सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

उपनिषदों का एक अर्थ है , एक परमार्थ है भाग २




यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन क पश्येत , तत्केन क जिघ्रेत , त्तक्तेन कं श्रृणुयात् , तत्केन क विजानीयात् ।
          (२।४।२४ ) 


जिस अवस्थामे इसके लिए सब कुछ आत्मा ही हो जाता है , उस समय किसके द्वारा देखे , किसके द्वारा किसको सुने तथा किसके द्वारा किसको जाने - यह बात भी वही ( वृहदारणक) उपनिषद कहती हैं। 

तब द्वैतके भान का हेतु क्या है ? तत्वपरीक्षक कहते हैं कि द्वैतभान का हेतु मिथ्या ज्ञान है और वह मिथ्या ज्ञान ही हम समस्त संसार का बीज है, ऐसा न्यायवेता आचार्यों ने निश्चय किया है। इसका निवारण एकत्वदर्शनरुपी औपनिषद ज्ञान के द्वारा होता है , इसलिए यह उपनिषद् विद्या प्राणियों का परम उपकार करती है । ज्ञान ही अज्ञानका विरोधी है । द्वितीय वस्तुकी प्रतीतिम कारणभूत अज्ञानको दूर करने वाला एकत्वसाक्षात्काररूप ज्ञान ही । मनोनिग्रह और भगवदुपासना आदि सारे ही शास्त्र प्रसिद्ध साधन एकत्वसाक्षात्कार की उत्पति में ही प्रयोजक होने कारण पहली सीढ़ी आते हैं ।  

तं त्वौपनिषद पुरूषं पृच्छामि । 
इस श्रुति वाक्य में जिसकी जिज्ञासा की गयी वह उपनिषद वर्णित ब्रहातत्व  

सर्व खल्विदं ब्रह्म।              ( छान्दोग्य ०३।२४।१) 
आनन्दो ब्रहोति व्यजानात्।  ( तैत्तिरीय ०३।६।१।) 

विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ।           ( वृहदारणक० ३।९।२८) 


इत्यादि श्रुतियो द्वारा बारम्बार गाया जानेवाला परम आनन्द घन ही है , अतः यह प्राणियो के लिए परम पुरुषार्थ स्वरूप है । इसका ज्ञान कराने वाली उपनिषद भी प्राणियों के लिए सहस्रो माता पिता की अपेक्षा भी परम प्रिय है , अतएव परम उपकार करनेवाली है । 

सहस्रो माता पिता की अपेक्षा भी मनुष्य का परम हित चाहने वाली उपनिषद विद्या स्वयं ही औपनिषद युक्ति प्रदर्शित करती है। कारण से कार्यम जो भेद जान पड़ता है वह केवल नाम और रूप को लेकर ही है। घट यह नाम भेद है । यही नाम और रूप श्रुतियो में भिन्न भिन्न स्थलो पर त्याग देने योग्य बताए गए हैं सर्वत्र इनको त्यागनेने लिए ही सूचित किया गया है । 


आकाशो वै नाम नामरुपयोर्निनिर्वहिता ते यदन्तरा तदब्रहा । 
          (छान्दोग्य ८।१४।१)

निश्चय पूर्वक आकाश ही नाम और रूप का निर्वाह करने वाला अर्थात उनका आधार है, वे दोनों जिसके भीतर है , वह ब्रह्म है ।

नाररूपे व्याकरवाणि  
     ( छान्दोग्य० ६।३। २) 

मै नाम रुप को विशेष रूप से व्यक्त करूं । 

सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते ।  
बुद्धि प्रेरक परमेश्वर सब रूपो की रचना करने उनके नाम रखकर उन नामों के द्वारा स्वयं ही व्यवहार करता हुआ स्थिति है । 

मृतिका ही घट है , कारण ही कार्य है नाम भेद अथवा आकार - भेद केवल काल्पनिक है । अतएव श्रुति कहती हैं 


वाचारभ्भणं विकारों नामधेयं मृतिकेत्येव सत्यम । 
    (छान्दोग्य ० ६।१।४) 

विकार ( कार्य) वाणी का विलास मात्र है , वह नाम मात्र के लिए है । वास्तव में वह घटरुप विकार नहीं केवल मृतिका ही है ऐसा मानना ही सत्य है । 

मृतिकेत्येव इस पद में एव शब्द से समस्त विकारो का मिथ्यात्व तथा कारण का सत्यत्व स्पष्ट किया गया है । इस प्रकार कारण परम्परा का विचार करते करते सबका परम कल्याण ब्रह्म ही है , यह निश्चित होता है । एकमात्र ब्रहा ही बिना किसी उपचार के परमार्थ सत्य है तथा ब्रह्म के अतिरिक्त समस्त पदार्थ मिथ्या एवं कल्पित है । यह बात श्रुति के द्वारा तात्पर्यनिर्णय करनेवाली युक्तियों के प्रदर्शनपूर्वक स्पष्ट रूप से कह दी गयी है परमार्थ का ज्ञान और पुरूषार्थ का अनुभव कराने के कारण विद्याओंकें ज्ञाता देवर्षि नारद जी जन्मजात महासिद्व योगी सनत्कुमार के पास ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए गये इस छान्दोग्योपनिषद् आख्यायिकासे तथा _ 

स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठाम। 
इस मुण्डकोपानिषद के वाक्य से भी यह सिद्ध होता है कि परमार्थ रूप परम पुरुषार्थ का अनुभव कराने के कारण उपनिषद् विद्या परम उपकारिणी है । 



जय श्री कृष्ण 




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