सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

सुधारवादी आंदोलन ने सनातन धर्म को अपार क्षति पहुँचाई है


हमारी सनातन संस्कृति केवल कुछ सहस्र वर्षों की नहीं, अपितु करोड़ों वर्षों पुरातन है। हमारे ऋषि-मुनियों ने जो व्यवस्था स्थापित की, वह अत्यंत विचार-विमर्श एवं गहन मंथन के उपरांत निर्धारित की गई थी। इसी कारण हमारी सभ्यता सतत् जीवंत एवं शाश्वत बनी हुई है। जब-जब इस सनातन व्यवस्था में छेड़छाड़ करने का प्रयास किया गया, तब-तब धर्म को गंभीर क्षति पहुँची है। इसी प्रकार की चर्चा वर्ण-व्यवस्था के संदर्भ में भी होती है।

वर्ण-व्यवस्था सनातन धर्म का मूलाधार है। यदि इसे समाप्त कर दिया जाए, तो संपूर्ण सनातन व्यवस्था ढह जाएगी, जिसका परिणाम समाज के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगा। कारण यह है कि वर्ण-व्यवस्था कुल-वंश परंपरा पर आधारित न होकर समाज को एकसूत्र में बाँधने वाली व्यवस्था है। वेद, उपनिषद, ब्राह्मण-ग्रंथ, मनुस्मृति, रामायण, महाभारत एवं श्रीमद्भागवद्गीता में कहीं भी यह उल्लेख नहीं मिलता कि वर्ण-व्यवस्था जन्म पर आधारित है। अपितु इन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि वर्ण-व्यवस्था गुण, कर्म एवं स्वभाव के आधार पर विभक्त है।

इस संदर्भ में श्रीमद्भागवद्गीता का प्रमाण प्रस्तुत कर रहा हूँ, क्योंकि गीता का उपदेश स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रदान किया था। उसमें भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं—


शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।१७.४२2।। 

अर्थात 
।वे कर्म कौनसे हैं यह बतलाया जाता है --, जिनके अर्थकी व्याख्या पहले की जा चुकी है वे शम और दम तथा पहले कहा हुआ शारीरिकादिभेदसे तीन प्रकारका तप? एवं पूर्वोक्त ( दो प्रकारका ) शौच? क्षान्तिक्षमा? आर्जवअन्तःकरणकी सरलता तथा ज्ञान? विज्ञान और आस्तिकता अर्थात् शास्त्रके वचनोंमें श्रद्धा विश्वास -- ये सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं अर्थात् ब्राह्मणजातिके कर्म हैं। जो बात स्वभावजन्य गुणोंसे कर्म विभक्त किये गये हैं इस वाक्यसे कही थी? वही यहाँ स्वभावजम् पदसे कही गयी है। 
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।१८.४३।।

अर्थात 
शौर्य, तेज, धृति, दाक्ष्य (दक्षता), युद्ध से पलायन न करना, दान और ईश्वर भाव (स्वामी भाव) - ये सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।। 

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।।१८.५५।। 

अर्थात कृषि? गोरक्षा और वाणिज्य -- भूमिमें हल चलानेका नाम कृषि है? गौओंकी रक्षा करनेवाला गोरक्ष है? उसका भाव गौरक्ष्य यानी पशुओंको पालना है तथा क्रयविक्रयरूप वणिक् कर्मका नाम वाणिज्य है ये तीनों वैश्यकर्म हैं अर्थात् वैश्यजातिके स्वाभाविक कर्म हैं। वैसे ही शूद्रका भी? परिचर्यात्मक अर्थात् सेवारूप कर्म? स्वाभाविक है। जातिके उद्देश्यसे कहे हुए इन कर्मोंका भलीप्रकार अनुष्ठान किये जानेपर स्वर्गकी प्राप्तिरूप स्वाभाविक फल होता है। क्योंकि अपने कर्मोंमें तत्पर हुए वर्णाश्रमावलम्बी मरकर? परलोकमें कर्मोंका फल भोगकर? बचे हुए कर्मफलके अनुसार श्रेष्ठ देश? काल? जाति? कुल? धर्म? आयु? विद्या? आचार? धन? सुख और मेधा आदिसे युक्त? जन्म ग्रहण करते हैं इत्यादि स्मृतिवचन हैं और पुराणमें भी वर्णाश्रमियोंके लिये अलगअलग लोकप्राप्तिरूप फलभेद बतलाया गया है। 

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।।१८.४१।।  

संशोधित एवं शुद्ध किया गया पाठ:

श्रीकृष्ण गीता में स्पष्ट करते हैं कि वर्ण व्यवस्था गुण, कर्म एवं स्वभाव के आधार पर विभाजित की गई है, जो समाज की सुव्यवस्थित संचालन प्रणाली हेतु निर्मित की गई थी। अनेक लेखक एवं विचारक यह प्रश्न उठाते हैं कि जब यह व्यवस्था गुण एवं कर्म के आधार पर स्थापित थी, तब समाज में अन्याय और अत्याचार क्यों उत्पन्न हुए?

इसका उत्तर अनेक ऐतिहासिक कारणों में निहित है। प्रथम कारण, महाभारत युद्ध के उपरांत भारतीय समाज जड़ अवस्था में चला गया था। इस युद्ध के कारण सभ्यता एवं संस्कृति को अपार क्षति पहुँची, जिससे प्राचीन सामाजिक संरचना को पुनः स्थापित करना अत्यंत कठिन हो गया। कलियुग के प्रभाव से समाज में विकृतियाँ उत्पन्न होने लगीं, तथा लोग शास्त्रों की व्याख्या अपने-अपने स्वार्थानुसार करने लगे। बड़े पैमाने पर धर्मग्रंथों में मिलावट आरंभ हो गई, जिससे प्राचीन व्यवस्था ध्वस्त हो गई एवं केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ शिथिल पड़ने लगी। परिणामस्वरूप, भारतवर्ष छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया।

उस संक्रमण काल में अनेक नवीन मान्यताएँ एवं अंधविश्वास प्रचलित हुए। कापालिक एवं तांत्रिक मतों का प्रभाव बढ़ा, जिसके परिणामस्वरूप सनातनी समाज में छुआछूत जैसी कुरीतियाँ पनपने लगीं। जिनके पास तत्कालीन सत्ता थी, वे अपने निजी विषयों में ही उलझे रहे। महाभारत युद्ध के दो सहस्राब्दि (2000 वर्ष) पश्चात विदेशी आक्रमणों की श्रृंखला प्रारंभ हुई, जिसने भारतीय समाज को गंभीर क्षति पहुँचाई। लगभग 2800 वर्ष पूर्व सिकंदर के आक्रमण ने भारतीय समाज को अत्यंत दुर्बल कर दिया।

कालांतर में आचार्य चाणक्य ने भारत को एकजुट कर केंद्रीकृत शासन प्रणाली विकसित की, जिससे राष्ट्र पुनः सुदृढ़ एवं अखंड हुआ। इसी कालखंड में भगवान बुद्ध का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने वर्णव्यवस्था की रूढ़ियों का विरोध किया एवं इसे अस्वीकार किया। गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनके शिष्यों ने उनके उपदेशों के आधार पर बौद्ध धर्म का विधिवत् विस्तार किया। सनातनी समाज की कुरीतियों से पीड़ित जनसमुदाय बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर इसे अपनाने लगा।

