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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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धनुगृहीत्वापनिषद महास्त्र
शर हापासानिशतं सन्दधीत ।
आयय्य तद्वावगतेन चेतसा
लक्ष्य तदेवाक्षर सोम्य विद्वि।।
उपनिषद आध्यात्मिक अथवा ब्रह्मविद्याको कहते हैं । वेदका अन्तिम भाग होनेसे इसे वेदांत दर्शन भी कहा जाता है और
वेदान्तसम्बन्धी श्रुति संग्रह ग्रन्थोके लिए उपनिषदच्छका प्रयोग होता है ।
उपनिषद वेदका ज्ञानकाण्ड है । यह चिरप्रदीप्त वह ज्ञानदीपक है जो सृष्टि के आदि से प्रकाश देता चला आ रहा है और लयपर्यन्त पूर्ववत प्रकाशित रहेगा । इसके प्रकाश में वह अमर तत्व है , जिससे सनातन धर्म के मूलक सिञ्चन किया है । यह जगत्कल्याणकारी भारत की अपनी निधि है जिसके सम्मुख विश्व का प्रत्येक स्वाभिमानी सभ्य राष्ट्र श्रद्धा से नतमस्तक रहा है सदा रहेगा । अपौरुषेय वेद का अन्तिम अध्याय रूप यह उपनिषद ज्ञान का आदि स्रोत और विद्याका अक्षम्य भण्डार है । वेद विद्या के चरम सिद्धांत
एकमेववाद्वितीयं ब्रह्रा नेह नानास्ति किञन ।
(त्रिपाद्विभूतिमहाना०)
का प्रतिपादन कर उपनिषद जीव को अल्पज्ञानसे
अनन्त ज्ञान की ओर अल्पसत्ता और सीमित सामर्थ्यसे अनन्त स्वातंत्र्य शाश्वती शान्तिका ओर ले जाती है ।
उपनिषद सदगुररूओ प्राप्त करने वस्तु है । वैसे तो अधिकारानधिकार विचार न करके स्वेच्छया ग्रन्थरूप उपनिषदों का कोई भी अध्ययन कर सकता है किंतु इस प्रकार से किसी को ब्रह्म विद्या की प्राप्ति नहीं हो सकती । अनधिकार पर विचार न करके स्वेच्छया ग्रन्थरूप में उपनिषदों का कोई भी अध्ययन कर सकता है किन्तु इस प्रकार से किसी को ब्रह्म विद्या की प्राप्ति नहीं हो सकती अनधिकारी के साधन सम्पत्ति हीन वासनावासित अन्त करण में ब्रह्म विद्या का प्रकाश नहीं होता । जिस प्रकार मलिन वस्त्र पर रंग ठीक नहीं चढ़ता और जिस प्रकार बंजर भूमि में , जहां लंबी लंबी जड़ोवाली घास पहले से जमी हुई , धान्यबीज अंकुरित नहीं होता और कुछ अंकुरित हो भी जाय तो वृद्विड्त होकर फलित नहीं होता , उसी प्रकार अनधिकारीके वासनापूर्ण अन्त करण में बह्रा विद्या का उपदेश बीज अंकुरित नहीं होता और यदि कुछ अंकुरित हो भी जाय तो आत्मनिष्ठा रूपी वृद्धि और जीवन्त मुक्ति रूपी क्षेत्र की सम्यक् परीक्षा का विधान है । श्रुति का आदेश है
नानपुत्राय दातव्य नाशिष्याय दातव्यम् ।
सम्यक् परीक्ष्य दातव्यं मासं षाण्डमासवत्सरम ।
जिस प्रकार गुरु के लिए शिष्य की परीक्षा का विधान है, उसी प्रकार शिष्य के लिए भी गुरु के लक्षणों का स्पष्ट निर्देश करते हुए उपनिषद का उपदेश है ।
तद्विज्ञानार्थ से गुरूमेवाभिगच्छेत समित्पाणि : श्रोत्रियं ब्रहानिष्ठम । मुण्डक ०१/२/१२
भगवद्गीता भी विधान करती है
तद्विद्धि प्रणिपातेत परिप्रश्नेन सेवाया।
उपददेक्ष्यन्ति ते ज्ञान ज्ञानिनस्तत्वदर्शिन :।।
श्रोत्रिय अर्थात वेदवेदार्थके ज्ञाता और ब्रह्मनिष्ठ अपरोक्षज्ञानी तत्वदर्शी गुरूओ प्रसन्न करके उनसे उपनिषद का उपदेश श्रवन करने का विधान है ।।
श्रवण युग गुरो: पूर्व मननं तदनन्तरम ।
निधिध्यासनमित्येत्पूर्ण बोधस्य कारणम।।
(शुकरहस्य ० ३।१३ )
साधनचतुष्टयसम्पन्न जिज्ञासु श्रोत्रिय ब्रहानिष्ठा सदरूके
द्वारा उपनिषदतत्वका उपदेश श्रवण कर तार्किक युक्तियों द्वारा उस पर प्रगाढ़ मनन करते हुए गुरु पदिष्ट ध्यानादिके अभ्यासद्वारा निदिध्यासनपूर्वक अहं ब्रह्मस्मि आदि का निरंतर विचार करते हुए उस पर निष्ठा रूढ़ होकर सम्यक तत्वज्ञान विज्ञानस्वरूप परब्रह्मसतामे प्रवेश करके तद्रूप हो जाता है
ब्रह्म वेद ब्रह्रौव भवति
उपनिषद का यह उपदेश जीव के लिए परम सौभाग्ययास्पद अमूल्य निधि है ।
उपनिषद तत्वोंपदेश के निष्कर्ष में जीव ब्रहौक्य प्रतिपादन करते हुए पूर्व छात्रों ने संक्षेप में कह दिया है
जीवो ब्रह्रौव नापर :
जीव ब्रह्म ही है ब्रह्म से पृथक नहीं है । उपनिषद का उपदेश है
जय श्री कृष्ण
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