सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

जिस भी व्यक्ति ने धर्म के ऊपर अधार्मिक एकाधिकार पर प्रश्न उठाया, उसे शंकराचार्य गिरोह ने मिशनरियों का एजेंट घोषित कर दिया।

जिस भी व्यक्ति ने धर्म के ऊपर अधार्मिक एकाधिकार पर प्रश्न उठाया, उसे शंकराचार्य गिरोह ने मिशनरियों का एजेंट घोषित कर दिया। 
स्वामी दयानंद जीवन पर्यन्त वेद का प्रचार प्रसार करते रहे पर जब बनारस में उन्होंने शास्त्रार्थ में यह प्रश्न उठा दिया कि छोटी छोटी बच्चियों को विधवा होने पर उनकी शादी कराने के बजाय विधवा आश्रम में रखने का क्या औचित्य है? और क्या कारण है कि विधवा आश्रम वहीं पर खुला है जहां पंडे पुजारी रहते हैं??
तब शास्त्रार्थ के नाम पर इस गिरोह ने उनको भोजपुरी में गाली देना शुरू कर दिया और कंकड़ से मारकर उनका ध्यान भटकाना शुरू कर दिया। 
इसी गिरोह ने भारतेंदु हरिश्चंद और काशी नरेश को बहकाकर दूषणमालिका नामक पुस्तक उनसे लिखवाई जिनमें दयानंद सरस्वती को अंट शंट गाली लिखी गई थी और उसके प्रकाशन का पैसा काशी नरेश से लिया गया। 
बाद में भारतेन्दु और काशी नरेश दोनों लोगों को गलती का एहसास हुआ और भारतेंदु ने तो बकायदे क्षमा माँगकर अपने सभी पत्रिकाओं का उन्हें सलाहकार बना लिया। 

विवेकानंद जब धर्म संसद में गए तो इस गिरोह ने इनको शूद्र घोषित करके अयोग्य बताने का प्रयास किया पर ईश्वर की इच्छा कुछ और थी। विवेकानंद इन लंपटो की चिंता किए बिना अपना काम करते रहे। जब हमले अत्यधिक बढ़ गये तो विवेकानंद ने इस का जबाब दिया और कहा कि हम चित्रगुप्त के कुल के हैं। हम लोग नहीं लिखेंगे बोलेंगे तो कौन लिखेगा बोलेगा?? 

बाद में इस धूर्त गिरोह को जब कोई आरोप नहीं मिला तो इन लम्पटो ने विवेकानंद के सफलता से भयभीत होकर उनके ऊपर वह निकृष्ट आरोप लगाया जिससे उनके क्रेडीबिलिटी को ही समाप्त कर दिया जाय। इस लम्पट शंकराचार्य गिरोह ने उनके ऊपर भगिनी निवेदिता के साथ ग़लत रिश्ते का आरोप लगाया। इस आरोप के अगले दिन ही विवेकानंद ने स्वयं को भगिनी निवेदिता से सदैव के लिए अलग कर लिया। ओशो ने अपने प्रवचन में शंकराचार्य गिरोह के इस नीच आरोपों पर खूब खुलकर लिखा बोला है। 

उसी शंकराचार्य गिरोह के लोग आज तक सक्रिय हैं। हमें आपको लगता है कि शायद समय बदल गया है, लेकिन नहीं। समय को शंकराचार्य गिरोह बांधने के ज़िद में है। आज भी तमाम लोग जो उस गिरोह के एजेंट एवं दलाल हैं अथवा अपने दुर्भाग्यपूर्ण मूर्खता के शिकार हैं, वह आज के दिन स्वामी विवेकानंद के योगदान को याद करने के बजाय येन केन प्रकारेन नकारने में लगे हैं और उनको मिशनरियों का एजेंट साबित करने का निर्लज्जतापूर्ण और बेशर्म प्रयास कर रहे हैं। 

इस गिरोह ने राजा राम मोहन राय को मिशनरियों का एजेंट बताया, ईश्वर चंद विद्यासागर को भी एजेंट बताया, स्वामी विवेकानंद को भी एजेंट बताया, स्वामी दयानंद को भी एजेंट घोषित किया, ज्योतिबा फूले, भीमराव अंबेडकर को एजेंट बताया, महात्मा गांधी को बताया, सावरकर को बताया। 
ये जातिवादी ताकते पूरे बेशर्मी से हिंदू समाज और भारत के क़ीमत पर यथास्थितिवादी ताक़तों के साथ मिली रहीं। 

मिशनरियों के लिए एक प्रताड़ित, पीड़ित, विभाजित और अलगाव से युक्त समाज से अच्छा खाने को कौन सा चारा होगा??
वह चारा इसी धूर्त शंकराचार्य गिरोह ने पूरे बेशर्मी, ढिठाई और निकृष्टता के साथ मिशनरियों के लिए उपलब्ध कराया। 

आज भी हर कदम कदम पर इस गिरोह से बचकर रहने की आवश्यकता है वरना एकाधिकार के प्यासे ये लोग आपको कब सनातन के नाम पर चारा बना लेंगे आपको पता भी नहीं चलेगा। 


डॉ भूपेन्द्र सिंह
लोकसंस्कृति विज्ञानी

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