सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

कुछ लोग की इतनी विकास विरोधी मानसिकता क्यो है

सोशल मीडिया पर जब मैं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ‘विकास’ के विरोध में पोस्ट/लेख पढ़ता हूँ तो ये समझने में तनिक भी देर नहीं लगती कि कौन,किस भाव और आकांक्षा से ऐसा लिख रहा है।

मेरा बहुत मन करता है कि इन लोगों से बोलूँ कि अपने घर के स्कूल जाते बच्चे से ‘development’ और ‘sustainable development’ के बीच का अंतर समझें लेकिन फिर चुप रह जाता हूँ। बहुत समय पहले जब लोगों को सर्प के विष के बारे में पता नहीं था तो लोग सर्प से डरते थे। लेकिन समय के साथ मनुष्य ने सर्प के विष से ही उसका तोड़ बनाना भी सीख लिया। ये मनुष्य ही कर सकता है! और किसी जीव में ये करने का potential है ही नही!

मुझे अपने internship के वो दिन आते हैं जब मेरे मैनेजर एक बड़ी अच्छी बात कही थी। उन्होंने कहा था कि अगर केवल परिश्रम करने से ही सफलता मिलती तो एक गधा आज सबसे सफल होता! परिश्रम का सही दिशा में होना और उसके outcome के बारे में जानना भी आवश्यक है। 

जनता को समस्या के मूल से न भटकाएँ! मनुष्य का जन्म आगे बढ़ने के लिए हुआ है। आगे बढ़ने के लिए कौन सा मार्ग best है, इस पर मंथन हो। “पानी से बिजली निकाल देने पर पानी में बचेगा क्या?” - इस प्रकार की मानसिकता के brand ambassador न बनें। 🙏

शेष किसी और माध्यम से…

कुमार दिपांशु जी 

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