सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

इतिहास बोध और शत्रु बोध जागृति करना क्यो अति आवश्यक है ?



जब हम भारत के अतीत पर दृष्टि डालते हैं, तो एक लंबा, गहरा और रक्तस्नात इतिहास हमारी चेतना को झकझोर देता है। यह केवल एक भूभाग की कहानी नहीं, अपितु एक ऐसे सभ्य और सहिष्णु समाज की कथा है, जिसने शताब्दियों तक अनवरत आक्रमण, लूट, विध्वंस और नरसंहार सहन किए, परंतु अपनी संस्कृति, श्रद्धा और अस्तित्व के मूल बीज को मिटने नहीं दिया।

इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार, इस्लामी आक्रमणों की अवधि—जो लगभग आठ शताब्दियों तक भारत की धरती पर चली—उसमें लगभग 8 से 10 करोड़ हिन्दू जनों की हत्याएं हुईं। यह कोई सामान्य आँकड़ा नहीं, यह उस पीड़ा का प्रतीक है जिसे हमारे पूर्वजों ने आत्मगौरव की रक्षा करते हुए सहा। अफगान, तुर्क, मंगोल, पठान और मुग़ल आक्रमणकारियों ने न केवल मंदिरों को तोड़ा, ग्रन्थों को जलाया, अपितु लाखों स्त्रियों को अपहृत कर उन्हें दासियों के रूप में इस्लामी हरमों में झोंक दिया। यह कोई मिथक नहीं, अपितु फ़िरोज़शाह तुग़लक, बाबर, और औरंगज़ेब जैसे शासकों की आत्मकथाओं में उल्लिखित काले पृष्ठ हैं।

यदि हम ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की ओर देखें, तो वहाँ यह हिंसा अधिक परिष्कृत, परंतु उतनी ही विनाशकारी थी। अर्थशास्त्री रॉबर्ट सी. एलन के अनुसार, 1810 में भारत में निर्धनता की दर जहाँ 23% थी, वहीं 20वीं शताब्दी के मध्य तक यह 50% से अधिक हो गई। इस गिरावट के पीछे केवल आर्थिक शोषण नहीं, अपितु एक सुनियोजित वैचारिक व सांस्कृतिक विलोपन की नीति थी। अंग्रेज़ों ने भारत को 'कच्चे माल के भंडार' और 'उपभोक्ता बाज़ार' में परिवर्तित कर दिया। बंगाल का दुर्भिक्ष (1943) इसका भयानक उदाहरण है, जहाँ ब्रिटिश युद्धनीति के कारण 30 लाख से अधिक भारतीय अकाल में तड़पकर मर गए।

इतिहास गवाही देता है कि भारत केवल तलवार से नहीं, बल्कि शिक्षा, न्याय, भूमि, भाषा, संस्कृति और धर्म की जड़ों पर किये गए वारों से भी घायल किया गया। आज जब हम स्वतंत्रता के 75 वर्षों के बाद पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह समझ आता है कि हमारी पीड़ा केवल भूतकाल की नहीं, अपितु वर्तमान में भी उसके अवशेष जीवित हैं—जैसे जातिवाद, आत्महीनता, और सांस्कृतिक विमुखता।

किन्तु इस पीड़ा की गाथा में केवल दुःख नहीं है—यह एक महान धैर्य, साहस और पुनर्जागरण की भी कथा है। हिन्दू समाज ने हर बार, हर घाव के बाद अपने भीतर से नए तेज, नई ऊर्जा और नये निर्माण की चेतना उत्पन्न की। चाहे वह स्वामी विवेकानंद का आवाहन हो या श्रीअरविन्द का राष्ट्रधर्म; गांधी का असहयोग हो या वीर सावरकर का सशस्त्र प्रतिरोध—भारत की आत्मा कभी मरी नहीं, केवल कुछ समय के लिए विलीन हुई।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस ऐतिहासिक सत्य को आत्मसात करें—न तो प्रतिशोध की भावना से, और न ही हीनता के बोझ से—बल्कि जिज्ञासा, चेतना और उत्तरदायित्व के साथ। क्योंकि जो समाज अपने अतीत को जानता है, वह भविष्य को अधिक विवेकपूर्ण ढंग से आकार देता है।


किसी भी राष्ट्र या सभ्यता के उत्थान और अस्तित्व की रक्षा के लिए इतिहासबोध और शत्रुबोध की चेतना अत्यन्त आवश्यक है। इतिहास केवल घटनाओं का क्रम नहीं, अपितु वह स्मृति है, जो हमें बताती है कि हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं, और किन परिस्थितियों में हमारा वर्तमान स्वरूप गठित हुआ। यह चेतना हमें अपने अस्तित्व के प्रति सजग बनाती है।

इतिहासबोध की अनुपस्थिति किसी समाज को अपनी जड़ों से काट देती है। वह समाज तब बाह्य आकर्षणों, छल-छद्मों और कृत्रिम विचारधाराओं के सम्मोहन में पड़कर आत्मविस्मृति का शिकार हो जाता है। यही तो हुआ हमारे साथ—जब हमने अपने गौरवशाली इतिहास को भुलाया, तो वेदों का ज्ञान पृष्ठों में कैद हो गया, और ग़ुलामी का विष हमारी नसों में उतरता गया।

परन्तु केवल इतिहास को जानना पर्याप्त नहीं, शत्रु को पहचानना भी उतना ही आवश्यक है। शत्रु वही नहीं होता जो तलवार लेकर सामने खड़ा हो, अपितु वह अधिक घातक होता है जो मित्र का मुखौटा पहनकर तुम्हारे संस्कारों को विकृत कर दे, तुम्हारे बच्चों के विचारों को भ्रमित कर दे, और तुम्हारी संस्कृति को "पिछड़ा" सिद्ध कर दे। आज हमारे समक्ष ऐसे ही शत्रु उपस्थित हैं—विचारों के, नीतियों के, और छद्म सहिष्णुता के नाम पर हमारी जड़ों पर प्रहार करने वाले।

कल्चरल मार्क्सवाद, आइडेंटिटी पॉलिटिक्स, पश्चिम प्रेरित सेकुलरिज्म, और वोकिज्म—ये सब आधुनिक युग के ऐसे विषाणु हैं जो हमारी पारम्परिक सामाजिक संरचना, कुटुम्ब व्यवस्था, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों को भीतर ही भीतर क्षत-विक्षत कर रहे हैं। जब तक हिन्दू समाज को यह शत्रुबोध नहीं होगा कि उसके सामने कौन है, कैसे सोचता है, और किन साधनों से वह उसकी आत्मा को नष्ट करना चाहता है—तब तक उसका प्रतिकार भी दिशाहीन रहेगा।

इतिहास हमें बताता है कि मोह और असावधानी का मूल्य बहुत महँगा होता है। पृथ्वीराज चौहान की क्षमा, राजा दाहिर की सहिष्णुता, और हिन्दू समाज की दीर्घकालीन आत्मभ्रमिता—इन सबका परिणाम हमने खोए हुए राज्य, टूटे हुए मन्दिर और रक्तरंजित नरसंहारों के रूप में भुगता है।

इसलिए आज अनिवार्य है कि हम इतिहास को केवल पाठ्यक्रम का विषय न मानें, अपितु उसे आत्मबोध का स्रोत बनायें, और शत्रु की पहचान केवल हथियारों से नहीं, अपितु उसकी विचारधारा, रणनीति और कूटनीति से करें।

जिस दिन हिन्दू समाज अपने इतिहासबोध और शत्रुबोध में पूर्णतया जागृत होगा, उसी दिन उसका पुनर्जागरण अवश्यम्भावी होगा। और यह जागरण केवल अस्तित्व की रक्षा नहीं, अपितु धर्म, संस्कृति और राष्ट्र की आत्मा की रक्षा होगी।

दीपक कुमार द्विवेदी 

टिप्पणियाँ

  1. भारत के युवा वर्ग में से दीपक जैसा कोई युवक जब हिंदुत्व की रक्षा की चिंता करता है और उसके लिए लेख लिखता है तो ऐसा लगता है कि सनातन धर्मी भारत विश्व का सिरमौरना रहेगा। बरहा घाट वाले बजरंगबली दीपक कुमार द्विवेदी जैसे युवकों की रक्षा करें एवं उन्हें समृद्धि व सद्द्धि

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  2. भारत के युवा वर्ग में से दीपक कुमार द्विवेदी जैसा कोई युवक जब हिंदुत्त्व की रक्षा की चिंता करता है व उसके लिए लेख लिखता है तो ऐसा लगता है कि सनातन धर्मी भारत विश्व का सिरमौर बना रहेगा। वरहाघाट वाले बजरंगबली ऐसे चिंतनशील युवकों की रक्षा करें एवं उन्हें इसी प्रकार की सद्बुद्धि के साथ-साथ समृद्धि प्रदान करते रहें।

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