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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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ॐ
कांची - कांची हमारी सप्तपुरियो में अन्यतम है। मद्रास के पास आज भी यह अपनी प्रतिष्ठा बनाये हुए हैं। इसके दो भाग हैं - शिवकांची तथा विष्णुकांची । माधव का कथन है आचार्य ने यहां पर विद्या के अभ्यास के निमित्त एक विचित्र मन्दिर बनवाया और वहां से तान्त्रिको को दूर भागकर भगवती कामाक्षी की श्रुति प्रतिपादित पूजा की प्रतिष्ठा की । आनन्द गिरि ने तो शंकर का कांची के साथ बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध बतलाया है । यहीं रहकर आचार्य ने शिवकांची तथा विष्णुकांची दोनों भागों का निर्माण किया तथा भगवती कामाक्षी की प्रतिष्ठा कि । कामाक्षी वायुरूपिणी ब्रह्राविद्यात्मक रूदशक्ति है । ये गुहावासिनी ही थी । आचार्य ने अपनी शक्ति से इन्हें व्यक्त रूप दिया तथा इनकी विशिष्ट प्रतिष्ठा की । श्रीचक्र की भी प्रतिष्ठा इस नगरी में शंकर ने की। कामकोटि पीठ के अनुसार शंकर ने अन्त में यही निवास किया था । उन्होंने देवी उग्रकला को अपनी अलौकिक शक्ति से शान्त कर उसे मृदु तथा मधुर बना दिया। कामाक्षी के मन्दिर में श्री चक्र की स्थापना तथा कामकोटि पीठ की प्रतिष्ठा उसी समय आचार्य ने की। कांची के राजा का नाम राजसेन था, जिसने आचार्य की अनुमति से अनेक मन्दिर तथा देवालय बनाया । शंकर ने कामक्षी के मन्दिर के बिल्कुल मध्य स्थान बिंदु स्थान मे स्थित मानकर श्रीचक्र मानकर श्रीचक्र के आदर्श पर कांची को फिर से बसाया । इन तीनों विभिन्न ग्रन्थों की सहायता से स्पष्ट प्रतीत होता है कि शंकराचार्य ने कांची में कामाक्षी के मन्दिर तथा श्री चक्र की स्थापना की थी । कांची का वर्तमान धार्मिक वैभव शंकर के ही प्रयत्नों का फल है ।
कामरूप ( मा०) यह स्थान आसम प्रान्त का मुख्य नगर है जहां कामाख्या का मन्दिर तान्त्रिक पूजा का महान केंद्र है। शंकर ने इस स्थान की भी यात्रा की । यहां माधव ने उन्हें अभिनवमुक्त के पराजित करने की बात लिखी है । परन्तु यह घटना ऐतिहासिक प्रतीत नहीं होती । अभिनवगुप्त काश्मीर के निवासी थे। वे प्रत्यभिज्ञा दर्शन के नितांत प्रौढ़ तथा माननीय आचार्य है । वे साहित्यशास्त्र के महारथी हैं । अभिनव भारती तथा लोचन ने इनका नाम साहित्य जगत में जिस प्रकार अमर कर दिया है ,उसी प्रकार ईश्वर प्रत्यभिज्ञाविमार्शिनी तन्त्रलोक जगत में जिस प्रकार अमर कर दिया है, उसी प्रकार ईश्वर प्रत्यभिज्ञाविर्शिनी , तन्त्रलोक परमार्थसार , मालिनीविजयवार्तिक तथा परात्रिंशिका विवृति ने त्रिक ( शैव) दर्शन के इतिहास
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आ० ६६-६५ प्र० मा० सर्ग १६
सुरधाम च तत्र कारयित्वा परविद्या चरणानुसारि चित्रम ।
अपवार्य च तान्त्रिकानतानीद्वगवत्या श्रुतिसम्मता सपर्याम।
माधव : शं० दि० ,१५/५।
