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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
भारत के लोग उपनिषदों के मार्ग का अनुसरण करने पर सभी प्रकार के दोषों से कैसे मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं आईए जाने ?
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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दार्शनिक विद्वान उपनिषद शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार बतलाते हैं उप+ नि इन दो उपसग्रोके के साथ सद धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर उपनिषद इस रूप की सिद्धि होती है । सद धातु के तीन अर्थ है विशरण ( विनाश ), गति ( ज्ञान और प्राप्ति ) तथा अवसादन ( शिथिल करना ) इन अर्थोंके अनुसार
उपनिषदयति सर्वानर्थकरसंसारं विनाशयति , संसार कारणभूतामविद्यां च शिथिलयति , ब्रह्रा च गमयति इति उपनिषद।
जो समस्त अनर्थो को उत्पन्न करने वाले संसार का नाश करती , संसार की कारण भूत को अविद्या को शिथिल करती तथा ब्रह्रा की प्राप्ति करातीं है, उपनिषद है । इस प्रकार ब्रह्रा विद्या को उपनिषद नामसे कहा गया है तथा इसका यह उपनिषद नाम सर्वथा सार्थक है । उपनिषद का दूसरा नाम वेदांत भी है । यह वेदके अन्त में है , इसलिए वेदांत है अथवा वेद का सिद्धांत चरम तात्पर्य उपनिषद में वर्णित हुआ है, इस कारण इसे वेदांत नाम दिया गया है। रहस्य के अर्थ में भी उपनिषद शब्द का प्रयोग हुआ है । जैसे इत्युपनिषत् ( तै०) अर्थात यह उपनिषद है परम रहस्यभूत आत्मतत्व का बोध कराने वाली विद्या है । यह आत्मतत्व अन्य सब रहस्यों से अधिक रहस्य भूत है; क्योंकि यह हमारे भीतर अत्यन्त निकट है। तथापि मनुष्य माया से मोहित होने कारण इसे नहीं जान पाता । इसके सिवा इस आत्म तत्व रुपी रहस्य ज्ञान हो जाने पर संसार में दूसरी कोई वस्तु जानने योग्य शेष नहीं रह जाती । जैसा कि श्वेताश्वतर उपनिषद् में कहा है
एतज्ज्ञेयं नित्यवात्मसंस्था
नाथ: परं वेदितव्यं हि किंचित।
छान्दोग्य में कहा है एक आत्मा को भलीभांति जान लेने पर यह सब कुछ ज्ञात हो जाता है । ऐसा ही अन्य श्रुतिया भी कहती हैं।
चारो वेदोकी प्रत्येक शाखा में सम्बन्ध रखनेवाली एक एक उपनिषद है । वेद स्वयं अनन्त है : अंत: उनकी शाखाएं भी अनन्त ही होगी । शाखाओकी अन्तन्तताके कारण उपनिषदो की अनन्तता ही सिद्ध होती है । वेदो की अनेक शाखाएं इस समय विलुप्त है तथा उनसे सम्बन्ध रखनेवाली बहुत सी उपनिषदे भी आज उपलब्ध नहीं है । इस समय 108 उपनिषदे प्रकाशित है ।
उनमें ईशा , केन कठ प्रश्न मुण्डक माण्डूक्य तैत्तिरीय, ऐतरेय छान्दोग्य और वृहदारण्यक ये दस उपनिषद ही गंभीरता अर्थ का प्रतिपादन करनेवाली है तथा इन्हीं को सब आचार्योनो ब्रह्मविद्यां के लिए प्रमाणभूत माना है। इन दसो में माण्डूक्य उपनिषद सबसे छोटी और वृहदारण्यकोपनिषद सबसे बड़ी है । सभी उपनिषद सरल और रोचक है तथा सभी प्रायः आध्यत्मतत्वका ही बोध कराती है । बृहदारण्यक और छान्दोग्य उपनिषद में यद्यपि कुछ अन्य उपसनाओको भी उल्लेख है , तथापि ब्रह्रा और आत्मा के एकत्वका बोध ही प्रधान रूप से उनका भी विषय है । सबसे अधिक रहस्यभूत आत्मतत्वका बोध कराने के कारण ही उपनिषदो का स्थान सब शास्त्रो से अधिक ऊंचा है। उपनिषदो में प्रतिपादित ज्ञान ही सबसे उत्कृष्ट है । उपनिषदों में जिस तत्व ज्ञान का विवेचन हुआ है , उससे आगे एक पग भी अबतक कोई तत्वज्ञानी नहीं बढ़ सका है । ऐसी उपनिषदो के अपार ज्ञान की निधि से परिपूर्ण होने कारण ही भारतवर्ष आज सब देशो से परम श्रेष्ठ है इस बात को निष्पक्ष बुद्धि रखनेवाले पाश्चात्य विद्वान भी पूर्णतः स्वीकार करते हैं।
इस समय संसार में भौतिकवाद और नास्तिकता के भाव बढ़ गये है । इससे शान्ति का कहीं दर्शन नहीं होता । यदि वर्तमान समय में तथा आगे जगत में पूर्ण रूप से ही शरण लेनी चाहिए । उनमें बताये हुए साधनों को ही निदिध्यासन होते थे , तबतक देश में सर्वत्र सुख शांतिमयी सम्पदा शुशोभित होती थी । जब से भारतवर्ष उपनिषदों के उपदेश पर ध्यान न देकर पाश्चात्य राष्ट्रो की भांति भौतिकवाद और नास्तिकता का अन्धानुकरण करने में तत्पर हुआ ; तभी से यहां दरिद्रता राग द्वेष आदि दोष अशांति तथा दुखमय कोलाहल बढ़ने लगे हैं यदि अब भी भारत के मनुष्य समझसे काम लेकर अपने पूर्वजों महर्षियों बताते हुए मार्ग आश्रय ले और उपनिषदों की शरण ग्रहण करें तो निश्चय ही सब प्रकार की उन्नति और परम शांति उन्हें प्राप्त हो सकती है।
टिप्पणियाँ
Jay ho
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