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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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सकट की पूजा का आज वीडियो किसी ने पोस्ट किया था। तिल का बकरा बनाकर “में में” आवाज़ निकालते हुए उसे धातु के सिक्के से काटा जा रहा था। कभी असली बकरा काटा जाता था वह भी तलवार से। ब्राह्मण समुदाय ही बहुतायत में इस पूजा को विधि विधान से करता है। बाक़ी समुदायों में सकट पूजा कम ही होता है।
बौद्ध धर्म के प्रभाव से इस पूजा के विधान में ख़लल पड़ गया। लोगों ने एक विकल्प के रूप में आटे का बकरा बनाकर उसे तलवार से काटना शुरू किया लेकिन उससे उनका अपराधबोध शायद कम नहीं हुआ। उसके बाद लोगों ने आटे के बकरे के बजाय छोटा सा प्रतीकात्मक तिल का बकरा बनाना शुरू किया और बकरे की जगह ख़ुद ”में में” करते हुए धातु के सिक्के से उसे काटना शुरू कर दिया।
बला का लगना और उसके उपाय में बलि का देना, हिंदू धर्म में सामान्य चलन था। शर्मा और बाजपेयी ये दो जातियाँ विशेष रूप बलि में अपनी भूमिका निभाती थीं। वाल्मीकि रामायण में अश्वमेद यज्ञ के बारे में विस्तार से वर्णन है। अश्वमेद यज्ञ का अर्थ भी घोड़े की चर्बी से किए जाने वाला यज्ञ ही था।
मैदानी क्षेत्र और तराई को बुद्ध ने अत्यधिक प्रभावित किया और यहाँ के जीवन शैली में आमूलचूल परिवर्तन आ गया। ब्राह्मण, श्रमण और आजीवक तीनों ने एक दूसरे पर खूब प्रभाव डाला और एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा। यह तीनों परम्परा वैदिक गण व्यवस्था में शिथिलता और सामंती व्यवस्थाओं के आने के साथ समानांतर रूप से आगे बढ़ीं। सम्राट अशोक के शिलालेख इनके बारे में विस्तार से बताते हैं और यह भी बताते हैं कि उसके काल में इन तीनों समुदाय के बीच मेलज़ोल (समवाय) बढ़ाने के लिए धर्माधिकारियों की नियुक्ति हुई और सभी समुदायों के प्रमुख लोगों को कहा गया की वह बेवजह एक दूसरे की बुराई न करें और अपने वाणी में संयम (वाचगोचि) रखें।
श्रमण परम्परा ने अहिंसा और संयम को विशेष रूप से भारत को सिखाया, ब्राह्मण परम्परा ने आत्मा के निरंतरता को साबित करके लोगों के भीतर अभयता उत्पन्न करके उनको लड़ने लायक़ बनाया, वहीं आजीवकों ने नियतिवाद को समझाकर लोगों को संतोषी प्रवृत्ति का बनाया। इन तीनों ने एक दूसरे को प्रभावित करके भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
अहिंसा अपनों के प्रति, हिंसा दूसरों से राष्ट्ररक्षा के लिए और संतोष अपने व्यक्तिगत जीवन में, तीन धाराओं के तीन महत्वपूर्ण संदेश थे। इन शिक्षाओं का प्रयोग कहाँ करना है, यह भी तय था। बाद में इनमें घालमेल शुरू हो गया।
अहिंसा के दिखावे ने शत्रुओं के प्रति अहिंसा का भाव जगाया जिससे हम सीमा पर बाहर से कमज़ोर हुए, आत्मा के निरंतरता ने निर्भयता देकर लड़ने का माद्दा दिया तो राज्य आपस में ही लड़ने लगे और हम अंदर से कमजोर होने लगे, संतोषी प्रवृत्ति सभी चाहते थे पर अपने लिए नहीं, दूसरे के लिए। सभी शिक्षाएँ सही थीं पर अलग-अलग काल और परिस्थिति के लिए। लोगों ने इसमें घालमेल कर डाला।
खैर बुद्ध और आजीवकों की शिक्षाएँ पहाड़ एवं जंगल में बहुत नहीं पहुँची। पहुँचीं भी तों भारत सीमा के बाहर के पहाड़ी देशों में। भारत के पहाड़ और जंगल में मूल हिंदू धर्म जो प्रकृतिपरक एवं प्रकृतिपूजक था जो वैदिक गण व्यवस्था में अंतर्निहित था, बचा रहा। आज भारत का पूरा पहाड़ और जंगल उसी मूल प्राकृतिक धर्म को मानता और जीता है। पहाड़ों में उसी का रूप आगे चलकर शाक्त सम्प्रदाय के रूप में फैला जबकि जंगल में प्रकृतिपरक धर्म ज्यों का त्यों बना रहा। दोनों जगहों पर बला और बलि बचा हुआ है। पहाड़ और जंगल दोनों में मुर्ग़ा, बकरा अथवा भेड़ की बलि हज़ारों साल से अनवरत जारी है। उसमें कभी कोई व्यवधान नहीं पड़ा।
अब अचानक कुछ लोगों को लगने लगा है कि मुर्ग़ा, बकरा आदि के सेवन से पहाड़ खिसक रहे हैं। कुछ लोगों को लग रहा है कि नव विवाहित जोड़े पहाड़ में जाकर संबंध बना रहे हैं जोकि उनका शास्त्रोक्त धार्मिक अधिकार भी है, उससे पहाड़ में दरार आ रही है। ऐसी मूर्खता पर सिवाय हसने के और कुछ नहीं किया जा सकता। पहाड़ पर जिस शाक्त सम्प्रदाय का हज़ारों साल से राज रहा है उसकी तमाम बाममार्गी तांत्रिक साधनाओं को बिना यौन क्रियाओं के पूर्ण ही नहीं किया जा सकता। बौद्ध धर्म के कारण उपजे अपराध बोध से प्रभावित आज का हिंदू धर्म पहाड़ों के मूल हिंदू धर्मियों को हिंदुत्व सिखाने को लालायित है। शुद्धतावाद के पाश में पहाड़ों को जकड़ने के लिए बेताब हैं।
लोगों के स्थानीय सम्प्रदाय को निगलने के लिए आतुर ऐसे शुद्धतावादी गिरोह से बचने की आवश्यकता है।
कहीं कोई दुर्घटना हो रही है तो यह प्राकृतिक भी हो सकती है और असंतुलित निर्माण कार्य से भी। पहले तो यह पहचान करिए कि हलचल से युक्त हिमालय में घटने वाली घटना कोई प्राकृतिक घटना है या मनुष्यों द्वारा पैदा की गई? फिर यदि मनुष्य दोषी है तो उसके पीछे का मूल कारण क्या है? उस पर विचार करिए कि क्या यह नदी के बहाव के दिशा में परिवर्तन से हो रहा है? अत्यधिक निर्माण से हो रहा है? सीवर लाइन ठीक से न होने से हो रहा है? फिर उसके अनुसार सुधार करें।
लेकिन हर दुर्घटना को मौक़े की तरह लपककर स्थानीय सम्प्रदाय और मूल धर्म पर हमला बोलना, यहाँ तक कि विवाहित जोड़ों के यौन संबंध पर प्रश्न उठाना, सामरिक रूप से महत्व के निर्माण पर अप्रत्यक्ष तौर पर उँगली उठाना बेशर्मी है। इस बेशर्मी से समस्या का हल तो कभी नहीं निकलेगा पर एक नया विवाद अवश्य खड़ा होगा।
डॉ भूपेन्द्र सिंह
लोकसंस्कृति विज्ञानी
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