सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

आत्मा न ब्राह्मण है, न शूद्र।


आत्मा न ब्राह्मण है, न शूद्र 
कर्मफल के कारण आत्मा को शरीर का बंधन होता है। 
शरीर की अवस्था में जाति, लिंग, वर्ण आदि का भेद हो सकता है, परंतु आत्मावस्था में स्वरूप और गुण में कोई भेद नहीं है। 
साधारण मनुष्य उस अभेद्यता अर्थात आत्मावस्था को नहीं देख सकता सो वह वर्ण के आधार पर लोगों को छोटा बड़ा, योग्य अयोग्य आदि का भेद करता हुआ अपने तुच्छता और अल्पज्ञता का प्रदर्शन करता हुआ मनुष्य मनुष्य में भेद करता रहता है।
इस तरह की भेद बुद्धि का कारण अल्पज्ञान से उत्पन्न अहंकार और उस अहंकार के कारण अभेद्य को देखने की क्षमता का विनाश है। वस्तुतः शरीर ही अहंकार का हेतू है।
आत्मा शरीर के बंधन में कर्मफल के कारण आती है।
कर्मफल कर्मों के कारण आता है। 
कर्म प्रयत्न से होता है।
प्रयत्न इच्छा और द्वेष से होता है।
इच्छा और द्वेष सुख दुख से होता है।

सुख और दुख का बोध अनुकूलता और प्रतिकूलता से होता है।
यह अनुकूलता और प्रतिकूलता का बोध इन्द्रियों के कारण होता है। मनुष्य जब तक इन इन्द्रियों की गुलामी कर रहा होता है तब तक इस बंधन मे फसा होकर मनुष्य मनुष्य में भेद कर रहा होता है।
इस तरह से वर्ण आदि आधारित भेद बुद्धि से युक्त व्यक्ति स्वयं ही अल्पज्ञ होकर संशय का पात्र बन जाता है। जिसकी स्वयं की बुद्धि अल्पज्ञ सिद्ध हो जाय, उसके बातों को स्वीकार्य नहीं किया जा सकता। क्युकी दो संशय एक दूसरे का समाधान नहीं कर सकते। 

यह भी मान लिया जाय की अच्छे बुरे कर्मों के आधार पर वर्ण की प्राप्ति होती है तो भी हम दिन प्रतिदिन देखते हैं की ब्राह्मण वर्ण में भी उत्पन्न होकर मनुष्य नीच कर्म करता है और बहुत बार शूद्र वर्ण में भी जन्म लेकर भी उच्च कर्म करता है।
(अर्थात वर्ण अच्छे गुणों की गारंटी नहीं।)
सो ऐसे में तो गुण ही हावी होकर आगे पाप और पुण्य के रूप में फलित होने वाले हैं सो कर्म के आधार पर जो वर्ण पाने के बात की गयी उसका भला क्या फायदा जब वर्ण के आधार पर पुण्य पाने के गारंटी नहीं। 
कई बार क्षत्रिय वर्ण में जन्म लेकर भी मनुष्य गरीब रहता है और कई बार शूद्र होकर भी धनी। तो भी किसी प्रकार से कर्म फल के आधार पर वर्ण प्राप्ति और उसमें श्रेणी की बात स्पष्ट नहीं हो पा रही है। 
(अर्थात वर्ण सुख की गारंटी भी नहीं)
अन्तत: जब आप इस चर्चा को बढ़ाते जायेंगे तो आप यह पायेंगे की कर्मफल के द्वारा शरीर प्राप्त होता है जबकी वह कर्मफल किस प्रकार के हैं उससे नये शरीर में वृत्ति उत्पन्न होती है अर्थात यदि आपके कर्म अच्छे रहे तो आप कम प्रयास से ही इन्द्रियों के गुलामी से बाहर आ जायेंगे जबकी आपके कर्म फल खराब हैं तो मुक्ति के लिये आपको कठिन प्रयास करना होगा।

किसी भी तरह कर्मफल से वर्ण चयन और उसकी उच्चता और निम्नता की श्रेणी स्थापित नहीं हो सकती।
इस पर कोई ब्राह्मण यह कहे की इसका निर्णय मेरे जैसा कोई गैरब्राह्मण नहीं कर सकता बल्की केवल ब्राह्मण कर सकता है तो भी यह साध्यसम दोष हो जायेगा क्युकि जिस पर प्रश्न है वह खुद अपने प्रश्न पर निर्णायक नहीं बन सकता। इसके लिये वह शब्द प्रमाण के रूप में शास्त्रों को लेकर आता है तो शास्त्र का लेखक स्वयं ब्राह्मण हुआ तो वह फिर से साध्यसम दोष का शिकार हो जायेगा। 
यदि वह फिर भी यह कहे की 
ब्राह्मण श्रेष्ठ क्युकी किताब में लिखा है
और किताब सही है क्युकि ब्राह्मण ने लिखा है।
तो वह अन्योन्याश्रित दोष का शिकार हो जायेगा।

कर्मफल के आधार पर वर्ण
वर्ण के आधार पर उच्चता और निम्नता 
यह दोनों किसी भी तरह से सिद्ध नहीं हो सकता।

केवल दो बाते सिद्ध हो सकती हैं।
1- कर्मफल के कारण शरीर की प्राप्ति 
2- उन कर्मों के गुणात्मकता के आधार पर पापात्मक या पुण्यात्मक वृत्ति 

इसके आलावा जो भी बाते हैं सब गपोड़ हैं। जो या तो साध्यसम दोष अथवा अन्योन्याश्रित दोष से युक्त हैं।
वर्ण अलग अलग हैं। पर वह सभी श्रेणी में नहीं है बल्की बराबर हैं।
सुकर्म या कुकर्म के आधार पर वर्ण प्राप्त नहीं हो सकता बल्की वृत्ति प्राप्त होती है। 
कर्म गुण के कारण उत्पन्न होते हैं।
और वृत्तिया गुणों के प्रति होती हैं।
सो मनुष्य गुण प्रधान ही है, वर्ण, जाति या लिंग प्रधान कतई नहीं।

डॉ भूपेन्द्र सिंह 
लोक संस्कृति विज्ञानी

टिप्पणियाँ

  1. आपके पास कोई काम तो है नहीं फोकट में बैठकर प्रवचन देना फालतू में और लोगों को भ्रमित करना

    जवाब देंहटाएं
  2. मैं ब्राह्मण विरोध की राजनीति के उपर तथ्यात्मक लेख लिखा हूं जो बात भूपेंद्र सिंह कर रहे हैं वह अद्वैत वेदांत बात कर है आप चंडाल शंकरचार्य के संवाद का अध्ययन करिए वह प्रसंग शंकराचार्य जी मेरी श्रृंखला में मिल जाएगा

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें