सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी की दिग्विजय यात्रा का वर्णक्रम अनुसार से वर्णन का प्रसंग ११.१

                                        ॐ 


अनन्तशयन ( चिद ० आ०) - इस स्थान पर आचार्य ने एक मास तक निवास किया था । यह वैष्णवमत का प्रधान केंद्र था । यहां वैष्णव के ६ संप्रदाय रहते थे - भक्त , भागवत प्रकार प्रतिपादित किया - वासुदेव परमेश्वर तथा सर्वज्ञ हैं। वे ही भक्तों पर अनुकम्पा करने के लिए अवतार धारण करते हैं। उनकी उपासना के द्वारा ही मुक्ति प्राप्त होती है तथा उनका लोक प्राप्त होता है । कौण्डिन्य मुनि ने वासुदेव की उपासना कर यही मोक्षषप्राप्त किया था। उसी मार्ग कााअनुसरण हम भी करते   हैं । हम लोग में दो विभाग   है - कोई ज्ञानमार्गी है  और कोई  कर्ममार्गगी है। दोनों केे  के अनुसार मुक्ति शुलभ होती है । अनन्तर छहों     संप्रदायवालो   पंचकालो का विशेष महात्म्य है जिसके नाम है - (१) अभिमान - कर्मणा मनसा वाचा जप ध्यान अर्चन के द्वारा भगवान के प्रति अभिमुख होना (२) उपदान - पूजा निमित्त फ फलपुष्पादि का संग्रह (३) इज्या पूजा (४) अध्याय आगमग्रन्थो का श्रवण और मनन 
और उपदेश ५ योग अष्टांग योग अनुष्ठान । वैखानत मत में विष्णु की सर्वव्यापकता मानी जाती है। कर्महीन संप्रदाय गुरु को ही मोक्ष का दाता मानता है । गुरू भगवान विष्णु से प्रार्थना करता है कि शिष्यों  के क्लेशों को दूरकर उन्हें इस भवसागर से पार लगावे । आचार्य  ने इनकी युक्तियों का सप्रमाण खण्डन किया - कर्म से मुक्ति नहीं होती निष्काम बुद्धि से कर्मो का सम्पादन चित की शुद्धि करता है । तब अद्वैत ज्ञान से मुक्ति मिलती है । वैष्णव ने इस मत को मान लिया । 

अयोध्या (आ०) इस स्थान पर भी आचार्य पधारे थे । इस स्थल की किसी विशिष्ट घटना का उल्लेख नहीं है । 

अहोबल (आ०) - भगवान नरसिंह के आविर्भाव का यह परम पावन स्थल है श्रंगेरी में पीठ की स्थापना कर तथा सुरेश्वर को इसका अध्यक्ष बनाकर शंकराचार्य ने इस स्थल की यात्रा की थी । अतः: यह दक्षिण भारत में ही होगा ‌। इसके वर्तमान नाम का पता नहीं चलता प्रक० ६३ ) 

इन्द्रपस्थपुर (आ०) - यह स्थान प्राचीन इन्द्रपस्थ ( आधुनिक दिल्ली) ही प्रतीत होता है।  शंकराचार्य के समय में यहां इन्द्र के महत्व का प्रतिपादन करनेवाले धार्मिक संप्रदाय का बोलबाला था। आचार्य के साथ इन लोगों का संघर्ष हुआ था । पराजित होकर उन्होंने अद्वैत मत को अंगीकार कर लिया ( प्रक०३३)। 


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यह स्थान सुदूर दक्षिण  के त्रिवेन्द्रम रियासत में तथा दक्षिण के समुद्र के तीर पर अवस्थित है । त्रिवेन्दम के महाराज आज भी वैष्णव - धर्म के उपासक हैं। पद्मनाभ का सुप्रसिद्ध मंदिर भी यही है 