इस बीच एक महत्वपूर्ण घटना घटी—कलिंग युद्ध की भीषण हिंसा से सम्राट अशोक अत्यंत व्यथित हो गए। उनके मन में पश्चाताप की भावना जागृत हुई। इसी समय उनके दरबार में एक बौद्ध भिक्षु पधारे, जिन्होंने सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म के प्रति प्रभावित किया। सम्राट अशोक ने शस्त्र त्यागकर अहिंसा का मार्ग अपना लिया तथा बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली। चूँकि राजा का धर्म परिवर्तन प्रजा पर भी प्रभाव डालता है, अतः सम्राट अशोक के अनुकरण में विशाल जनसमुदाय बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुआ। सम्राट अशोक ने संपूर्ण भारतवर्ष सहित दक्षिण एवं पूर्वी एशिया में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु असंख्य स्तूपों एवं विहारों का निर्माण कराया, जिससे बौद्ध धर्म का प्रभाव संपूर्ण एशिया में परिलक्षित होने लगा।

सम्राट अशोक के निधन के पश्चात मौर्य साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो गया एवं बौद्ध धर्म में विकृतियाँ आने लगीं। बौद्ध धर्म अत्यधिक अहिंसा-प्रधान होने के कारण राष्ट्र की सीमाओं एवं आंतरिक सुरक्षा के प्रति उदासीनता बढ़ने लगी। अशोक के पश्चात मगध साम्राज्य अत्यंत दुर्बल हो गया। इसी साम्राज्य में सम्राट बृहद्रथ हुए, जो सामरिक विषयों पर ध्यान नहीं देते थे।

इसी काल में उनके सेनापति पुष्यमित्र शुंग को यह सूचना प्राप्त हुई कि यूनानी शासक भारत पर आक्रमण की योजना बना रहे हैं। इस समाचार से सेनानायक पुष्यमित्र शुंग अत्यंत चिंतित हो उठे। एक ओर विदेशी आक्रांता आक्रमण की तैयारी में थे, वहीं दूसरी ओर सम्राट बृहद्रथ इस संकट के प्रति पूर्णतः उदासीन थे।

पुष्यमित्र ने अपने गुप्तचरों के माध्यम से यह भी ज्ञात किया कि अनेक यूनानी सैनिक बौद्ध भिक्षुओं के वेश में बौद्ध मठों में शरण लिए हुए हैं तथा कुछ बौद्ध धर्मगुरु भी उनका सहयोग कर रहे हैं। यह सूचना प्राप्त होने पर पुष्यमित्र ने सम्राट से बौद्ध मठों की तलाशी की अनुमति माँगी, किंतु बृहद्रथ इसके लिए तैयार नहीं हुए।


फिर भी पुष्यमित्र ने अपने स्तर पर कार्यवाही की। इस कार्यवाही के दौरान पुष्यमित्र और उसके सैनिकों की मुठभेड़ मठों में छिपे शत्रुओं के सैनिकों से हुई। कई शत्रु सैनिक मृत्यु के घाट उतार दिए गए। बृहद्रथ, पुष्यमित्र की इस कार्यवाही से रुष्ट हो गया। वह पुष्यमित्र से भिड़ गया।

एक ओर शत्रु भारत विजय का कुस्वप्न लिए बढ़ रहा था और यहाँ भारतवर्ष का सम्राट अपनी सीमाओं की सुरक्षा में लगे सेनानायक से संघर्ष में लगा हुआ है। अंततः सम्राट और सेनानायक के संघर्ष में सम्राट मृत्यु को प्राप्त होता है। सेना पुष्यमित्र के प्रति अनुरक्त थी। पुष्यमित्र शुंग को राजा घोषित कर दिया गया।

राजा बनने के तुरंत बाद पुष्यमित्र शुंग ने अपंग साम्राज्य को पुनर्व्यवस्थित करने के लिए तमाम सुधार कार्य किए। उसने भारतवर्ष की सीमाओं की ओर बढ़ रहे ग्रीक आक्रांताओं को खदेड़ दिया और भारतवर्ष से ग्रीक सेना का पूरी तरह से अंत कर दिया।

इस प्रकार पुष्यमित्र शुंग ने पुनः एक नए अखंड भारत की नींव रखी। एक ऐसे अखंड भारतवर्ष की जहाँ वैदिक सनातन धर्म अपनी मूल महानता की ओर लौटने लगा। बौद्ध पंथ की ओर जा चुके हिन्दू पुनः सनातन धर्म की शरण में लौट आए।

पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में वैदिक शिक्षा अपने चरम पर पहुँच गई। उसने राष्ट्र निर्माण के तत्वों में सनातन धर्म के महत्व को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। ऐसा कहा जाता है कि पुष्यमित्र के शासनकाल में मगध साम्राज्य के लगभग सभी निवासियों तक वैदिक शिक्षा की पहुँच थी। इसी का परिणाम था कि भारतवर्ष पुनः अपनी सनातन महानता को प्राप्त करने लगा था।

मौर्य साम्राज्य के शिथिल हो जाने के कारण केंद्रीय नियंत्रण में भारी कमी आ गई, जिससे मगध साम्राज्य के कई हिस्सों में सामन्तीकरण की प्रवृत्ति प्रबल होती जा रही थी। पुष्यमित्र ने शासक बनने के बाद शासन-व्यवस्था की इस दुर्बलता को दुरुस्त करने का कार्य किया गया।

पुष्यमित्र के शासनकाल में राज्यपाल और सह-शासक नियुक्त करने की व्यवस्था प्रारम्भ हुई। शासन की सबसे सूक्ष्म इकाई के रूप में ग्रामों का विकास किया गया। इस प्रकार पुष्यमित्र ने न केवल सनातन धर्म की स्थापना की अपितु शासन पद्धति को सुव्यवस्थित करने का कार्य भी भली-भाँति किया। यही कारण था कि पुष्यमित्र का साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बरार की दक्षिणतम सीमा तक और पश्चिम में सियालकोट से लेकर पूर्व में मगध तक विस्तृत था। पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण अवश्य था, किन्तु कट्टर नहीं
एक ब्राह्मण शासक होने का यह अर्थ बिलकुल भी नहीं है कि वह शासक कट्टर है। यदि पुष्यमित्र कट्टर प्रवृत्ति का होता तब स्वयं उसकी सेना उसके विरुद्ध हो जाती, जिसका कहीं भी कोई उल्लेख नहीं है।

पुष्यमित्र शुंग के विषय में एक मार्क्सवादी इतिहासकार गार्गी चक्रवर्ती ने एजेंडा बनाया कि वह कट्टरपंथी ब्राह्मण था। यह सर्वविदित है कि वामपंथी और मार्क्सवादी भारतीय वर्ण-व्यवस्था और विशेषकर ब्राह्मणों के भयंकर विरोधी हैं। ऐसे में इनसे यह आशा नहीं की जा सकती है कि ये किसी ब्राह्मण शासक का निष्पक्ष चरित्र चित्रण करेंगे। गार्गी किस प्रकार की इतिहासकार हैं, इसका पता इस बात से चलता है कि उन्हें दिव्यावदान को आधार बनाकर पुष्यमित्र को कट्टर बताया है।

अब बात करते हैं दिव्यावदान की। दिव्यावदान का अर्थ है, दिव्य आख्यान। आख्यान को अंग्रेजी में नैरेटिव कहा जाता है। इसका तात्पर्य है कि दिव्यावदान एक नैरेटिव है, जो बौद्धों के महान चरित्र-चित्रण का एक माध्यम था।

बौद्ध पंथ में अवदान साहित्य का अर्थ ही है, किसी भी व्यक्ति का कथाओं के माध्यम से महान चरित्र-चित्रण। अब यह विचारणीय है कि यदि किसी नैरेटिव के माध्यम से बौद्धों का चरित्र-चित्रण सकारात्मक रूप में किया जाएगा तो नकारात्मक कौन होगा? निश्चित रूप से वही व्यक्ति जिसका बौद्धों के साथ संघर्ष हुआ है। वह व्यक्ति है पुष्यमित्र शुंग। नैरेटिव का अर्थ ही होता है किसी व्यक्ति या संगठन के पक्ष में अथवा विपक्ष में विचारों का निर्माण करना। पुष्यमित्र का बौद्धों के साथ संघर्ष कितना सत्य है, इस विषय में आगे चर्चा की जा रही है।

पुष्यमित्र शुंग न तो बौद्ध विरोधी था और न ही बौद्धों का हत्यारा

कल्पना कीजिए कि कोई पंथ जिसे दशकों तक शासन का भरपूर समर्थन मिलता रहा हो। जिसके अनुयायियों में एक महान साम्राज्य के शासक रहे हों। वह पंथ लगातार फल-फूल रहा हो और एक राष्ट्र के कोने-कोने में अपने अनुयायी बनाता जा रहा हो। इन सब के बीच एक ऐसा शासक आ जाए जो पंथ-परिवर्तन का विरोधी हो और ऐसे कार्यों के लिए शासन की सहायता बंद कर दे। ऐसे में उस शासक और पंथ के मध्य संघर्ष होना स्वाभाविक है। यही सत्य है पुष्यमित्र और बौद्धों के संघर्ष का।

अशोक के शासनकाल से ही बौद्धों को राज्य का समर्थन प्राप्त होता रहा और इस समर्थन की सहायता से बौद्ध पूरे भारतवर्ष में लगातार बढ़ते चले गए। बृहद्रथ के शासनकाल तक यह पंथ-परिवर्तन चलता रहा, किन्तु पुष्यमित्र शुंग के राजगद्दी में बैठने के बाद बौद्धों के इस विस्तार में अंकुश लग गया। इसी प्रतिबन्ध से बौखलाए बौद्धों और पुष्यमित्र के मध्य संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई।

पुष्यमित्र का अपराध ही यही है कि वह एक महान हिन्दू सम्राट था। उसमें भी ब्राह्मण और सबसे बड़ी बात कि वह सनातन धर्म का एक निष्ठावान अनुयायी था। अब यह आपको तय करना है कि आप किसे अपना नायक स्वीकार करते हैं। उन मुगलों को जिन्होंने हमारे मंदिर तोड़े, हमारी महिलाओं के साथ बलात्कार किया, भयंकर लूट-पाट मचाई अथवा उस पुष्यमित्र को जिसने क्षीण हो रहे धर्म को पुनर्जीवित किया। 
पुष्यमित्र शुंग के प्रयास के कारण सनातन धर्म पुनः स्थापित हो गया है फिर बौद्धो का प्रभाव समाप्त नहीं हुआ उनका प्रभाव समाज बना रहा है 
सनातन धर्म, वर्ण व्यवस्था एवं सुधारवाद: एक गहन विश्लेषण


प्राचीन समाज में वर्ण व्यवस्था एवं उसकी आधारशिला

सनातन धर्म में वर्ण व्यवस्था का आधार सृष्टि के त्रिगुणात्मक स्वरूप पर रखा गया था। यह समाज को व्यवस्थित एवं संतुलित रखने हेतु एक प्राकृतिक एवं दार्शनिक सिद्धांत था, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के गुण, कर्म एवं स्वभाव के अनुरूप उसका स्थान निर्धारित किया जाता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र—ये चार वर्ण न तो श्रेष्ठता का प्रतीक थे, न ही यह जन्म आधारित व्यवस्था थी। अपितु, यह समाज की समरसता एवं कार्य विभाजन का एक तंत्र था, जो सहस्राब्दियों तक सफलतापूर्वक कार्य करता रहा।

गुप्त काल तक इस व्यवस्था का मूल स्वरूप प्रायः अक्षुण्ण था। समाज में ज्ञान, शासन, व्यापार एवं श्रम का स्पष्ट विभाजन था, जिससे किसी भी वर्ग पर अनावश्यक बोझ नहीं पड़ता था। किंतु कालांतर में, जब हिंदू समाज बाहरी आक्रमणों एवं आंतरिक कलहों का शिकार होने लगा, तब इस व्यवस्था में विकृति आने लगी। वर्ण को जन्मगत बना दिया गया, जिससे समाज में ऊँच-नीच एवं अस्पृश्यता जैसी कुरीतियाँ जन्म लेने लगीं।