आनन्दगिरि - शं० दि० (६३-६५ प्रकरण)।
प्रकृति च गुहाश्रया मनोज्ञ स्वकृते चक्रवरे योगे ।
अकृताश्रिसौम्यमूर्तिमार्या सुकृतं न: स चिनोतु शंकराचार्य ।। गुरू रत्न मालिका ।
चिद्विलास - शं० वि० वि० ,२५, वां अध्याय आनन्दगिरि - शं० वि ० ६३, प्रकरण ।
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मैं इन्हें चिरस्मरणीय बना दिया है । ये अलौकिक सिद्व पुरुष थे । ये अर्ध त्यम्बक मत के प्रधान आचार्य शम्भुनाथ के शिष्य और मत्स्येंद्रनाथ संप्रदाय के एक सिद्ध कौल थे । इनका समय अनेक प्रमाणो से ११ वे शतक का उत्तरार्ध है - ठीक शंकर के समय से तीन सौ वर्ष बाद । इन्हें ब्रहासूत्रो के उपर किसी प्राचीन पण्डित का शक्तिभाष्य उपलब्ध नहीं होता । अतः ११ वी शताब्दी के उत्तरार्ध में विद्यमान काश्मीरक शैव दार्शनिक अभिनवगुप्त के साथ अष्टम शतक हूं विद्यमान शंकराचार्य के शास्त्रार्थ की कल्पना नितांत अनैतिहासिक है। दार्शनिक जगत में अभिनव की कीर्ति बहुत बड़ी है । अतः शंकर की महत्ता दिखलाने के लिए ही इस शास्त्रार्थ की घटना कल्पित की गयी है।
काशी - इस पुण्यमयी विश्वनाथपुरी के साथ शंकराचार्य का बड़ा ही घनिष्ठ सम्बन्ध है । आचार्य को अपने लक्ष्य की सिद्धि में काशीवास से बहुत ही लाभ हुआ ,इसे हम नि संकोच भाव से कह सकते हैं । माधव के कथनानुसार भगवान विश्वनाथ की स्पष्टा आज्ञा से शंकर ने ब्रह्रासूत्रो पर भाष्य लिखने का संकल्प किया जिसे उन्होंने उतर काशी में जाकर पूरा किया । आनन्दगिरि तो काशी को ही भाष्यो के प्रणयन का स्थान बतलाते हैं । यही रहते समय वेदव्यास से शंकराचार्य का साक्षात्कार हुआ था । यही आचार्य ने कर्म चन्द्र ग्रह क्षपणक पितृ गरूड़ शेष सिद्वि आदि नाना मतों के सिद्धांतो का खण्डन कर वैदिक मार्ग की प्रतिष्ठा की थी । काशी में मणिकार्णिका घाट के उपर ही आचार्य का निवास था, इस विषय में दिग्विजयो में दो मत नहीं है
कुरु ( मा० चिद०) -कुरूदेश प्रसिद्ध ही है । इसकी प्रधान नगरी इन्द्रपस्थ का नाम पहले आ चुका है । यहा विशेष घटना का उल्लेख नहीं मिलता है -( चिद० ३१ सर्ग,मा० १६ सर्ग)।
केदार (आ०) -उतराखण्ड का यह सुप्रसिद्ध तीर्थ है इसकी प्रसिद्धि बहुत ही प्राचीन काल से है । पुराणों में यह तीर्थ बड़ा ही पवित्र तथा महाशक्तिशाली माना गया है - ( आ,० ५५ प्रक० )
गणवर (आ०) यह नगर दक्षिण भारत में था । यह गणपति की पूजा का प्रधान केंद्र था। यहां शंकर ने बहुत दिनों तक अपने शिष्यों के साथ निवास किया। यहा गणपति के उपासकों के विभिन्न संप्रदाय थे- महागणपति , हरिद्रा, गणपति , उच्छिष्ट गणपति ,नवनीत स्वर्ण तथा सन्तान गणपति के पूजक , जिन्हें शंकर ने परास्त कर अद्वैतमत में दीक्षित किया था।
गया (आ०) -यह बिहार प्रांत का सुप्रसिद्ध तीर्थ है जहां श्राद्ध करने से प्रेतात्माए मुक्ति लाभ करती है -( मा० प्रक० ५५)
जय श्री कृष्ण
दीपक कुमार द्विवेदी
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