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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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पूर्व जन्म के शास्त्रभ्याससे स्वयं: प्राप्त हुई ज्ञान दृष्टि से भी उपदेश करना सम्भव है , जैसी वामदेवमुनि ने उपदेश किया था । शास्त्रदृष्टिका अर्थ है तत्वमसि सोऽहमस्मि आदि महावाक्यों उत्पन्न अखण्ड परा बुद्धि ।
वेदो के पूर्व भाग में अर्थात कर्मकाण्ड में ज्ञान से भिन्न कर्म मात्र का वर्णन है । वे समस्त कर्म क्रियामात्र है , उन्हें दृष्टि नहीं कह सकते। सब प्रकार की उपासनाएं भी क्रियामात्र ही है , दृष्टि नहीं । कर्मकाण्डोक्त क्रियाओं से ध्यानादि उपासनाओमे इतना ही अन्तर है कि वे मानसिक क्रियाएं हैं ; इन्हें श्रेष्ठ महात्मा पुरूषोने दृष्टान्तपूर्वक सिद्ध किया है । वे क्रियाएं की जा सकती हैं , अन्यथा की जा सकती हैं और नहीं भी की जा सकती हैं । उनका अनुष्ठान विकल्पयुक्त है ; पंरतु दृष्टि वस्तु के अधीन होती है , अतएव उसमें विकल्प सम्भव नहीं है। उपयुक्त ब्रह्मसूत्र में शास्रदृषि के दृष्टांत रूप में वामदेव का नाम आया है । यजुर्वेदीय उपनिषद ( बृहदारण्यक ० १।४।१०) में वामदेव को ऐसी दृष्टि प्राप्त होने का वर्णन मिलता है , जो उनके लिए सूर्य और मनु के साथ अपना अत्यंत अभेद सूचित करनेवाली थी । जिस प्रकार देह देहीका सम्बन्ध होता है , तदनुसार यह दृष्टि नहीं उत्पन्न होती । वामदेव मुनि सुर्य और मनु के शरीर है , ऐसा मानना यहां अभिप्रेत नहीं है और न यही अभीष्ट है । उस दृष्टि के अनुसार सबका आत्म रुप में ही बोध होता है । वामदेव के सर्वात्मा होने पर ही उनकी मनु सूर्य से अभिन्नता होनी सम्भव है । शास्त्र दृष्टया तु कहने से लोक दृष्टि का बाधा हो जाता है । देह और देही ( आत्मा) में अभेद प्रतीतिकी रीति से जो कही कही ब्रह्रा ( आत्मा) में अभेद प्रतीतिकी रीति से जो कही कही ब्रह्रा और आत्मा में विशिष्ट अद्वैत भाव का उल्लेख किया जाता है, उस प्रकार के अभेद रूप अर्थका भान तो लोक दृष्टि से सम्भव होता है । इस विषय में दृष्टांत दिया जाता है जैसे मैं मोटा हूं, मैं श्याम हूं इत्यादि । ऐसे स्थलो में शरीर में ही आत्मदृष्टि से होने कारण देहात्मवादका भ्रम होता है, जो सर्वथा हेय है, यह बन्धन का ही हेतु है । यह बात लोक दृष्टि से भी सिद्ध ही बतायी गयी है । देह देहीम अभिन्नताका बोध त्याज्य है, क्योंकि यह मोक्ष के लिए उपयोगी नहीं है । शास्त्र शब्द का मुख्य अर्थ साक्षात उपनिषद ही है , ऐसा उक्त ब्रह्मसूत्र से अभिव्यक्त होता है । उसमें भिन्न जो शास्त्र है, वह तत्व साक्षात्कार कराने में समर्थ नहीं है । जिस प्रकार (अह वै त्वमसि) ( मैं ही तुम हो) यह महावाक्य है , उसी प्रकार (त्वं वा अहमस्मि ) यह भी ही भगवो देवता इत्यादि श्रुति भी है । यह श्रुति परस्पर व्यतिहार से अर्थात आत्मा को रखने से दोनो की एकता सिद्ध करती हुई उनमें देह देहि सम्बन्ध की कल्पना का विरोध करती