सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

हल्दीघाटी युद्ध में एक समय ऐसा भी आया जब महाराणा प्रताप का मानसिंह के सामने खड़े हो गये

 

हल्दीघाटी युद्ध में एक समय ऐसा भी आया जब महाराणा प्रताप का मानसिंह के सामने खड़े हो गये। महाराणा प्रताप के भाले से मानसिंह के हाथी का महावत मारा गया वहीं जब महाराणा ने अगला प्रहार मानसिंह पर किया तो वह अपने हौदे में छिप गया।इस दौरान राणा प्रताप के घोड़े चेतक का पैर कट गया और वह असंतुलित हो गया। 
मौक़े के ताक़ में लगा मानसिंह का भाई माधव सिंह भाला लेकर महाराणा के सीने में उसे घुसाने दौड़ा। यह देखकर मानसिंह ने चिल्लाया की महाराणा जी हिन्दुआना शेर हैं, उन्हें जान से नहीं मारना। इस पर माधव सिंह ने भाला उल्टा करके उनके मुँह पर चोट देकर हट गया। एक रात पहले भीलों ने महाराणा को सूचना दी थी मानसिंह शिकार करने जंगली क्षेत्रों में आ रहा है। मानसिंह को घेर भी लिया गया था पर महाराणा ने उस परिस्थिति में मानसिंह को मारना अपने शान के ख़िलाफ़ समझा था इसलिए मानसिंह को राजपूत परम्परा भले याद रही हो, न रही हो पर इस ताज़ा घटना ने उसे महाराणा के सिद्धांतों के प्रति श्रद्धावान कर दिया था। 
अगले दिन के युद्ध में शाही सेना के बीच में महाराणा को मेहतर ख़ान ने अपने छावनी से आयी तरोताज़ा सेना के बल पर घेरे लिया। इधर मेवाड़ की सेना जो संख्या में कम थी युद्ध करके थकी हुई थी। यह देखकर सैयदों से जूझ रहा हकीम खाँ सूर भी महाराणा के पास आकर मोर्चा संभाल लिया लेकिन जब चारोर तरफ़ से घिरने लगे तो झाला मान ने निरंतर शस्त्र प्रहार के बीच प्रताप के घोड़े से सेनापति का झंडा उखाड़ कर अपने घोड़े पर लगा लिया। तुरंत राणा को कहा की आप यहाँ से निकालकर सेना संगठित करिए और नए सिरे से हमला करिए। राणा के घोड़ा पहले ही घायल था, उसने अथाह हिम्मत का परिचय दिया और वह राणा को लेकर निकल गया। इधर शाही सेना झाला मान को राणा समझकर टूट पड़ी। झाला मान युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। 
भामाशाह और ताराचंद महाराणा के लिए रास्ता बना रहे थे और उन दोनों का सहयोग कर रहे थे राणा प्रताप के भाई भाव सिंह और मानसिंह। इस दौरान झाला मान के साथ साथ राणा प्रताप के दो भाई कान्ह और कल्ला भी वीरगति को प्राप्त हुए। 
पानरवा के राजा पुंजा अपने भीलों के साथ पिछले दिन ही यह अंदाज़ा लगाकर की जिस प्रकार से शाही सेना के पीछे छावनी से सैनिक निकल निकलकर आ रहे हैं, यहाँ पर रुकना केवल जनहानि कराना होगा, अतः वह अपनी हज़ारों की भील सेना के साथ तुरंत ही पहाड़ियों में छिप गये थे। भीलों के साथ दूसरी समस्या यह थी की तीर धनुष, पत्थर आदि से लड़ने वाले भील परम्परागत युद्ध को बहुत नहीं जानते थे। 
मुग़लों पर नई रणनीति के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रताप ने पहाड़ों में जाना उचित समझा और अंत में रक्त प्रवाह के कारण पर्वत पर चेतक की मृत्यु हो गई। वह वहीं चेतक के अंतिम संस्कार के लिए रुके ही थे की भीलों ने उन्हें खोज लिया। 
शाही सेना इस बात से बहुत परेशान थी की राणा प्रताप इतनी सेना जुटाकर हमारे बग़ल में घूम रहे थे और हमें पता भी न चला?? 
