- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
कुषाण -काल
शुंगों के कतिपय शताद्बियो के पीछे कुषाणो का काल आता है इस काल में विक्रम की प्रथम तथा द्वितीय शताब्दी) प्रतिक्रिया के रूप में बौद्ध धर्म ने उन्नति करना आरम्भ किया। कानिष्क तो था जाति से शंकवंशीय , भारत के बाहर से आया हुआ व्यक्ति परन्तु, धार्मिक भावना से वह बौद्ध धर्म का असाधारण पक्षपाती तथा उदार प्रचारक था। उसने अपने समय में में आचार्य पार्श्व की अध्यक्षता में बौद्धो की चतुर्थ चतुर्थ संगीति बुलाई और भिक्षुओं को भेजकर चीन जापान में इस धर्म का विपुल प्रसार किया। इसकी प्रक्रिया कुत्तों के साम्राज्य काल में लांक्षित होती है। गुप्त नरपति परम वैष्णव थे। उनके विरूदो मैं परम भागवत की एक विशिष्ट विरूद्ध था। जिसका उल्लेख उन्होंने अपने शिलालेखों में बड़े गर्व के साथ किया पुराणों के नवीन संस्करण तथा अनेक स्मृतियों की रचना का समय यही गुप्त काल माना जाता है। गुप्त नरेश ने वैदिक धर्म की जागृति में निर्मित अश्वमेध की प्राचीन परिपाटी का पुनरुद्धार किया परंतु इस समय बौद्ध धर्म चुपचाप बैठ कर सुख की नींद नहीं सो रहा था। उसमें काफी जीवट था, उसके प्रचारकों के रंगों में धार्मिक उन्माद था, बहुत दिन विद्वानों के हृदय में अपने धर्म को फैलाने की पक्की लगन जाग रही थी। गुप्त लोगों की धार्मिक नीति सहिष्णुता थी । वह एक धर्म को कुचल कर दूसरे धर्म के उत्थान के पक्षपाती ना थे, परंतु बौद्ध धर्म के प्रचारकों के सामने ना तो भी हर पहाड़ किसी प्रकार की रुकावट डाल सकता था और ना उच्च चलता हुआ भीषण समुद्र। माधवाचार्य ने एक इस काल के का बौद्ध मत - प्रचारकों के विषय में एक बड़े पत्ते की बात कही है कि वह निसंकोच भाव के राजाओं के ऊपर अपना प्रभाव जमा लेते थे तथा उनके द्वारा प्रजा वर्ग को भी आत्मसात करने में समर्थ होते थे।
सशिष्यसंघाः प्रविशान्ती राज्ञां गेहं तदादि स्ववशे विद्यातुम् ।
राजा मदीऽजिरमस्मदहयं न तु वेदमार्गम् ।।
अर्थात बौद्वो के समुदाय तथा संघ के साथ राजाओं को अपने बस में करने के लिए उनके घर में प्रवेश करते थे और यह कोशिश करते थे कि यह राजा मेरे पक्ष का है, उसका आदर देश हम लोगों का ही है। आता है आप लोग मेन मार्ग में श्रद्धा मत रखिए।
गुप्त युग
गुप्त कथा वर्धन योग भारतीय धर्म तथा तत्वज्ञान के इतिहास में अपना विशेष महत्व रखते हैं। एश्यूम को बैटिंग तथा बौद्ध- जैन तत्वज्ञानियों का संघर्ष युग कहना उचित होगा । बौद्ध -न्याय का उदय तथा अभ्युदय इसी काल की महती विशिष्टता है । इस युग में नागार्जुन वासुबन्धु दिड़्नाग तथा धर्मकीर्ति जैसे प्रकाण्ड बौद्ध पंडितों ने बहुत धन्यवाद को जन्म दिया तथा उसकी आश्चर्यजनक उन्नति । इन लोगों ने ब्राह्मण नैयायिको के सिद्धांतों का खंडन बड़े सतर्कता के साथ। उधर अब ब्राह्मण नैयायिक फिर हाथ पर हाथ रखकर अकर्मण्य नाते प्रतियोगिता अपने ऊपर किए गए अच्छे को का उत्तर उन्होंने बड़े कौशल तथा विद्वता के साथ देकर ब्राह्मणन्याय की उन्नति की। वात्स्यायन, उद्योतकर तथा प्रशस्तपाद -एसे ही तार्किकत्रय थे जिन्होंने बौद्ध तार्किको गेम बातों का खंडन कर अपने सिद्धांतों की। इतना होने पर भी एक विशेष दिशा में ब्राह्मणों की ओर से पदार्थ की रक्षा का उद्योग नहीं हो रहा। वह था वैदिक कर्मकांड तथा ज्ञान कांड का संयुक्तिक मण्डन । इन दोनों विषयों के प्रति बौद्धो बौद्धों ने जो निंदा और अवहेलना प्रदर्शित की थी, उत्तेजित करने के निमित्त ऐसे विज्ञ वैदिक की आवश्यकता थी जो वैदिक क्रियाकलापों का उचित प्रदर्शित करता तथा वैदिक अध्यात्म शास्त्र की विशुद्वि उदघोषित करता था।
उधर जैनमतावलम्बियो की ओर से विरोध की कमी न थी । अन्याय अपने सिद्धांतों का प्रतिपादन में तथा पर -मत के खंडन में विशेष रूप से जागरूक थे समन्तभद्र तथा सिद्धसेन दिवाकर की महत्वपूर्ण रचनाओं के नेनय्या को प्रतिष्ठित शास्त्र बना दिया था । वैदिक अचार के आने कान के रिंग होने पर जैन लोग श्रुति की प्रमाणिकता नहीं मानते । स्तुति के क्रियाकलापों को पर दोहरा आक्रमण हो रहा था-एक तो बहुत की ओर से दूसरा जैनियों की ओर से। अत: वैदिक धर्म की पुनः प्रतिष्ठा के लिए बहुत तथा के स्तुति के सिद्धांतों की यथार्थता जानता को भलीभांति समझाती जाए । सऊदी के कर्मकांड में जो विरोध आपातत: दृष्टिगोचर होता था, उसका उचित परिहार किया जाय तथा यज्ञ याग की उपयोगिता तर्क की कसौटी पर कसकर विद्वानों के सामने प्रदर्शित किया जाय। इस आवश्यकता की पूर्ति दो बड़े ब्राह्मण आचार्यों ने की इस कार्य को समुचित रीति से संपादन करने का श्रेय आचार्य कुमारिल तथा आचार्य शंकर को है । भट्टाचार्य कुमारिल ने वेद का प्रामाण्य अकाट्य युक्तियों के बल पर सिद्ध किया तथा वैदिक कर्मकांड को उपादेय , विशुद्धि के लिए किया था, वही कार शंकर ने ज्ञान कांड की गरिमा के निमित्त किया। शंकर ने अवैदिको दर्शन तथा द्वैत वादियों के मतों का भली-भांति खंडन कर उपनिषदों के आध्यात्मिक अद्वैत-तत्व का प्रतिपादन बड़ी ही प्रबल युक्तियों के सहारे किया। इस प्रकार गुप्त काल से वैदिक धर्म की जाति के जो लक्षण दीख पड़ते थे , उसका पूर्ण रूप इस कुमारिल शंकर युग में अभिव्यक्त हुआ ।
वैदिक तथा बौद्ध धर्म का संघर्ष
इस प्रसङ्गः मे एक सुंदर तथ्य है जिसे कथमपि भुलाना नहीं चाहिए। वैदिक तथा बौद्ध धर्म की यह लड़ाई तलवार की लड़ाई न थी , प्रत्युत लेखनी की लड़ाई थी । दोनों पक्षों के तर्क कुशल पंडित लोग अपनी लेखनी का संचालन कर प्रतिपाक्षियों के सिद्धांतों के असारता दिखलाते थे । वात्स्यायन ने न्यायभाष्य में बौद्वचार्य वसुबन्धु के सिद्धांतों का जो खंडन किया, उसका उत्तर वादिवृषभ दिड्नाग ने प्रमाण समुच्चय में उनके न्यायमतो का खंडन करके दिया। उद्योतकर ने न्यायवार्तिका में दिड्नाग के मत की नि:सारता खूब ही विद्वता के सहारे दिखलाई उधर धर्मकीर्ति ने प्रमाणवार्तिका में नैयायिक उद्योतकर तथा मीमांसक कुमारिल के वेदानुमोदित तथ्यों की धज्जियां उड़ाकर अपने बौद्धमत का पर्याप्त प्रतिष्ठा की । तात्पर्य यह है कि यह शास्त्रीय युक्तियों का संग्राम, खंडन में निपुण लेखनी का युद्ध उभय मतावलंबियों को विशिष्ट स्वमतानुयागी नरपति को उत्तेजित कार उसके द्वारा विरुद्ध मतवालों को मार डालने का अनुचित उपयोग कभी नहीं किया। हमारे इस सिद्धांत के विरोध में यदि एक दो दृष्टान्त मिलते हो , तो इतने कमजोर हैं कि उनसे विपरीत मत की पुष्टि नहीं होती। इस समय कुमारी और शंकर के आश्रन्त परिश्रम से वैदिक मार्ग की जो प्रतिष्ठा कि वह भारत भूमि में धीरे-धीरे हटकर तिब्बत चीन जापान श्याम दूरस्थ देशों में चला गया। शंकर के पूर्व भारत में बहुत तथा जैन धर्म के साथ-साथ अनेक अधिक मतों का भी भारत में प्रचुर प्रचार था । सप्तम शताब्दी मैं जो धर्म संप्रदाय प्रचलित उनका उल्लेख महाकवि बाणभट्ट के हर्षचरित मैं किया है। वे है भागवत , कपिल जैन लोकायातिक (चार्वाक) , कणाद ,पौराणिक ,ऐश्वर, कारणिक, कारन्धमिन् (धातुवादी) , सप्ततान्तव ,( मीमांसक ?) शाब्दिक ( वैयाककरण ) , बौद्ध पाञ्ञरात्रिक के अनुयायी ) और औपनिषद् । इनमें औपनिषद् मत को छोड़कर से सब एक प्रकार से आवेदक ही थे । औपनिषद् लोग की व्याख्या संसार की असारता कहने वाली ( ब्रह्मवादी) तख्तसे की गई है संसारासारत्वकथनकुशल: ब्रह्मावादिन: ) इस प्रकार आचार्य शंकर के आविर्भाव से पहले यह पवित्र भारत भूमि नाना मतों की कीड़ा स्थली बनी हुई थी। थी जो मतस्वातन्त्र्य के प्रपंच को पकड़ कर वेद प्रतिपादित धर्म से तर मार का निर्देश देते थे ।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें