सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

उपनिषदो को प्रधानतम गौरवमयी मोक्षदायिनी विद्या क्यो कहा जाता है आईए जाने ?

 

धर्म अर्थ , काम और मोक्ष - इन चार प्रकार के पुरूषार्थो में परम नि: श्रेयसरूप मोक्ष ही मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य है - यह सबके द्वारा सुनिश्चित सिद्धांत है।  चौरासी लाख योनियों में बारम्बार जन्म मरण की प्राप्तिरूप घोर संसार से पार होने के लिए मनुष्य को परम शान्ति स्वरूप मोक्ष की प्राप्ति के निमित्त सतत प्रयन्न करना चाहिए। मोक्ष अमृतत्वरूप है । उसकी प्राप्ति के लिए मानव जन्म स्वर्ण सुयोग है ; क्योंकि मनुष्य सिवा और किसी प्राणी को उस योनि में रहते हुए कैवल्य मोक्ष की सिद्धि नहीं हो सकती । इसलिए शास्त्रो में मानव जन्म को अत्यंत दुर्लभ बताया गया है 


जन्तूनां नरजन्म दुर्लभतम 

इत्यादि । अतः प्रत्येक मनुष्य को उचित है कि वह अपने जन्म के प्रधानतम लक्ष्य मोक्ष की सिद्धि के लिए दिन रात प्रयत्न करे । यदि ऐसा यत्न नहीं करता , विषयभोग की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता रहता है तो निश्चय ही उसे दो पैरो का पशु कहना चाहिए । 


लब्धवा कथंचिन्नरजन्म दुर्लभं 
   तत्रापि पुंस्तवं श्रुतिपारदर्शनम् । 
यस्तात्मत्ममुक्तौ न यतेत मूढ़धी: 
स ह्रात्महा स्वं विनिहन्तसदग्रहात ।। 


यदि किसी प्रकार पुण्यविशेषसे परम दुर्लभ 
मानव जन्म पाकर उसमें भी सप्पूर्ण श्रुतियो का आद्योपान्त अनुशीलन करनेवाले पुरूष शरीर को पा लेने पर भी जो मूढ़ चित मानव अपनी मुक्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता वह आत्महत्यारा है । वह अनित्य भोगो में फंसे रहने के कारण अपने आपको विनाश के गर्त में गिरा रहा है । 

इत्यादि वचनों के अनुसार मनुष्य अज्ञान के द्वारा अपनी हत्या ही करता है । अतः अपना कल्याण चाहने वाले प्रत्येक पुरुष का कर्तव्य है कि वह क्षण मात्र सुख देने वाले अनित्य सांसारिक विषय भोग में न फंसकर आध्यत्मिक साधन में संलग्र हो सदा  आत्मतत्व के बोध के लिए ही प्रयत्नशील बना रहे। 

श्रोतव्यो मन्तव्यों निदिसध्यासितव्य :
 
इस श्रुति के द्वारा आत्मज्ञान के लिए श्रवण मनन और निदिध्यासन ये तीन साधन बताए गये है। 


परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणों 
  निर्देशानुसार कृत: कृतेन । 
तद्व विज्ञानार्थ स गुरूमेवाभिगच्छेत 
समित्पाणि : श्रोत्रियं ब्रह्रानिष्ठम। ।। 

कर्मत: प्राप्त हुए लोको की परीक्षा करके अर्थात उनकी अनित्यताको भलीभांति समझकर ब्राह्मण उनसे विरक्त हो जाय: क्योंकि कृत अनित्य कर्म से अकृत नित्य आत्मतत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती । वह आत्मज्ञान के लिए हाथ में समिधा लेकर ब्रहानिष्ठ श्रोत्रियो गुरु की ही शरण में जाय। 


इत्यादि शास्त्र वचनोके अनुसार ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरण लेकर उनके समीप रहकर वेदोक्त आत्मतत्व का, जो दम्भ अंहकार आदि विकारो से रहित है श्रवण करे । वेद के चार भाग बताये जाते हैं संहिता ब्राह्मण , आरण्यक और उपनिषद । संहिता आदि भागों में केवल ज्ञान का ही प्रतिपादन है अतएव उपनिषद विद्या अन्य विद्याओं की अपेक्षा प्रधानतम एवं गौरवमयी है । इसी विद्या को लक्ष्य करके कहा जाता है कि सा विद्या या विमुक्तये ( वही वास्तविक विद्या है, जो मोक्ष दिलाने में सहायक हो)  ।

आध्यत्मविद्या विद्यानाम्     ( गीता १०।३२) 
भगवान कहते हैं _ मैं विद्याओमे अध्यात्मविद्या हूं

अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते। ( मुण्डक ०), 

परा विद्या वह है , जिससे उस अविनाशी ब्रह्मका ज्ञान होता है । इत्यादि सब श्रुतिओद्वारा इसी को मोक्षदायिनी विद्या अध्यात्मविद्या  तथा परा विद्या आदि नाम दिये गये है तथा यही विद्या सब अनर्थो के मूल भूत संसार की निवृत्ति करती हुई  परमानन्दरुप मोक्ष की प्राप्ति का मुख्य कारण बतायी गयी है इसलिए इसे सबसे श्रेष्ठ कहा गया है ।  



जय श्री कृष्ण 

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