सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

अध्यात्म और परंपरावाद के नाम पर विकास कार्य को कुछ तथाकथित सनातनी परंपरावादी क्यों रोकना चाहते हैं?

पहले कह रहे थे कि पहाड़ में रोज़गार नहीं है, अस्पताल नहीं है, शिक्षा नहीं है, इसलिए पलायन हो रहा है और वहाँ पर क़बीलाई जाकर क़ब्ज़ा जमा रहे हैं। अब रोड बनाया जा रहा है, एम्स बनाए जा रहे हैं, पर्यटन बढ़ाया जा रहा है ताकि रोज़गार बढ़े, स्वास्थ्य आदि का प्रबंध हो, तब कह रहे हैं कि पहाड़ को बर्बाद किया जा रहा है। हमारे पहाड़ भगवान के रूप हैं, वहाँ हम पर्यटन नहीं होने दे सकते। 

मंदिरों को दड़बा की तरह बनाकर रखना मजबूरी नहीं है, स्वार्थी तत्वों का च्वाईस है। काशी विश्वनाथ कारिडोर बनते समय इन्हीं स्वार्थी तत्वों में नंगा नाच किया था। कहा की बनारस बर्बाद हो जाएगा। बनारस तो बर्बाद न हुआ, उल्टा चमक गया। अब क्या करते? कहने लगे कि पहले लोग तीर्थ करने आते थे और अब पर्यटन के लिए आते हैं। माने बनारस में आया आदमी दर्शन पूजन के बाद आसपास देवदरी, राजदरी, सिद्धनाथ दरी, मिर्ज़ापुर चुनार चला गया तो पाप हो गया। बनारस तब न बर्बाद हुई जब पंडों पुजारियों के अड्डों के बग़ल में विधवा आश्रम स्थापित किए गये, तब नष्ट न हुआ जब हज़ार साल से दलमंडी में खुलेआम वेश्यावृत्ति होती रही, तब भी बर्बाद न हुआ जब पूरे बनारस का विष्ठा और गंदगी गंगा में बहाई गई। लेकिन साफ़ सुथरा होने से बनारस बर्बाद होने लगा। 

सारा मसला है एकाधिकार का। भले पहले काशी विश्वनाथ की गली बजबजाती थी, सीलन और सड़न उस जगह की पहचान थी पर गिरोह का क़ब्ज़ा बना हुआ था। वह कारिडोर बनते ही समाप्त हो गया। पेट में दर्द इसीलिए उठ रहा है। 
महाकाल लोक बनाकर सुंदर कर दिया गया, बग़ल का कुंड जिसमें कूड़ा भरा रहता था, उसे साफ़ कर दिया गया। 


सबको अच्छा लग रहा है, पर एक विशेष गिरोह को यह सब साफ़ सफ़ाई, सुंदरता, भव्यता बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा। कारण स्पष्ट है और वह है एकाधिकार छूट जाएगा। 

सारा देश राम मंदिर की लड़ाई लड़ रहा था तब यहीं गिरोह कह रहा था कि बाबरी मस्जिद गिराकर कारसेवकों ने पाप किया है। यहीं गिरोह राम मंदिर बनना शुरू हुआ तो उसको संघ कार्यालय कहना शुरू कर दिया क्यूँकि इनको वसूली का अधिकार नहीं मिला। यह हाल तब है जब समिति में उसी जाति के 90% लोग डाले गये जिसका ये शुभचिंतक बनने का दावा कर उनके ख़िलाफ़ बाक़ी हिंदू समाज में केवल उनके लिए अपने कुकर्मों से घृणा बटोर रहे हैं। पर बात जाति की रहे तब तो संतुष्टि मिले। बात है पैसे की, लूट की, एकाधिकार की। 

यहीं गिरोह जोशीमठ के बहाने मोदी सरकार पर निशाना बना रहा है। यह गिरोह धर्म क्षेत्र में कांग्रेसी मानसिकता का प्रतिनिधि हैं जो देश को यथास्थितिवाद में जकड़ कर रखना चाहता है। देश को आगे बढ़ते देख उसके विरोध में खड़ा हो जाता है। 
यहीं गिरोह चीन के निर्माण को देखकर मोदी सरकार को निर्माण न करने पर घेरता है और फिर निर्माण होने पर पर्यावरण का वास्ता देता है। 
यहीं गिरोह पहाड़ में रोज़ी रोज़गार के न होने के नाम पर मोदी सरकार को घेरता है और फिर यहीं गिरोह पर्यटन बढ़ाने पर धर्म का वास्ता देता है। 

ऐसा लगता है कि देश में सारा पर्यावरण की समस्या इसी आठ साल में आयी है जबकि सत्य यह है कि पिछला एक दशक एक मात्र दशक है जब वृक्षों की संख्या बढ़ी है, देश में सफ़ाई बढ़ा है, शौचालयों का प्रयोग बढ़ा है। पर इनको कुछ अच्छा नहीं लग रहा क्यूँकि मंदिरों के पुनर्निर्माण से इनका वर्चस्व टूट रहा है, एकाधिकार प्रभावित हो रहा है। 
मंदिर सड़ा हो, गंदा हो, बदबूदार हो, सीलन भरा हो, पर अपने पास होना चाहिए। यहीं एकमात्र मंत्र है। 
यह मुट्ठी भर लोग एंटीसाइंस, एंटी सैनिटेशन, एंटी डेवलपमेंट होते तो उतनी बड़ी समस्या न होती। लेकिन ये लोग धर्म के प्रतिनिधि बनकर आज के रेशनल युवाओं को धर्म और अध्यात्म से दूर करने का जो पाप कर रहे हैं, वह बेहद गंभीर बात है। 
लोगों को इसे गिरोह से बचने की आवश्यकता है।


लोक संस्कृति विज्ञानी
डॉ भूपेंद्र सिंह जी 

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