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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्रा।
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति , यत्प्रयत्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व ।
( तैत्तिरीय ० ३।१।१। )
ब्रह्म सत्यस्वरूप ज्ञानस्वरूप एवं अनन्त है । जिनसे ये सम्पूर्ण प्राणी जन्म लेते , जन्म लेकर जिनसे जीवन धारण करते तथा प्रलय के समय जिनमें पूर्णतः प्रवेश कर जाते हैं , वे ब्रह्म है, उनको जानने की इच्छा करो ।
यतद्रेश्यमग्राह्रामगोत्रमवर्णमचक्षु: श्रोत्रं तदपाणिपादम ।
नित्यं विभुं सर्वगत सुसूक्ष्मं तदव्ययं परिपश्यन्ति धीरा: ।।
( मुण्डक ० १।१।६। )
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम।
तदेव ब्रह्रा त्वं विद्वि ।। ( केन० १।५)
ब्रहौवेदममृत पुरस्ताद् ब्रह्रा पश्राद ब्रह्रा दक्षिणतश्रोतरेण ।
जिसका नेत्रोंद्वारा दर्शन तथा हाथों द्वारा ग्रहण नहीं हो सकता , जिसमें कोई रुप रंग नहीं है , जो आंख कान और हाथ - पैर आदि से रहित है , उस नित्य विभु सर्वगत अत्यंत सूक्ष्म एवं अविनाशी ब्रहातत्व को धीर पुरुष ही सब ओर देखते हैं । जिसका मन के द्वारा मनन नहीं होता , जिसकी शक्ति से मन मनन व्यापार में समर्थ होता है , उसी को तुम ब्रह्म जानो । यह सब कुछ अमृतमय ब्रह्म ही है। आगे ब्रह्रा है , पीछे ब्रह्म है तथा दायें और बायें भी ब्रह्म है ।
उपनिषदो में जीव और ब्रह्म का सम्बन्ध इस प्रकार बताया गया है
यथा सुदीप्तात पावकाद् विस्फुलिंगा: ।
सहस्त्रश: प्रभवन्ते स्वरूपा : ।
तथाक्षराद् विविधा: सोम्य भावा:
प्रजायन्ते तत्र चैपापि यन्ति ।।
( मुण्डक ०२।१।१)
सन्मूला: सोम्येमा: सर्वा: प्रजा: सदायतना :
सत्प्रतिष्ठा: ऐतदात्म्यमिंद सर्व तत्सत्यं से आत्मा तत्वमसि
( छान्दोग्य ०)
जैसे जलती हुई आग से उसी के समान रुपवाली सहस्रो चिंगारियां निकलती रहती है , उसी प्रकार हे सोम्य ! अविनाशी ब्रह्रासे नाना प्रकार के भाव ( जीव) उत्पन्न होते और उन्ही मे लीन होते हैं। हे सोम्य ! ये सारी प्रजा सत् रूपी कारण से ही उत्पन्न हुई है,
संत में ही निवास करती है और अन्त में भी सत में ही प्रतिष्ठित होती है । यह सब कुछ ब्रह्मरुप ही है । वह ब्रह्म ही सत्य है , वही आत्मा है । वह ब्रह्म तू है ।
जय श्री कृष्ण
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