सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी का पुनः अपने मातृभूमि केरल देश में आगमन का प्रसंग १०

        
                                      ॐ 



शंकर ने श्रंगेरी में शारदा की पूजा -अर्चा का भार अपने पट्ट शिष्य सुरेश्वर के उपर छोड़कर अपने ( जन्म भूमि) केरल में जाने का निश्चय किया। उनके हृदय में अपनी वृद्धा माता दर्शन की लालसा उत्कट हो उठी । उन्होंने अकेले ही केरल जाना निश्चित किया । जब वे अपनी जन्मभूमि कालटी की ओर अपना पैर बढ़ाए जा रहे थे तब कितनी ही प्राचीन बातो की मुधर स्मृतियां उनके हृदय में जाग रही थी । उन्हें अपना बालापन स्मरण हो रहा था । माता की ममता मूर्तिमती बनकर उनके नेत्रों के सामने झूलने लगी । उनके हृदय में उनकी सबसे अधिक चिंता थी जिसने लोक उपकार के निमित्त अपने स्वार्थ को तिलांजलि दी थी । जगत के मंगल के लिए उन्होंने अपने एकलौते बेटे को संन्यास लेने की अनुमति दी थी । इतना विचार करते ही उनका हृदय भक्ति से गदगद हो गया । उनका चित लालायित हो रहा था कि कब अपनी वृद्धा माता का दर्शन कर अपने कृतकृत्य बनाऊंगा शंकर आठ वर्ष की उम्र में इसी रास्ते से होकर आये थे ,आज उसी रास्ते से लौट रहे थे अन्तर इतना ही था कि उस समय वे गुरू की खोज में निकले थे और आज वे अद्वैत वेदांत के उद्वट प्रचारक मर्मज्ञ व्याख्याता तथा शिष्यों के गुरु बनाकर लौट रहे थे 


माता: मत्युशय्या पर - इस प्रकार सोचते हुए वे अपने जन्म स्थान कालटी में पहुंचे वहां पहुंचकर उन्होंने अपनी माता को रोगशय्या पर देखा । इतने दिनों के बाद अपने पुत्र को देखकर माता का हृदय खिल उठा , विशेषतः ऐसे अवसर पर जब वह अपने जीवन की घड़ियां गिन रही थी । शंकर ने अंतिम समय पर माता के पास आने की अपनी प्रतिज्ञा को खुब निभाया माता ने प्रसन्न होकर कहा बेटा ! मैं बड़ी भाग्यवती हू कि ऐसे अवसर पर तुम्हें कुशल और प्रसन्न चित्त देख रही हूं । अब मुझे अधिक क्या चाहिए ? बुढ़ापे के कारण जीर्ण शीर्ण इस शरीर  को ढोने की क्षमता अब मुझमें नहीं है । मैं चाहती हूं कि तुम मुझे ऐसा उपदेश दो मै इस भवसागर से पार हो जाऊं । शंकर ने उन्हें निर्गुण ब्रह्म का उपदेश दिया और माता ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस निर्गुण तत्व को मेरी कोमल बुद्धि ग्रहण नहीं कर रही है । अतः तुम सुन्दर सगुण ईश्वर का मुझे उपदेश दो तब शंकर के भुजगप्रयात छन्द से अष्टमूर्ति शंकर की स्तुति की शिव के दूत हाथो में डमरु और त्रिशूल लेकर झट से उपस्थित हो ग्रे । उन्हें देखकर उनकी माता डर गयी उनके साथ जाने में अपनी अनिच्छा प्रगट की। तब आचार्य ने विनयपूर्वक इन दूतो को लौटाया और सौम्य रूप भगवान विष्णु की स्तुति की। माता को रूप पंसद आया । मरण काल उपस्थित होने पर माता ने पुत्र के द्वारा वर्णित कमलनयन भगवान श्री कृष्ण का ध्यान किया और इस प्रकार हृदय में चिंतन करते हुए उसि भाग्यवती माता ने योगियों के समान अपने शरीर को छोड़ा ।  

माता का दाह -संस्कार - अब शंकर के सामने यह बहुत बड़ी समस्या थी कि माता की अन्त्येष्टि क्रिया किस प्रकार की जाय । इस कार्य के लिए उन्होंने अपने बन्धु बान्धवों को भी बुलाया संन्यास ग्रहण करने पहले ही शंकर ने अपनी माता दाह संस्कार अपने ही हाथों करने की प्रतिज्ञा की थी । तदनुसार वे स्वयं इस कार्य के लिए तैयार हो गए । उनके दायादो की हठधार्मिता क्या कही जाय? एक तो वे पहले ही से उनकी कीर्ति कथा सुनकर उद्विग्न थे । दूसरे संन्यासी के द्वारा दाह संस्कार करने का दृढ़ निश्चय किया । वे अपने माता के शव को उठाकर घर के दरवाजे पर ले गये और आग्रह करने पर भी उनको दायादो ने उनकी माता को जलाने के लिए आग तक न दी थी । तब उन्होंने घर के समीप ही सुखी हुई लकड़ियां बटोरी । कहा जाता है कि उन्होंने अपनी माता की दाहिनी भुजा का मन्थन कर स्वयं आग निकाली और उसी से उनका दाह संस्कार किया । अपने दायादो के इस हृदयहीन बर्ताव पर उन्हें बड़ा क्रोध आया । उन्होंने उन ब्रह्माणो को शाप दिया कि तुम्हारे घर के पास ही आज से शमशान बना रहेगा । हुआ भी वही जो आचार्य ने कहा था आज भी मालाबार प्रान्त के ब्रह्माण अपने घर के द्वारा पर अपना मुर्दा जलाते हैं । 

शंकर की यह मातृभक्ति नितांत श्लाघनीय है। उन्होंने उनके चरित्र का बड़ा माधुर्यमय अंग है माता को छोड़कर शंकर का कोई भी सगा सम्बंधी न था । माता की अनुकम्पा से ही उन्हें अपने जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति हुई थी । ऐसी माता की अनुपम ममता का भला वे अनादर कैसे कर सकते थे? इसलिए संन्यास धर्म के आपातत: विरूद्ध होने पर भी तथा दायादो के तिरस्कार को सहने पर भी शंकर ने वह कार्य कर दिखलाया जो उनके चरित्र में सदा चिरस्मरणीय रहेगा ।  

पंचपादिका का उद्धार - पंचपादिका के जलाये जाने पर पद्मपाद अत्यंत दुखित हुए, इसके चर्चा पहले कि जा चुकी है । अब वे गुरू के दर्शन करने के लिए उद्विग्न हो उठे उनको पहले यह समाचार मिल चुका था कि आचार्य आजकल श्रृंगेरी छोड़कर केरल देश में विराजमान हैं । अतः वे अपने सहपाठियों के साथ उनके दर्शन के निमित्त केरल देश में आये । 

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संचित्य काष्ठानि सुशुष्कवन्ति गृहोपकण्ठे धृततोयपात्र: ।
सदक्षिणे दोष्णि ममन्थ वहि ददाह तां तेन च संयिताऽत्मा ।। 


माधव : न दि ० १४४८। 


गुरू सामने शिष्यों ने मस्तक झुकाया । पद्मपाद को चिंतित देखकर आचार्य ने इसका कारण पूछा । तब उन्होंने अपनी तीर्थयात्रा की विचित्र कहानी कह सुनायी : 

भगवन ! जब मैं भगवान रंगनाथ का दर्शन कर रास्ते में लौटा रहा था तब मुझे मेरे पूर्वाश्रम के मामा मिले और मुझे बड़े अनुनय विनय के साथ अपने घर में ले गये । वे थे तो भेदवादी मींमासक , परन्तु मैंने पूर्व वासना के अनुरोध से, उनके भेदवादी होने पर भी ,अपनी भाष्य वृत्ति उन्हें पढ़ सुनायी । जहां कही उन्होंने शंका की वहां मैंने उचित देकर पूर्ण समाधान किया । मैंने आपकी सूक्तियां को अपना कवज बनाकर अपने मातुल को शास्त्रार्थ में परास्त कर दिया,इस पराजय से उनका हृदय छिपे छिपे जल रहा था । परन्तु मुझे इसकी कुछ खबर न थी उनके घर पर मैंने अपनी भाष्य टीका रख दी और बिना किसी शंका के तीर्थटन के लिए चल पड़ा । जब मैं वहां से लौटकर आता हूं तो क्या देखता हूं कि वर्षो का मेरा परिश्रम मामा की कृपा से जलकर स्वाहा हो गया है । मुझमें अब सामर्थ्य न रहा जिससे मैं वृति लिख सकूं । इसी विषय स्थिति ने मुझे इतना चिन्तित बना रखा है । 

 
राजा राजशेखर से भेंट - शंकराचार्य को केरल देश में आया हुआ सुनकर केरल नरेश राजा राजशेखर उनसे भेंट करने के लिए आये । इसी राजा ने शंकर की अलौकिक विद्वता तथा लोकोत्तर प्रतिभा को उनके बाल्यकाल में देखकर उस समय भी आदर प्रदर्शन किया था । यह राजा संस्कृत काव्य का बड़ा प्रेमी था और स्वयं भी इसने तीन नाटको की संस्कृत में रचना की थी । जब वह इस बार शंकर से भेंट करने के लिए आया तो उससे शंकर ने उन नाटको के विषय में पूछा कि सर्वत्र प्रसिद्ध तो हो रहे हैं? परन्तु राजा ने शोकभरे शब्दों में अपनी के विषय असावधानी से उनके जल जाने की बात कही । बालकाल में आचार्य ने इन नाटकों को राजा के मुख से सुन रखा था तभी से ये तीन नाटक उन्हें कण्ठाग्र थे । राजा की इच्छा जानकर उन्होंने इन तीन ग्रंथों को फिर से उन्हें लिखवा दिया । इन दोनों घटनाओं से आचार्य की अपूर्व मेधा शक्ति का अश्रुतपूर्व दृष्टांत पाकर शिष्य मण्डली कृतार्थ हो गयी। 

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राजा राजशेखर के तीन नाटक कौन से हैं,पता नहीं चलता ,। केरल के विद्वान बाल रामायण बालमहाभारत कर्पूरमंजरी को ही ये तीन नाटक मानते हैं जिनका शंकर ने उद्धार किया था । उनकी दृष्टि में कवि राजशेखर ही केरल के राजा राजशेखर है परन्तु यह बात एकदम असंगत है कवि राजशेखर ने चाहमानकुलमौलिमालिक क्षत्रियाणी अवन्तिसुन्दरी से अवश्य विवाह किया था , पर वे थे यायावर ब्राह्मण । घर उनका विदर्भ में था और कर्म क्षेत्र था इस प्रान्त का कान्यकुब्ज नगर । इसी से वे विशेष कान्यकुब्ज के पक्षपाती है । दृष्टवा नगरी प्रचारिणी पात्रिका भाग ६,पृ० ११०-२०१ । 
 राजा ने प्रसन्न होकर कहा कि भगवन! मैं आपका दास हूं । कहिए मेरे लिए आपकी क्या आज्ञा होती है? तब शंकर ने उनसे कहा कि राजन् ! कालटी ग्राम के ब्रह्माणो को मैंने ब्रह्माण कर्म का अनाधिकरी होने का शाप दिया है । आप भी उनके साथ ऐसा ही बर्ताव कीजिएगा । राजा ने इस बात को स्वीकार कर लिया । 

इस प्रकार आचार्य की केरल यात्रा समाप्त की और अपनी शिष्य मण्डली के साथ श्रृंगेरी लौट आए । 



जय श्री कृष्ण
दीपक कुमार द्विवेदी 

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