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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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हम आस्तिक हो सकते हैं, नास्तिक हो सकते हैं,
हम कर्म कांड को मानने वाले हो सकते हैं और विरोधी भी हो सकते हैं,
हम राम को आदर्श भी मान सकते हैं और कमी भी निकाल सकते हैं,
हम उन्हे वास्तविक भी मान सकते हैं और काल्पनिक भी,
हम उन्हें भगवान भी मान सकते हैं और इतिहास पुरुष भी,
लेकिन बाबर ने वह मन्दिर तोड़कर मस्जिद इसलिये नहीं बनाया था की उसे राम को नीचा दिखाना था। उसे तो मालूम भी न रहा होगा की राम कौन और कृष्ण कौन??
उसने इसलिये वह मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनाया था ताकी वह पूरे दुनिया में यह सन्देश दे सके की उसने भारत के सनातन, पुरातन, नित्य नूतन जनमानस यानी हिंदू अर्थात् आप और आपके पूर्वजों पर विजय हासिल की है।
वह मन्दिर नहीं तोड़ने गया था। वह आपका स्वाभिमान तोड़ने गया था।
आप अपने आप को चाहे हिन्दू शब्द से जोड़े या न जोड़े, लेकिन पुरी दुनिया की नज़र में आप हिन्दू ही रहेंगे और वह मस्जिद आपके और आपके पुरखों की हार की निशानी ही मानी जायेगी।
इस मस्जिद का हटना उस प्रत्येक व्यक्ति के माथे पर लगे कलंक के हटने जैसा था जो स्वयं को अथवा जिसे दुनिया हिंदू मानती समझती है।
कोई भारतीय मुसलमान इस चित्र को देखकर दुखी होता है तो वह ये याद रखे की हम उसे मुसलमान बना देखकर दुखी हैं क्यूँकि वह केवल एक मुसलमान भर नहीं हैं, बल्कि हमारा अपना लूटा गया, प्रताड़ित किया गया जनबल है।
मुझे पूर्ण विश्वास है की मुसलमानों में आइडेंटिटी क्राइसिस की समाप्ति, हिंदू समाज का एकीकरण और हिंदू समाज में उनका घरवापसी के उपरांत स्वीकृतिकरण यह तीन कार्य एक साथ किया गया तो आज से दो पीढ़ी के भीतर इस लूटे गये जनबल का बड़ा हिस्सा भी फिर से हमारे पास होगा।
डॉ भूपेन्द्र सिंह
लोक संस्कृति विज्ञानी
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