सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

ब्रहाण विरोध के नाम पर सियासी खेल का सच क्या है ?

 ब्राह्मण बनिया भारत छोड़ो, जेएनयू में नारा लिखा गया है।
कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से केवल उसके जन्म के आधार पर चिढ़न, कुंठा, दुश्मनी आदि रखता है तो वह मानसिक रूप से बीमार है।
हो सके तो ये मूर्ख कुंठित दलित क्रांतिकारी ब्राह्मणों से शिक्षा लें की किस प्रकार हर कठिन से कठिन परिस्थिति में ख़ुद को बचाकर रखा जाता है, बनियों से सीखें की ज़रा सा शक्ति और संपत्ति पैदा हो तो उछलने कूदने और दूसरे को नीचा दिखाने के बजाय और शांत सौम्य और गंभीर हो जायें।
वास्तविक दलित चिंतन का ठेका समदर्शी हिंदुत्ववादियों के अतिरिक्त कोई नहीं ले सकता। बाक़ी सब दलितों का नाम आगे करके उनका राजनीतिक उपयोग के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते। 
यदि तुम वर्णाश्रम मत के आधार पर हिंदू धर्म से घृणा करते हो तो तुम ख़ुद वर्णाश्रम मत को हिंदू धर्म का पर्यायवाची बनाने की लम्पटता कर रहे हो। हिंदू धर्म एक नैसर्गिक धर्म है। दुनिया का प्रत्येक जन्म लिया हुआ बालक बालिका हिंदू होता है, उसे ट्रेनिंग देकर किसी मत में भेजा जाता है। जंगल में पैदा हुआ एक कोल, भील, संथाल, थारु जिसने किसी मत का एक अक्षर भी ना पढ़ा हो तो भी प्रकृति से साम्य बनाकर चलने के कारण हमसे ज़्यादा हिंदू है। 
मैं अम्बेडकर के तमाम आंदोलनों से सहमत हूँ पर उन्होंने वर्णाश्रम मत को हिंदू धर्म का पर्याय बनाने की जो गलती कर दी वह बहुत बड़ी गलती रही। वर्णाश्रम मत है, हिंदू धर्म है। 
हिंदू एक जीवनधारा है जिसमें सब, सभी विचारों के साथ समाहित हैं। 
ब्राह्मण बनियों को इस देश समाप्त करने वाले बहुत आए, बहुत गए, आज भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से वह अपने स्थान पर बने हुए हैं। उनसे सीखिए और अपने समाज को भी आगे बढ़ाइए। 

डॉ भूपेंद्र सिंह जी
लोक संस्कृति विज्ञानी 

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