सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

हिंदू समाज के लिए जाति पहले धर्म बाद में ऐसा क्यों?

आप हिंदू धर्म को सड़क पर गाली दीजिए, उसके किताबों के चौराहों पर आग लगा दीजिए, उसके देवी देवताओं को गाली दीजिए। आपको कोई कुछ नहीं कहेगा। कहेगा भी तो एक सामान्य विरोध के स्वर के रूप में।

लेकिन आप किसी विषय में जातियों की सामान्य चर्चा भी कर दीजिए, और ये प्रत्येक जाति पर समान रूप से लागू होता है, लोग आपको नोचने लगेंगे। आपको धमकी देने लगेंगे। आप पर हमला करेंगे। 

क्यूँ??

क्यूँकि जाति इस देश में अधिकांश लोगों ने अपनी प्रथम आइडेंटिटी बना रखी है और हिंदू पहचान तो सबसे आख़िरी में आता है। इसीलिए हिंदुत्व पर चोट करिए वह उद्वेलित नहीं होते पर यदि उन्हें यह ज़रा सी शंका भी हो जाय की आप उनके जाति को छू रहे, वह मरने मारने पर आमादा हो जाते हैं। 

महाराणा प्रताप के साथ तो राजपुरोहित भी लड़े, भील भी, छापेमारी के दौरान खेतिहर भी, हद तो यह है की मुसलमान भी लड़ा। लेकिन मुग़लों के साथ मुसलमानों के अतिरिक्त केवल उन्हीं के समाज के लोग थे। 

तो क्या कोई समाज बुरा अथवा अच्छा हो सकता है? 
क़तई नहीं।
हर समाज में अच्छे और बुरे लोग होते हैं। वस्तुतः हर समाज अच्छे बुरे का समुच्चय होता है। 
हाँ, जिस समाज के बारे में कम लिखा बोला गया उसे हिंदुत्ववादी व्यक्ति स्वतः ही अधिक प्रेम करेगा। जो बच्चा कमजोर है उस पर माँ बाप, शुभचिंतक अधिक ध्यान दें तो कोई आश्चर्य नहीं। 

समाज को अच्छे लोगों को आदर्श बनाना चाहिए, बुरे लोगों को त्यागना चाहिए। लड़ने भर लड़ने से कोई अच्छा बुरा बन जाता तो लड़ाई लड़ने वाले प्रत्येक व्यक्ति को आदर्श माना जाता। आदर्श वहीं बन सकता है जो हिंदू पक्ष के साथ खड़ा था। 
हिंदू पक्ष के साथ खड़ा प्रत्येक व्यक्ति चाहे जिस जाति समाज वर्ग का हो, हमारे लिए अभिनंदनीय है। वे लोग और याद किए जाने चाहिए जिनको कम याद किया गया। यह पक्षपात नहीं बल्कि उनके सम्मान में जो कमी रह गई उसकी क्षतिपूर्ति है। 

इन सब डिबेट से समाज का वह चरित्र भी देखिए की हिंदू नाम के पहचान पर दो लोगों की भीड़ है पहले वह जो इस व्यवस्था में इसलिए टिके हैं क्यूँकि उनको उच्चता प्राप्त हो रही है जन्म के आधार पर और दूसरे वे लोग टिके हैं जिन्हें नौकरी प्राप्त हो रही है जन्म के आधार पर। इनमें से किसी की प्राथमिक पहचान हिंदू नहीं है, हिंदू और जाति में से एक चुनना हुआ तो हिंदुत्व को कभी भी लात मार सकते हैं, जिनकी पहचान हिंदू है, उसे कभी भी गिराने में लग सकते हैं। 
हिंदुत्व के नाम पर झंडा लहराने वाले जातिवादियों को पहचानना आवश्यक है। मज़ेदार बात यह है की ये लोग उन्हीं लोगों पर केवल टूटते हैं जिन्होंने अपनी प्राथमिक पहचान हिंदूबना रखी है अतः पलट कर किसी भी जाति को बुरा भला कहने से वंचित हैं। 
इन तमाम डिबेट से लोगों के वास्तविक चरित्र को पहचानने में और यह समझने में की हिंदू समाज आज इस तथाकथित हिंदुत्व की लहर में भी कहाँ खड़ा है, सहायता मिलती है। 

डॉ भूपेन्द्र सिंह
लोकसंस्कृति विज्ञानी

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