है; क्योंकि उस देह देहि सम्बन्ध की कल्पना करने पर तो अवश्य ही ईश्वर भी शरीक रुप माना जायगा तथा जीवात्मा भी उस ईश्वरमय शरीर का शरीरी ,( आत्मा) माना जाने लगेगा। इसी तरहकी अनेकों असंगत आपत्तियां उठ खड़ी होगी । यदि कहे , तब तो कर्म मार्ग की कोई उपयोगिता नहीं है , तो ठीक नहीं; क्योंकि जैसे मनुष्य पहले असत्य मार्ग पर खड़ा होकर ही सत्य को प्राप्त करने की चेष्टा करता है , उसी प्रकार पहले कर्म मार्ग पर चलनेवाला साधक कर्मद्वारा अन्त शुद्धि का सम्पादन करने फिर सत्यस्वरूप ज्ञान का आश्रय ले उपनिषद्गति ( वेदान्तवेद्य ब्रह्म) को प्राप्त कर लेता है। सारी श्रुतियो एक तात्पर्य है; यह बात कठोपनिषद ने यमराज के मुख से कहलायी है । यथा
सर्वे वेदा यत्पदमामन्ति तदे पदं संग्रहेण ब्रवीम ओमित्येतत् ।
सम्पूर्ण वेद जिस पद का बारम्बार प्रतिपादन करते हैं उस पाद को संक्षेप से तुम्हें बतलता हूं। वह ओम है इस वाक्य द्वारा समस्त श्रुतियो की एकार्थताका स्पष्टता : प्रतिपादन किया गया है । माण्डूक्योपानिषद उद्देश्य एकमात्र ॐ करके अर्थ का विवेचन करना ही है । उसमें अ, उ और म_ इस तीनों मात्रा ओके विवेचन के बाद चतुर्थ पाद का वर्णन आया है , उसका वास्तविक अर्थ इस प्रकार बताया गया है वह ब्रह्म परम शान्त परम कल्याणमय अद्वैत ( भेद शून्य) है। वही आत्मा है । क्योंकि वह आत्मा सैकड़ों उपनिषदों के द्वारा भी एक रूप से ही जानने योग्य है । जो ब्रह्म को जानता है वह निश्चय ब्रह्रा ही हो जाता है ।
सारे वेदो का एक तात्पर्य है , जैसा कि सर्वे यत्पदमामनवति इस कठोपनिषद की श्रुति से सिद्ध होता कहा तक कहा जाय, श्रुतियो शीर्ष स्थान में अवस्थित समस्त उपनिषदों का तात्पर्य एकि तत्व में है । यदि पूछो वह तात्पर्य कहा है ? इसका उत्तर यह है कि प्रणवमे ही है यही भाव कठोपनिषद वाक्य भी व्यक्त करता है। जैसे
तोते पदों संग्रहेण ब्रवीमि ; ओमित्येतत।
और उस प्रणवा का तात्पर्य किसमे है ? अद्वैत शिव तत्व में । क्योंकि एकमात्र प्रणव के अर्थ का ही निरुपण करनेवाली माण्डूयोपानिषद् प्रणवके चतुर्थ पाद के अर्थ उपसंहार करती हुई कहती हैं
शान्त शिवमद्वैत चतुर्थ मन्यते स आत्मा स विज्ञेय:
जो शान्त , शिव अद्वैत ब्रह्म है , उसी को ज्ञानी जन प्रणवस्वरूप परमात्माका चतुर्थ पाद मानते हैं । वहि आत्मा है और वही जानने योग्य है । इसलिए
तन त्वा औपनिषद पुरुषं पृच्छामि ।
इस वाक्य द्वारा वृहदारणक उपनिषद में जिसके लिए प्रस्ताव किया गया है,
वेदान्तेषु यमाहुरपुरूषम ।
इस श्लोक द्वारा महाकवि कालिदास ने जिसका अनुवाद किया है,
स तस्मिन्नेवाकाशो स्त्रियमाजगाम उमां हैमवर्ती तां होवाच किमेथद् यक्षमिति । सा ब्रहोति होवाच
इस केनोपनिषद के जिसका ब्रह्रा के नाम से उपदेश किया गया है तथा उपयुक्त माण्डूक्योपानिद् में जिसका चतुर्थ पाद के रूप में उप संहार किया गया है, उस परम कल्याणमय अद्वैत ब्रह्म ही सम्पूर्ण उपनिषदों परम तात्पर्य है ।
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