अध्याय २८ ,( चिद्० आन ०पृ० ७-१० ) 
चिद्वविलास अ० ३० आ० प्रक० २३ मा० सर्ग १५ ।


उज्जैनी यह स्थान  आज भी धार्मिक महत्व रखता है। यह मालवा प्रांत के प्रधान नगर है भारत की सप्तपुरियो में यह अन्यतम नगरी रही है । आचार्य के समय में यहां कापालिक मत का विशेष प्रचार था । यहां उन्होंने दो माहिने निवास किया । आनन्दगिरि के कथननुसार उन्मत भैरव नामक शूद्र जाति कापालिक यही रहता था । वहां अपनी सिद्वि के सामने किसी  को न तो उपासक ही मानता था न पण्डित ही । उसे भी शंकर के हाथों पराजय मानना पड़ा । चार्वाक ,जैन नाना बौद्धमतानुयानियो  को भी आचार्य ने परास्त किया । माधव के कथनानुसार यहां भेदभेदवादी भट्ट भास्कर निवास करते थे । शंकर ने पद्मपाद को को भेजकर भेंट करने के लिए उन्हें बुलाया । वे आए अवश्य परन्तु अद्वैत का प्रतिपादन सुनकर उनकी शास्त्रार्थ - लिप्सा जाग उठी । इन दोनों दार्शनिको में तुमिल शास्त्रार्थ छिड़ गया ऐसा आश्चर्यजनक शास्त्रार्थ , जिसमें भास्कर अपने पक्ष की पुष्टि में प्रबल युक्तिया देते थे और शंकर अपनी प्रखर बुद्धि से खंडन करते हैं जाते थे । विपुल शास्त्रार्थ के अनन्तर भास्कर की प्रभा क्षीण पड़ी उन्हे भी अद्वैतवाद को ही उपनिषद  प्रतिपाद्य मानना पड़ा । माधव का यह कथन इतिहास विरूद्ध होने से सर्वथा अग्राह्य है । भास्कर ने ब्रह्म सूत्रों पर भेदाभेद के समर्थन में भाष्य लिखा है जिसमें शंकराचार्य के मत का भरपूर खण्डन है । रामानुज ने वेदार्थ संग्रह में उदयनाचार्य ने न्यायकुसुमार्जलि में तथा वाचस्पति मिश्र ( ८१८ वि० ) ने भामती में इनके मत का उल्लेख पुर सर खण्डन किया है। अतः इनका समय शंकर के साथ इनके शास्त्रार्थ करने की माधवी कल्पना बिल्कुल अनैतिहासिक अथ च उपेक्षणीय है । आचार्य के प्रति समधिक आदर की भावना से प्रेरित होकर ग्रथकार ने भास्कर के उपर शंकर के विजय की कल्पित की है । 




कर्नाटक (मा०) - माधव के कथनानुसार कर्नाटक देश कापालिक मत का प्रधान पीठ था । कापालिक लोगों की हथियारबन्द सेना थी जो सरदार क्रकच की अधीनता में वैदिक धर्मावलंबियों पर आक्रमण किया करती थी । क्रकच का रूप बड़ा भयंकर था श्मशान का भस्म उसके शरीर पर मला रहता था , एक हाथ में मनुष्य खोपड़ी दूसरे हाथ में त्रिशूल चमकता था, वह भैरव का बड़ा उग्र उपासक था शंकराचार्य के शिष्यों से लड़ने के लिए उसने अपनी शिक्षित तथा रणोन्मन सेना भेजी । यदि राजा सुधन्वा अपने अस्त्र शस्त्र से इसे मार नहीं भगाते तो वह शंकर शिष्यों काम तमाम  कर डालती । पर वीर राजा के संग का फल खुब ही फला । मदमत कापालिक तलवार तोमर तथा पट्टिश से ब्रह्माणो पर टूट पड़े पर सुधन्वा ने अपने बाणो से उनका संहार कर शंकराचार्य के शिष्यों की खुब ही रक्षा की । क्रकच इस पराजय से नितान्त क्षुब्ध हुआ और उसने सहायतार्थ स्वयं भगवान भैरव का ही आव्हान किया सुनते हैं भैरव प्रगट हुए और अपने परम भक्त क्रकच को बड़ा डांटा कि वह उनके ही अवतार शंकराचार्य से इतना घोर विरोध किये हुए था । फलत क्रकच का सर्वनाश हो गया आचार्य की विजय हुई। 


जय श्री कृष्ण
दीपक कुमार द्विवेदी 


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