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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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ॐ
शारदा पीठ में शंकर - कश्मीर प्राचीनकाल से जितना प्राकृतिक अभिरामता के लिए प्रसिद्ध है उतना ही अपने विद्या वैभव के लिए विख्यात है । यहां के पण्डितो ने संस्कृत का, तन्त्र तथा व्याकरण का तो यह ललित क्रीडानिकेतन ही ठहरा । भगवती शारदा इस क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी है। इसलिए यह मण्डल शारदा पीठ या शारदा क्षेत्र के नाम से प्रख्यात है महाकवि विल्हण की यह उक्ति कि कविता और केसर के सहोदर है । इसलिए शारदा देश छोड़कर कविता और केसर के अंकुर अन्यत्र नहीं उगते जन्मभूमि के प्रेम का परिणाम नहीं है , अपितु इसके पीछे सच्चा इतिहास विद्यमान है । भगवती शारदा का प्राचीन मंदिर आज भी विद्यमान है परन्तु जननिवास से जंगल में इतना दूर है कि वह विशिष्ट यात्री ही पहुंच पाते हैं । साधारण यात्री तो मार्ग की कठिनता से विचलित होकर लौट ही आता है । शारदा के मन्दिर के पास ही कुण्ड था जिसकी प्राचीनकाल में प्राण संजीवन करने की विलक्षण शक्ति सुनी जाती है । शारदाकुण्ड के जल से स्पर्श होते ही मृत व्यक्ति में प्राणो का संचार हो उठता था । यहा एक प्रवाद प्रसिद्ध है कि कर्नाटक देश के राजा था जिसके कान भैंसें के कान के समान थे महिषकर्ण कहलाता था । वह कश्मीर में अपने शरीर दोष निवारण के लिए आया , परन्तु राजकन्या के अकारण कोप भाजन बन जाने से उसे अपने प्राणों से हाथ धोने की नौबत आ गयी । उसका अंग छिन्न भिन्न कर दिया गया परन्तु एक भक्त सेवक उन्हें बटोरकर कुण्ड के पास ले गया जिसके जल के स्पर्श मात्र से उनमें जीवनी शक्ति का संचार हो आया - राजा जी उठा
इस शारदा के मन्दिर से सर्वज्ञपीठ था जिस पर वह पुरूष आरोहण कर सकता था जो सकल ज्ञान विज्ञान कला तथा शास्त्र का निष्णात पण्डित होता था । बिना सर्वज्ञ के कोई पुरूष उस अधिरोहण का अधिकारी न था । इस मन्दिर में प्रत्येक दिशा के ओर चार दरवाजे थे । मन्दिर में भगवती शारदा का साक्षत निवास था। कोई भी अपवित्र व्यक्ति मन्दिर के पूरब पश्चिम तथा उतर के द्वार तो खुले रहते हैं, परन्तु दक्षिण का द्वार कभी नहीं खुलता उन दरवाजों से होकर वही व्यक्ति प्रवेश कर सकता है जो सर्वज्ञ हो दक्षिण भारत में सर्वज्ञ के अभाव से मन्दिर का दक्षिण द्वार कभी नहीं खुलता ही नहीं , हमेशा बन्द ही रहता है
आचार्य ने दक्षिणात्यो के नाम से इस कलंक को धो डालने की इच्छा से शिष्यो के साथ कश्मीर की यात्रा की शारदा मंदिर में पहुंचकर उन्होंने अपनी सुनी बातें सच्ची पायी गयी । आत्मबल तथा चरित्रबल के तो वे निकेतन ही थे । उन्होंने बलपूर्वक दक्षिण द्वार को धक्का देकर खोल दिया मण्डली उन पर टूट पड़ी। और जोर से चिल्लाने लगी पहले अपनी सर्वज्ञता की परीक्षा दे स्वीकार की इसके लिए तो वे बद्वपरिकर थे ही । वहां प्रत्येक शास्त्र के पण्डितो का जमाव था । वे लोग अपने शास्रों की बात पूछने लगे । शंकर ने उन प्रश्नों का याथर्थ उतर देकर सब पण्डितो को चमत्कृत कर दिया । वे परीक्षा में खरे उतरे । विभिन्न दर्शनों के पेचीदे प्रश्नो का याथर्थ उतर देकर आचार्य ने सर्वज्ञ होने की बात सप्रमाण सिद्ध कर दी । मन्दिर करने का ज्यो ही प्रयत्न करने लगे , ठीक उसी समय शारदा की भावना आकाशवाणी के रूप प्रगट हुई । आकाशवाणी ने कहा इस पीठ पर अधिरोहण करने के लिए सर्वज्ञता ही एकमात्र कारण नहीं है पवित्रता भी उसका सहायक साधन है। आप सन्यासी हैं। संसार प्रपंच सर्वथा परित्याग कर चुके हैं । सन्यासी होकर मृतक शरीर में प्रवेश कर काम नियो के साथ रमण करना तथा कामकला सीखना क्या संन्यासी का न्यायनुमोदित आचरण है ? ऐसा पुरुष पवित्र चरित्र होने की अधिकारी कैसे हो सकता है?
शंकर ने उत्तर दिया - मैंने इस शरीर से जन्म लेकर अब तक कोई पातक नहीं किया कामकला का रहस्य मैंने अवश्य सीखा है परन्तु अभि दूसरे शरीर को धारण कर लिया है । उस कर्म से यह भिन्न शरीर किसी प्रकार लिप्त नहीं हो सकता । शारदा ने आचार्य की युक्ति मान ली और उन्हें पीठ पर अधिरोहण करने की अनुमति देकर पवित्रता पर मुहर लगा दी पण्डित मण्डली के हृदय को आश्चर्यसागर में डुबाते हुए सर्वज्ञता शंकर ने पवित्र शारदा पीठ के सर्वज्ञपीठ पर अधिरोहण किया ।
जय श्री कृष्ण
दीपक कुमार द्विवेदी
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