय ही दूसरे भय होता है । यादि दूसरी वास्तु का भान ही नहीं होगा तो कर्म के मूल भूत भय , द्वेष अथवा राग का कोई आए न रह जान के कारण भय आदि का प्रसंग ही नहीं प्राप्त होगा।




जय श्री कृष्ण 

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