इस्लामी आक्रमणों के दौरान हिंदू समाज अत्यधिक दुर्बल हो गया था। भारत में केंद्रीकृत सत्ता के अभाव में हिंदू समाज में आत्मरक्षा की प्रवृत्ति क्षीण होने लगी। इसी काल में भक्ति आंदोलन का उदय हुआ, जिसने सनातन धर्म की रक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। किंतु इस आंदोलन के प्रभावस्वरूप हिंदू समाज में भाग्यवादी प्रवृत्ति बढ़ी एवं वर्ण व्यवस्था के स्थान पर केवल भक्ति एवं कर्मकांड को ही धर्म का आधार मान लिया गया।

इस्लामी आक्रमणकारियों ने जातीय विद्वेष का लाभ उठाया। जो जातियाँ सामाजिक अन्याय से पीड़ित थीं, वे या तो इस्लाम स्वीकार करने लगीं या फिर हिंदू धर्म के प्रति कटुता रखने लगीं। इसी काल में वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप अधिक दृढ़ हुआ, जिससे समाज में एकता समाप्त होने लगी।


अंग्रेजों ने हिंदू समाज को और अधिक विभाजित करने हेतु जातिवाद को प्रोत्साहित किया। उन्होंने ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ का प्रचार किया, जिससे हिंदू समाज में आत्महीनता की भावना उत्पन्न हुई। अंग्रेजों ने हिंदू समाज को जातियों में विभाजित कर प्रशासनिक लाभ उठाया। 19वीं शताब्दी में उन्होंने शिक्षा एवं नौकरियों में जातिगत आंकड़ों का संकलन प्रारंभ किया, जिससे समाज में जाति के आधार पर संघर्ष और गहराने लगे।

ब्रिटिश शासन के दौरान गुरुकुल प्रणाली को समाप्त कर औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली लागू की गई। इसका परिणाम यह हुआ कि हिंदू समाज अपनी पारंपरिक व्यवस्थाओं से कट गया और अधिक कानूनी एवं औपचारिक हो गया। जातीय संघर्षों को बढ़ाने के लिए अंग्रेजों ने जाति आधारित मतदाता सूची लागू की, जिससे हिंदू समाज में एकता की अंतिम आशा भी समाप्त हो गई।


19वीं एवं 20वीं शताब्दी में अनेक सुधारवादी आंदोलनों का जन्म हुआ, जिनका उद्देश्य हिंदू समाज को पुनर्जीवित करना था। किंतु इनमें से अधिकांश सुधारवादी हिंदू समाज की मूल संरचना को समझने में असमर्थ थे। उन्होंने वर्ण व्यवस्था को जाति व्यवस्था मानकर उसे नष्ट करने का प्रयास किया, किंतु इसके स्थान पर कोई नई व्यवस्था प्रस्तुत नहीं की।

महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के माध्यम से वर्ण व्यवस्था को कर्म आधारित बनाने का प्रयास किया, किंतु उनके अनुयायियों में ही इस विषय पर मतभेद उत्पन्न हो गए। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अस्पृश्यता उन्मूलन हेतु आरक्षण प्रणाली लागू करने की माँग की, किंतु उन्होंने हिंदू धर्म के भीतर रहकर सुधार करने के स्थान पर बौद्ध धर्म अपना लिया, जिससे हिंदू समाज में और अधिक विखंडन उत्पन्न हुआ।



स्वतंत्रता के उपरांत जातिवाद को समाप्त करने के प्रयासों के नाम पर ‘मंडल आयोग’ लागू किया गया, जिसने जातीय संघर्ष को और अधिक गहरा कर दिया। जातिवाद आधारित राजनीति का जन्म हुआ, जिससे हिंदू समाज में पहले से अधिक कटुता एवं विभाजन उत्पन्न हुआ।

