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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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ॐ
सनन्दन की गुरू -भक्ति
भाष्य रचना के साथ साथ भाष्य पाठन भी होता था। भाष्य तो सब शिष्य पढ़ते थे परन्तु सनन्दन बुद्धि सबसे विलक्षण थी । गुरू ने उन्हें तीन बार अपना शारीरिक भाष्य पढ़ाया। इसलिए आचार्य के अनन्तर सनन्दन का अद्वैतज्ञान नितरां श्लाघनीय था। ऐसे शिष्य पर गुरू की कृपा होना स्वाभाविक था । शिष्य ने अपनी गांड़ गुरू भक्ति का परिचय देकर अपनी योग्यता अच्छी तरह से अभिव्यक्त की। एक दिन की घटना है कि सनन्दन किसी कार्य के लिए अलकानन्दा के उस पार गए हुए थे। दूर पर नदी को पार करने के लिए एक पुल था । परन्तु इसे पार जाना विलम्बकारक था । आचार्य अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए थे सामने वेगवती अलकनन्दा का प्रवाह बड़े जोरों से पुकारा । सनन्दन अपने गुरु के शब्दों को पहचानते थे ही । उन्होंने समझा कि गुरु पर कोई आपत्ति आयी है । पुल से पार करने में देर लगती , अंत: उन्होंने सामने अलकान्दा में प्रवेश किया। गुरू के प्रति इस निष्कपट प्रेम भाव से प्रसन्न होकर नदी ने उन स्थानों पर कमल उगा दिए जहां सनन्दन ने अपने पैर रखे थे। शिष्य को भी इस घटना का पता नहीं चला । आचार्य के पास पहुंचाकर उन्होंने उनकी आज्ञा चाही शंकर बड़े प्रसन्न हुए और शिष्यमंडली के सामने सनन्दन की भूरि भूरि प्रशंसा की और उसी दिन से उनका नाम पद्मपाद रख दिया। आगे चलकर सनन्दन इसी नाम से सर्वत्र विख्यात हुए।
(व्यास गुफा रहकर आचार्य ने भाष्य रचना की थी , यह माधव के शंकर विजय के अनुसार है । अन्य ग्रंथो में भाष्य रचना काशी में की गयी है ऐसा वर्णन मिलता है। व्यास दर्शन के स्थान भी माधव के ग्रंथ में केदारनाथ के पास बतलाया गया है । परन्तु चिदविलास ने काशी में घटना के होने का निर्देश किया है। शंकर विजय विलास अ० १३-१४ पृष्ठ में मिलता है
व्यास गुहा में भाष्य रचना का कार्य समाप्त कर शंकर ने हिमालय के अन्य तीर्थो का दर्शन किया । क्रमशः वे केदारनाथ का त्रिकोणाकृति क्षेत्र है। बदरीनाथ की अपेक्षा यह स्थान अधिक ठंठा और निर्जन है । भगवान के केदारश्वेर इस स्थान के प्रधान देवता हैं । इसके बाद स्वार्गारोहण पर्वत है । इसी स्थान के पाण्डवों ने महाप्रस्थान किया था आचार्य की शिष्यमंडली के साथ यहां रहने लगे । परन्तु भंयकर सर्दी के कारण शिष्य लोग बैचैन हो उठे तब आचार्य ने योगदृष्टि से उस स्थान का पता लगाया जहां गर्म जल की धारा प्रवाहित होती थी इस तप्तकुंड के मिल जाने से शिष्यों को बड़ा संतोष हुआ। शंकर ने यही से गंगोत्री के दर्शन के लिए प्रस्थान किया । उतर काशी में रहते समय आचार्य कुछ उन्मनस्क से थे । उनका सोहलाहवा वर्ष बीत रहा था और ज्योतिषियों के फलानुसार उन्हें इस वर्ष मृत्युयोग की आशंका थी । परन्तु एक विचित्र घटना ने इस मृत्युयोग को नष्ट कर दिया।
व्यास दर्शन - घटना इस प्रकार हुई । दिनो आचार्य शंकर उतर काशी में विराजते थे । और अपने शिष्यों को ब्रहासूत्र भाष्य पढ़ाया करते थे । प्रातः: काल एक दिन एक कृष्णकाय ब्राह्मण वहां आकर उपस्थित हुआ और उसने शंकर ने पूछा कि तुम कौन हो और क्या पढ़ा रहे हों ॽ विद्यार्थियों ने उत्तर दिया कि ये समस्त उपनिषदों के मर्मज्ञ हमारे गुरु है , जिन्होंने द्वैतमत के निराकरण के लिए ब्रहासूत्रो के उपर अद्वैतपरक भाष्य लिखा है । इस उस ब्रह्माण ने बड़े आश्चर्य प्रगट किया और बोल उठा भला इस कलयुग में ऐसा कौन पुरूष हैं जो बादराणय व्यास के सूत्रों का मर्म भलीभांति जानता हो । मैं तो ऐसे व्यक्ति की खोज में हूं । यदि तुम्हारे गुरु ब्रह्मसूत्र के सचमुच ज्ञाता हैं तो कृपया एक सूत्र के अर्थ के विषय में मेरे हृदय में जो संदेह उत्पन्न हुआ है उसका निराकरण कर मुझे सन्तुष्ट करें । शिष्यों ने अपने गुरु से से इस आगमन की सूचना दी। शंकर ने उस तेजस्वी ब्रह्माण को देखा और अपनी नम्रता प्रगट करते हुए बोले -, मैं सूत्र जानने वाले विद्वानों को नमस्कार करता हूं । मैं इन गूढ़ सूत्रों के अर्थ जानने का अभिमान नहीं करता तथापि जो आप पूछेंगे तो मैं अपनी बुद्धि के अनुसार उसका समाधान आवश्यक करूंगा।
( स्नानुतुष्णोदकसरस्वत्र तुष्टो ददौ मुदा ।
अद्यापि तत सरस्तत्र विद्यते विष्णुसन्शधौ
सूत्र का अर्थ - अन्य देह की प्राप्ति में देह बीजभूत भूतसूक्ष्मो से परिवेष्टित होकर जीव धूमादि मार्ग द्वारा स्वार्गलोक में गमन करता है । यह स्थान और निरूपण से सिद्ध है । प्रश्न है प़चवी आहूति में जल पुरूषसंज्ञक होता है , क्या तू इस जानता है ( छा० ५/३/३) निरूपण इसे सिद्ध करता है (छा० ५/३/३)
से युक्त होकर ही दूसरी स्थान पर जाता है। इस विषय में उपनिषद का प्रमाण स्पष्ट है । छान्दोग्य उपनिषद (५/३/३) में जैवलि और गौतम के कथनोपकथन के द्वारा इसी विषय का प्रतिपादन किया गया है । प्रश्न है - पांचवी आहूति में जल को पुरूष क्यो कहते हैं ? उत्तर है आकाश पर्जन्य पृथ्वी , पुरूष तथा स्त्री रूपी पांच अग्नियों में क्रमश श्रद्धा ,सोम ,वृष्टि , अन्न तथा वीर्य रूपी पांच आहुतियां दी जाती है , और इस प्रकार जल को , अर्थात देह् के उत्पादक पंचभूतो के सूक्ष्म अवयवो के पुरूष कहते हैं । तात्पर्य यह कि जीव आकाश आदि पांच भूतो के सूक्ष्म अंशों से आवृत्त होकर ही एक देह से दूसरे देह में जाता है ।
शंकर की यह व्याख्या सुनकर उस ब्राह्मण ने सैकड़ों शंकाएं उपस्थित की और शंकर ने सैकड़ों प्रकार से उन शंकाओं का निराकरण किया । यह शास्त्रार्थ लगातार सात दिनों तक होता रहा । वह ब्राह्मण सूत्र के विषय में जितना संदेह करता , उसका खण्डन आचार्य शंकर उतनी दृढ़ता से करते जाते थे। इस तुमल शास्त्रार्थ को देखकर शिष्यमण्डली चकित हो उठी । ब्राह्मण की विलक्षण प्रतिभा देखकर पद्यापाद के हृदय में सन्देह उत्पन्न हुआ कि यह विलक्षण सम्भवतः स्वयं महर्षि वेदव्यास ही है । संशय निश्चय के रूप में परिणत हो गया , जब आचार्य की प्रार्थना पर उनकी भाष्य रचना देखी और अपने अभिप्राय को यथार्थ निरूपण करने के कारण उन्हें खुब आशीर्वाद दिया । शंकर के मृत्यु योग टालकर व्यास ने सोलह वर्ष की आयु और प्रदान की । व्यास जी ने अद्वैत तत्व के प्रचुर - प्रचार के लिए उस समय के प्रसिद्ध पण्डित कुमारिल भटू को अपने मत में लाने के लिए शंकर को कहा । तदनन्तर वे अन्तर्ध्यान हो गए ।
शंकर ने तीर्थयात्रियों के मुख से सुना कि इस समय कुमारिल प्रयाग त्रिवेणीकोट पर विराजमान हैं । अतः उनसे भेंट करने के लिए शंकर अपनी शिष्यमण्डली के साथ चल पड़े , और सम्भवतः : यमुना के किनारे होकर प्रयाग पहुंचे । उस युग के वेदमार्ग के उद्धारक तथा प्रतिष्ठापक दो महापुरुषों का अलौकिक समागम त्रिवेणी के पवित्र तट पर संपन्न हुआ ।
जय श्री कृष्ण
दीपक कुमार द्विवेदी
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