सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

महाराणा प्रताप के सम्बंध में यह धारणा बना दी गई की उनके काल में में मेवाड़ एक लुटापिटा राज्य था।




महाराणा प्रताप के सम्बंध में यह धारणा बना दी गई की उनके 
काल में में मेवाड़ एक लुटापिटा राज्य था। लोग दाने दाने को मोहताज थे। दरअसल ऐसा लिखने वाले यह दिखाना चाहते थे की जो राज्य मुग़लों की बात नहीं मानता था वह प्रजा को कष्ट देने वाला राज्य था।
जबकि महाराणा प्रताप अत्यंत बुद्धिमान और दूरदर्शी राजा थे। हल्दीघाटी युद्ध के अनिर्णीत होने के बाद जनशून्य गोगुन्दा में मानसिंह एक तरह से क़ैद होकर रह गया। राणा प्रताप को पकड़ने के लिए चार महीने तक किए गए प्रयास जब निष्फल हो गए तो जाड़े के शुरुआत में मानसिंह अजमेर लौट आया। मेहतर ख़ान ने अकबर से चुग़ली करके मानसिंह का ड्योढ़ी बंद करा दिया। मानसिंह न इधर का बचा, न उधर का। 
राणा प्रताप ने जाड़े के बाद कोल्यारी में ही बड़ी बैठक बुलाई जिसमें उन्होंने अपने शासन के सात सूत्रिय कार्यक्रमों की घोषणा की। इसमें सबसे महत्व की दो बातें थी, पहली यह की सीधे युद्ध में जाने के बजाय छापामार युद्ध नीति में जाना चाहिए और दूसरी यह की साम्राज्य की स्थिति भी ठीक करनी चाहिए।जिसके अंतर्गत रसद की सप्लई सबसे महत्व की बात है। 
खेती के लिए योग्य भूमि मैदानी क्षेत्रों की ही थीं इसलिए आबादी भी यहीं पर बसी हुई थी। राणा प्रताप ने अपने जनता को सुरक्षित रखने की दृष्टि से मैदानी क्षेत्र से हटकर पहाड़ों की तरफ़ जाने का आदेश दिया क्यूँकि कोई छोटी से छोटी बात पर मुग़ल इन मैदानी क्षेत्रों में चढ़ आते। जनता जैसे ही पर्वतों की तरफ़ गई उस संपूर्ण क्षेत्र के कुंओं, तालाबों और जलस्रोतों को मिट्टी से भरकर नष्ट कर दिया गया। उन स्थानों पर खेती करना और अनाज संचय करके रखना राजद्रोह घोषित किया गया और उसकी सजा मृत्यु दंड तय हुई। राणा ने इन मैदानी क्षेत्रों को जल एवं अन्नविहीन कर दिया। 
उसके बाद राज्य के विशेषज्ञों की सहायता से पहाड़ों के घाटियों में योग्य भूमि की तलाश शुरू हुई। उन्होंने मैदान की प्रजा को बीस मील लम्बे, छ मील चौड़े चारों तरफ़ से पहाड़ से सुरक्षित क्षेत्र में लाकर बसा दिया। गोगुन्दा के भीतरोट के पास नाहेसर में पाँच सौ बीघा ज़मीन को चुना गया वहाँ गेहूं, चना, मक्का और उड़द की खेती राज्य की तरफ़ से शुरू की गई। देसूरी में आम के बाग भी थे और ख़ाली जगह भी, उन्हीं के साथ गेहूँ चना की बुवाई शुरू कराई गई। चावल के लिये पीपलदाड़ी और सीरोड़ की भूमि का चयन हुआ। बेगू इलाक़े के 94 गाँवों में गेहूं और चना पहले से पैदा होता था, उसको और उपजाऊ बनाने पर जोर दिया गया। पहाड़ी घूमंतू जनजातियों के मध्य खेती करने की ट्रेनिंग दी गई। आम, इमली और खिरनी के वनों को राज्यसंपत्ति मानकर संरक्षित कर दिया गया। 
मात्र एक वर्ष के भीतर मैदानी क्षेत्रों की आबादी का पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन होने के बावजूद अगले ही वर्ष मेवाड़ का तीन सौ वर्गमील का वह राज्य धन धान्य से भर गया। 
राणा प्रताप के बारे में यह कहना की उन्होंने घास की रोटी खाई, अप्रत्यक्ष तौर पर यह बतलाने का प्रयास होता है की उनके समय में मेवाड़ कंगाल हो चला था। यह बात सत्य है की लड़ाई दर लड़ाई में मेवाड़ राजकोष कम हो गया था पर यह कहना की जनता उनके राज्य में कष्ट में थी, यह बताने का प्रयास होता है की जिन्होंने समझौता कर लिया, बहन बेटियाँ ब्याह दी उनका निर्णय ठीक था। 
राणा प्रताप को नए दृष्टि से और समग्रता से पढ़ने समझने की आवश्यकता है। 


डॉ भूपेंद्र सिंह जी
लोक संस्कृति विज्ञानी 

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