सनातन धर्म का मूल आधार त्रिगुणात्मक सृष्टि सिद्धांत है सत् रज तम । यह गुण केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण प्रकृति में व्याप्त हैं। समाज में भी यह भेद सदैव रहता है, और इसी आधार पर वर्ण व्यवस्था को बनाई गई थी ।

परंतु सुधारवादियों ने इसे समझे बिना वर्ण व्यवस्था को समानता स्थापित करने के नाम पर समाप्त करने का प्रयास किया। इनमें से अधिकांश सुधारवादी अब्राहमिक मानसिकता से ग्रस्त थे, जिनके लिए समाज की व्यवस्थाओं को धर्मग्रंथों के अक्षरशः पालन तक सीमित कर देना ही धर्म सुधार था। उन्होंने हिंदू समाज को उसके गुण, स्वभाव एवं ऐतिहासिक संदर्भों से काटकर एक कृत्रिम, किताबी समाज में परिवर्तित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि हिंदू समाज में और अधिक विभाजन उत्पन्न हुआ, क्योंकि सुधारवाद के नाम पारंपरिक व्यवस्थाओं को नष्ट-भ्रष्ट करने का प्रयास हुआ, लेकिन उनके स्थान पर कोई व्यवहारिक विकल्प प्रस्तुत नहीं किया गया । 

आज हिंदू समाज में वर्ण व्यवस्था को समाप्त करने की माँग की जा रही है, किंतु इसके स्थान पर कोई व्यवहारिक विकल्प प्रस्तुत नहीं किया गया है। वर्तमान राष्ट्रवादी विचारक एवं संगठन भी वर्ण व्यवस्था एवं जाति व्यवस्था को समाप्त करने की बातें करते हैं, किंतु इस प्रक्रिया में वे समाज को एक नए संकट की ओर धकेल रहे हैं।

वर्ण व्यवस्था का उच्छेद अत्यंत घातक सिद्ध हो सकता है। यह सत्य है कि अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों का उन्मूलन आवश्यक है, किंतु वर्ण व्यवस्था को समाप्त करने से समाज में एक नवीन सामाजिक तंत्र की रिक्तता उत्पन्न हो जाएगी। यदि यह समाप्त हो जाती है, तो वैदिक कर्मकांड, श्राद्ध, तर्पण एवं अन्य धार्मिक विधियाँ धीरे-धीरे लुप्त हो जाएँगी। इससे समाज में आध्यात्मिक दुर्बलता आएगी एवं हिंदू धर्म धीरे-धीरे अपनी मूल पहचान खो देगा।

वर्ण व्यवस्था को समाप्त करने का प्रयास प्राचीन काल से किया जाता रहा है, किंतु यह सहस्राब्दियों तक अक्षुण्ण बनी रही है। महर्षि दयानंद सरस्वती एवं बुद्ध जैसे महापुरुषों ने भी इसे चुनौती दी, किंतु अंततः उन्हें या तो इसे स्वीकार करना पड़ा या फिर वे स्वयं हाशिए पर चले गए।

अतः, यह आवश्यक है कि हम वर्ण व्यवस्था की मूल भावना को समझें एवं इसे आधुनिक परिवेश में पुनः व्याख्यायित करें। सुधारवाद की आड़ में इसे नष्ट करने के स्थान पर, इसे आधुनिक समाज के अनुरूप परिवर्तित करना आवश्यक है। यदि हम इसे अंधाधुंध समाप्त करने का प्रयास करेंगे, तो इसका परिणाम हिंदू समाज की संपूर्ण विघटन के रूप में सामने आएगा। हमें सनातन धर्म की सनातनता को अक्षुण्ण बनाए रखना होगा, ताकि यह अनंत काल तक प्रवाहित होता रहे।


जय श्रीकृष्ण 
दीपक कुमार द्विवेदी ( बाल योगी)

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें