सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

रामचरित मानस पर प्रश्न खड़े करके राम के अस्तित्व को नहीं नाकारा जा सकता क्योंकि राम भारत की आत्मा है ।


रामचरित मानस हो या कोई भी ग्रंथ, सब देश-काल परिस्थिति से प्रभावित होने के कारण अनित्य शब्दों से बनें हैं। वह जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लिखे गए वह उद्देश्य मूल हैं। उन उद्देश्यों की महानता को समझते हुए तुलसीदास एवं उनके ग्रंथों को स्वीकार्य करना चाहिए। 

अच्छे से अच्छे वस्तु में व्यक्ति अपने निकृष्टतानुसार बुरा से बुरा बिंदु खोज लेता है। असूया अर्थात् गुण में दोष खोजना इसीलिए मनुष्यों के प्रमुख दोषों में से एक है। समता के सबसे बड़े प्रकाशस्तंभ गौतम बुद्ध तक के साहित्यों में जातिय वर्चस्व की लड़ाई देखने को मिलती है जहां ब्राह्मण परम्परा के विरोध में श्रमण परम्परा ने क्षत्रियों को उच्च रखने का प्रयास किया। 
किसी को यह लगता है कि रामचरित मानस को जलाने से वह राम के अस्तित्व पर संकट पैदा कर सकते हैं तो यह कोरी मूर्खता है। गोरी, गजनी, ग़ुलाम, लोदी, ख़िलजी, मुग़ल आदि आये और चले गए। राम का अस्तित्व उसी तरह अक्षुण बना हुआ है। 
राम भारत की आत्मा हैं, राम के बिना भारतीय संस्कृति की समझ असम्भव है। राम का चरित्र प्रत्येक परिवार के लिए एक आदर्श है। प्रत्येक व्यक्ति राम जैसा पुत्र, लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्न जैसा भाई, सीता जैसी पत्नी, हनुमान जैसी सेवा और भक्ति की इच्छा रखता है। राम सबके हैं, सब राम के हैं। आपको तुलसी के राम से कोई समस्या है तो आप अपना राम अपने अनुसार खोज लीजिए जैसे कबीर ने खोजा था, गुरुनानक ने खोजा था, गुरु गोविंद सिंह ने खोजा था। 
राम पर प्रहार करके आप राम के अस्तित्व को तो नहीं मिटा सकते लेकिन अपने औचित्य पर प्रश्न अवश्य खड़ा करते हैं।
जय सियाराम॥ 

डॉ भूपेंद्र सिंह जी
लोक संस्कृति विज्ञानी 

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