इस युद्ध को किस मुँह से मेहतर ख़ान या मानसिंह शाही सेना की जीत बताते? न राणा की ज़िंदा पकड़ पाए, न मुर्दा, न एक मेवाड़ का सैनिक गिरफ़्तार हो पाया, न जंगल के भील।
मेहतर खान ने शेखी बघारने के लिए मानसिंह से प्रताप का पीछा करने की बात कही, मानसिंह ने कहा की यह गलती करने की जुर्रत न करना। आगे का रास्ता पहाड़ी है। हमारी लड़ाई दिन भर मेवाड़ की राजपूत सेना से चली है। भीलों का मुखिया राणा पूंजा की सेना ताज़ा दम हैं और उन्हें छापेमार युद्ध भी मालूम है और जंगलों का ठिकाना भी। इसलिए इधर गलती से भी इन थके सैनिकों के साथ घुसे तो मारे जाओगे। प्रताप की राजधानी गोगुन्दा हल्दीघाटी के निकट होने से मेहतर ख़ान डींगें हाक रहा था। उधर राणा के पक्ष में सबने निर्णय की अब अपने राजधानी गोगुन्दा जाना चाहिए। वहीं पहले से राजा टोडरमल संधि प्रस्ताव लेकर शाही पक्ष की तरफ़ से डेरा लगाये बैठे थे, उधर संधि न मानने पर आक्रमण के लिए मानसिंह और माधवसिंह सेना लेकर तैयार बैठे थे। 
राणा प्रताप ने गोगुन्दा जाने को मूर्खता करार दिया और कुम्भलगढ़ भी जाने से मना कर दिया क्यूँकि ये सब पास पास होने से तुरंत युद्ध में जाना पड़ सकता था। उन्होंने अंत में कोल्यारी जाने का निर्णय लिया। धीरे धीरे युद्ध की सूचनाएँ आईं। हकीम ख़ान सूर मानसिंह की सेना से लड़ते हुए राणा पक्ष में जहां शहीद हुए वहीं रामदास और नरहरदास भी बलिदान हो चुके थे। प्रताप के अंगरक्षक एवं मामा मानसिंह सोनगरा एवं राणा के हिंदू पक्ष से राजा रामशाह तन्वर उनके तीनों पुत्र शालिवाहन, भवानी सिंह और प्रताप सिंह बलिदान हो चुके थे। इस युद्ध में राणा के राजपुरोहितों में से ब्राह्मण गोपीनाथ पुरोहित और जगन्नाथ पुरोहित ने भी अपना बलिदान दिया। 
पूंजा जो युद्ध के पुराने नियमों को मानने के बजाय छापेमार नीति और जनहानि को बचाने के लिए थोड़ा झुकना भी श्रेष्ठ मानता था, वह युद्ध से पहले दिन शाम को हट जाने के बावजूद वहाँ आया। राणा ने राणा पूंजा को इस बात के लिए बहुत बहुत धन्यवाद दिया की भीलों के कारण उन्हें न केवल युद्ध की प्रति पल जानकारी मिलती रही बल्कि उनकी रणनीति का भी खुलासा होता रहा। उन्होंने राणा पूंजा से कहा की मैं अब कोल्यारी जा रहा हूँ गोगुन्दा और कुम्भलगढ़ की ज़िम्मेदारी भीलों को दे रहा हूँ। राणा प्रताप ने राणा पूंजा से कहा की स्वयं ऊँचाई पर रहकर पर्वत शिखरों से पत्थर लुढ़काकर उन पर हमला करिए और रास्ता रोकिए। ऊँचाई से अचानक तीर मारना शुरू करिए और जंगल में ग़ायब हो जाइए। यदि मुस्लिम पक्ष के सैनिक दो चार की संख्या में कहीं दिखे तो उनको हत कर दीजिए। उनके पक्ष में भय पैदा कर दीजिए। 
राणा पूंजा ने महाराणा को निश्चिंत रहने को कहा और वादा किया की आप जितना सोच रहे हैं उससे अधिक सफलता मिलेगी। राणा पूंजा बुद्धि का बहुत तेज था, उसने युद्ध का परिणाम जानकार सेना हटा लिया था इसलिए उसकी सेना तरोताज़ा थी जबकि मुस्लिम पक्ष की सेना दो दिन युद्ध कर चुकी थी। राणा पूंजा ने भील सेना को दो हिस्से में बाँटा। पहले को हमले की ज़िम्मेदारी दी जबकि दूसरे को मुस्लिम पक्ष के रसद को लूटने की ज़िम्मेदारी दे दी। भील पक्ष ने भैरवनाथ की जय के नारों के साथ राणा प्रताप को कोल्यारी के लिए विदा किया जबकि गोगुन्दा और कुम्भलगढ़ तक स्वयं लड़ने के निश्चय किया। 
अगले दिन सुबह सुबह मेहतर ख़ान की शेखी निकालने के लिए मानसिंह ने कहा की आपकी बड़ी इच्छा थी गोगुन्दा पर क़ब्ज़ा करने की अतः आप आगे सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करके बढ़ेंगे। मानसिंह ने मेहतर ख़ान को सेनाओं समेत आदेश दिया की आगे पर्वत है। यह क्षेत्र भीलों का है, ये मुस्लिम पक्ष को लुटेरा और हत्यारा समझते हैं। चित्तौड़ की लूटमार ने उन्हें मुसलमानों के विरुद्ध खड़ा कर रखा है। यदि यह घटना दोहराई गई तो कभी भी यह क्षेत्र मुस्लिम पक्ष के पास नहीं आ सकेगा। हमारी सेना का आना जाना तक मुश्किल हो जाएगा। 
मेहतर ख़ान आगे बढ़ा ही था की पाँच भीलों ने पर्वत शिखर से पत्थर लुढ़का दिया। मेहतर ख़ान तो बच गया लेकिन उसके साथ के दो घुड़सवार मौक़े पर मारे गए। पकड़ने का आदेश तो दिया पर वह ग़ायब हो चुके थे। घाटी में भीलों के नेता राणा पूंजा के नियत का पता चला तो मुस्लिम पक्ष ने तेज़ी से आगे बढ़ने का निर्णय लिया लेकिन पेड़ों की ओट से भीलों ने उन पर तीरों से हमला कर दिया कई सैनिक इस प्रत्याशित हमले से घायल हो गए। भीलों को पकड़ने के लिए कुछ लोग छोड़े गए लेकिन वो जंगल में भाग गये। आगे खेतों की रक्षा में लगे गोफ़नो  से खेतिहरों ने हमला कर दिया। शाही सैनिक भयभीत हो चुके थे उन्हें हर ओट में भील नज़र आते थे। गोगुन्दा में रक्षा के लिए बीस सैनिक छोड़े गए थे, उन्होंने शाही सेना से अपनी मृत्यु निश्चित होने पर युद्ध किया और सभी बीस सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। गोगुन्दा मानसिंह के नेतृत्व में मुस्लिमों के हाथ तो आया पर वहाँ पर नागरिक ही नहीं बचे थे। मानसिंह भीलों से इतना भयभीत हुआ की दो दिन के भीतर बाहर खाई खुदवाया और अंदर दीवार उठवा दिया। 
दो दिन कोई हमला न हुआ तो मानसिंह को लगा की भील और राजपूत दोनों ग़ायब हो चुके हैं। लेकिन मानसिंह निश्चिंत हुआ ही था की राजपूतों के सद्गुण विकृति से दूर भीलों का नेता राणा पूंजा ने ख़मनोर से मुस्लिम पक्ष के लिए आ रहे रसद टोली पर हमला बोल दिया। याद रहे कि राणा पूंजा ने पहले से सेना के एक हिस्से को इसी रसद टोली पर हमले के लिए विभक्त किया था। जंगल में शाही सेना की तरफ़ से किसी की हिम्मत न थी रसद लें जाने की तो यह काम उस क्षेत्र के बंजारों को दिया गया था। भीलों ने मुस्लिम पक्ष के बंजारों को मारना शुरू कर दिया। बंजारों में यह भय समाहित हो गया की उन्हें रहना तो भीलों के साथ ही है सो जल में रहे मगर से बैर कौन करे। गोगुन्दा को विजय मानकर देखने वाले मानसिंह को यह समझ आ गया की राणा प्रताप ने राणा पूंजा के माध्यम से गोगुन्दा में ले आकर उनको फ़सा दिया। इधर भूखों मरने की नौबत उधर आश्वरोहियों पर भीलों का रोज़ रोज़ हमला। रसद के अभाव में शिकार पर निकलते थी भील मारते और नहीं निकलते तो भोजन नसीब नहीं। आम का मौसम था तो मानसिंह ने आम खाने के लिए कहा। खाने के लिए अब दो विकल्प थे पहला घोड़े को मारकर मांस खाओ और दूसरा आम खाओ। इन दोनों ने गर्मी के मौसम में अधिकांश सैनिकों का पेट ख़राब कर दिया। दो चार का हुआ तो संक्रमण पूरे टोली में फैल गया। कई इस हैज़े से गर्मी में मारे गए। रोज़ राणा की तलाश में टोली निकलती पर ख़ाली हाथ वापस आते। कोई एक सुराग न मिला। भीलों को गिरफ़्तार करके पूछताछ हो सकती थी पर डर था की प्रतिक्रिया में राणा पूंजा सेना लेकर न चढ़ आए। बीमार भूखे घोड़ेविहीन सैनिक भीलों के सामने कैसे लड़ पाएँगे? 
धीरे धीरे पूरा वर्षाकाल किसी तरह बीत गया पर मानसिंह के हाथ सिवाय अपने सैनिकों को खोने के अतिरिक्त कुछ न आया। नागरिक विहीन गोगुन्दा से कोई कर मिल जाय ऐसा भी असम्भव था। 
मुस्लिमों की सेना अंत में लज्ज़ित होकर अजमेर वापस आ गई। मेहतर ख़ान ने अकबर के कान भर दिये की मानसिंह ने राणा पर रात में ही पहुँचकर हमला करने से मना कर दिया था। मानसिंह को अकबर ने सज़ा के तौर पर प्रोटोकॉल में कमी करने का निर्णय किया। मानसिंह को ड्योढ़ी बंद का दंड दिया गया। अकबर की मदिरा पार्टी में रोज़ हसी ठिठोली करने वाले मानसिंह, अकबर के लिये जान देने के लिये तैयार मानसिंह को अकबर के सामने आने से रोक लगा दी गई। मुस्लिम पक्ष ने मुस्लिमों का ही मान रखा। मानसिंह बहुत समय तक मुस्लिम सरदारों के मज़ाक़ का पात्र बना रहा। 
——————————————-
कल एक मित्र ने राणा प्रताप के संबंध में जो लेख लिखा था, वह लेख तीन तरह से मुझे एकतरफ़ा लगा। प्रथम महाराणा प्रताप के विषय में उन्होंने भीलों का नाम लेना तक उचित नहीं समझा जबकि भील समाज आज भी महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानता है, दूसरा उन्होंने उस युद्ध को राजपूत बनाम मुग़ल लिखने की कोशिश की लेकिन यह युद्ध शुद्ध रूप से हिंदू बनाम मुस्लिम थी। मानसिंह को जो अंतिम प्रतिफल युद्ध के बाद मिला वह अकबर के वास्तविक मंतव्यों को स्पष्ट बताता है। तीसरा उन्होंने मेरे इस बात का खंडन किया की मैंने यह क्यूँ लिखा की मुग़ल, ग़ुलामों की तुलना में कम बर्बर थे। ग़ुलामों के समय में राज्यकार्य में मुख्यभूमिका केवल ग़ैरभारतीयों को मिलती थी, दूसरी बात राजकार्य से इतर कोई भी निर्णय लेने पर सीने पर गर्म तवा बाधकर मारने का रिवाज था। उसकी तुलना और ड्योढ़ी बंद की कोई तुलना नहीं है। ग़ुलाम वंश के काल में राजनीति जैसा कुछ नहीं था सब कुछ बर्बर और जाहिलियत भरा। प्रोटोकॉल घटाना बढ़ाना अपने आप में बताता है अकबर के काल तक बर्बरता से बुद्धि की तरफ़ मुस्लिम पक्ष घूम गया था। आप ग़ुलाम वंश के काल में हिंदुओं को मुस्लिमों की तरफ़ से लड़ते नहीं देखेंगे। आप हिंदुओं को राजपदों पर नहीं देखेंगे लेकिन मुग़लों ने बुद्धि लगाई, दाम एवं भेदनीती का प्रयोग शुरू किया। इतिहास भावना के आधार पर नहीं चलता, हमारी इच्छा से नहीं चलता, उसकी अपनी यात्रा है, उसे आप परिवर्तित नहीं कर सकते। वह जैसा है वैसा मानना पड़ता है। 
उससे प्रेरणा लेने और ग़लतियों से सीखना दो ही तत्व प्रमुख हैं। यह अपने अहंकार की पुष्टि एवं कामेडी के लिए बिलकुल नहीं है। 

डॉ भूपेन्द्र सिंह
लोकसंस्कृति विज्ञानी 


टिप्पणियाँ