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जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी श्रृंगेरी यात्रा का प्रसंग भाग ८

                                     ॐ

 शंकराचार्य श्रीवलि अग्रहार में निवास करने के अन्तन्तर अपने शिष्यों के साथ श्रृगगिरी पधारे। यह वही स्थान है , जहां आज से लगभग बारह वर्ष पहले शंकर ने एक विशालकाय सर्प को अपना फन फैलाकर मेढक के बच्चों की रक्षा करते हुए देखा था , उसी पुरानी बात को उन्होंने शिष्यों से कह सुनाया । इसी स्थान पर ऋषि श्रृंग ने तपस्या की थी । स्थान इतना पवित्र था कि बहुत पहले से ही वहां मठस्थापना करने का उन्होंने संकल्प लिया था । आज उसी पुरातन संकल्प को कार्यान्वित करने का अवसर आ गया था । शिष्यों की मंडली ने आचार्य के इस प्रस्ताव का अनुमोदन किया । तदनुसार ऋषि श्रृंग के प्राचीन आश्रम में शिष्यों के अनुरोध में रहने योग्य कुटिया तैयार की गयी । शंकर ने मंदिर बनवाकर शारदा देवी की प्रतिष्ठा की लेकर आज तक अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है। श्रृंगेरी की स्थिति - यह स्थिति आजकल मैसूर रिसासत के कडूर जिले में तुंग नदीइ के बाये किनारे पर अवस्थित है । यह आज कल एक बहुत बड़ा संस्थान के द्वारा ( देव स्थान) है, जहां अद्वैत विद्या का प्रचार विशेष रूप से हो रहा है शंकराचार्य के द्वारा स्थापित आदि पीठ होने के कारण इस स्थान की महत्ता तथा गौरव विशेष है । यहां शंकराचार्य की मान्यता अत्यधिक है। मैसूर की रिसासत से इसे बड़ी भारी जगीर प्राप्त हुई है तथा वार्षिक सहयता भी दी जाती है विजयनगर के राजाओं ने इस मठ को विशेष जागीर दी थी । आचार्य शंकर ने श्रृंगेरी मठ को अपने रचनात्मक कार्य का मुख्य केंद्र बनाया उत्तरकाशी में रहकर शंकर ने अपने भाष्य ग्रन्थो की रचना कर ली थी परन्तु उसके विपुल प्रचार का अवसर उन्हें बहुत ही कम मिला था । इस स्थान पर रहते समय उन्हें इनके प्रचार का अच्छा अवसर उन्हें बहुत ही कम मिला था । इस स्थान पर रहते समय उन्हें इनके प्रचार का अच्छा अवसर मिला था । इस स्थान पर रहते समय उन्हें इनके प्रचार का अच्छा अवसर मिला। उन्होंने अपने विद्वान शिष्यों को जिनकी बुद्धि शास्त्र के रहस्य ग्रहण करने में नितान्त सूक्ष्म थी, अपने शिष्य आचार्य का बड़ा ही भक्त सेवक था । उसका नाम था गिरि वह नामित: ही गिरि न था प्रत्युत गुणत : भी गिरि था पक्का जड़ था । परन्तु था शंकर का एकमात्र भक्त ।

तोटकाचार्य की प्राप्ति - आचार्य अपने भाष्यो की व्याख्या जब विद्वान शिष्यों के सामने किया करते थे तब वह भी उसे सुना करता था। एक दिन की घटना है कि वह अपना कौपीन धोने  के लिए तुंगभद्रा के किनारे गया था । उसके आने में कुछ विलम्ब हुआ। शंकर ने उसकी प्रतीक्षा की ।
उपस्थित विद्यार्थियों को पाठ पढ़ाने में कुछ विलम्ब कर दिया । पद्यपाद आदि शिष्यों को यह बात बुरी लगी - इस मृत्पिण्डबुद्वि शिष्य के लिए गुरू जी का इतना अनुरोध कि उन्होंने उसी के लिए पाठ पढ़ाने से रोक रखा । शंकर ने यह बात अनुमान से जान  ली तथा अपनी अलौकिक शक्ति से शिष्यो में समस्त विद्याओं का संचार कर दिया । उसके मुख से अध्यात्म विषयक विशुद्ध पद्यंमयी वाणी निरर्गल रुप से निकलने लगी । इसे देखकर शिष्यों के अजरज का ठीकाना न रहा । जिसे वे वज्रमूर्ख समझकर अनादर का पात्र समझते थे वही अध्यात्म विद्या का पारगामी पण्डित निकला । शिष्य के मुख से तोटक छन्दो में वाणी निकली थी इसलिए गुरू ने इनका नाम तोटकाचार्य रख दिया । ये आचार्य  के पट्ट शिष्यों में से अन्यतम थे ज्योतिर्मठ की अध्यक्षता का भार इन्ही को सौंपा गया। 

वार्तिक की रचना - उपर कहा गया है कि श्रृंगेरी निवास के समय शंकर ने अपने भाष्यो के प्रचार प्रसार की ओर भी दृष्टि डाली । यह अभिलाषा तो बहुत दिनों से उनके हृदय में अंकरित हो उठी कि ब्रह्मसूत्र भाष्य को लोकप्रिय और बोधगम्य बनाने के लिए उनके उपर  वार्तिक तथा टीका की रचना करना नितांत आवश्यक है । भट्ट कुमारिल में भेंट करने का प्रधान उद्देश्य इसी कार्य की सिद्धि थी । परन्तु  इस विषय स्थिति में उनसे यह कार्य सिद्ध न हो सका । श्रंगेरी का शान्त वातावरण इस कार्य के लिए  नितांत अनूकूल था । सामने पवित्र तुंगा नदी कल -कल करती हुई बहती थी स्थान जन संघर्ष से नितान्त दूर था । किसी प्रकार का कोलाहल तथा संसार का दुखमय प्रपंच उस पार्वत्य प्रदेश में प्रवेश न कर सकता था । चारो तरफ घने जंगलों से प्रकृति ने उसे घेर रखा था । इसी शान्त वातावरण में वार्तिका रचना का अच्छा अवसर दीख पड़ा । शंकर ने सुरेश्वर से अपनी इच्छा प्रगट की वे ब्रहासूत्र भाष्य पर वार्तिक विखे । सुरेश्वर ने अपनी नम्रता करते हुए अपनी अयोग्यता का निवेदन किया । परन्तु गुरु अग्रह करने पर उन्होंने यह गुरूत्तर भार वहन करना स्वीकार किया परन्तु शिष्यों ने बड़ा झमेला खड़ा कर किया । आचार्य शंकर के अधिकांश शिष्य पद्यपाद के पक्षपाती थे उन्होंने आचार्य का कान भरना आरंभ किया कि यह वार्तिक रचना का कार्य सुरेश्वर से भलीभांति नहीं हो सकता । पूर्वाश्रम में वे ( सुरेश्वर ) ग्रहस्थ थे और कर्ममींमसा के अनुयायी तथा आग्रही प्रचारक थे उनका यह संस्कार अभी तक छूटा न होगा । यह शास्त्रार्थ मे आपके द्वारा जीते गये थे । अतः विवश होकर इन्होंने संन्यास ग्रहण किया  ,अपनी स्वतंत्रता और स्वेच्छा से नहीं । इस प्रकार के अनेक निन्दात्मक वचन कहकर शिष्यों ने गुरू के प्रस्ताव का अनुमोदन नहीं किया । उनकी सम्पत्ति में पद्यपाद ही इस कार्य संपन्न करने पूर्ण अधिकारी थे । 

आचार्य बड़े संकट में पड़े ग्रे । अपनी इच्छा के विरूद्ध शिष्यों की यह भावना जानकर उनके चिंत में अत्यंत क्षोभ हुआ । ये पद्यपाद की योग्यता को जानते थे तथा उनकी गाढ़ गुरू भक्ति से भी परिचित थे। उन्होंने पद्यपाद बुलाकर अपना प्रस्ताव सुनाया । परन्तु पद्यपाद 

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जिस टीका ग्रंथ में मूलग्रंथ में कहे गये , नहीं कहे अथवा बुरी तरह कहे सिद्धांतो की मीमांसा की जाती  है उसे वार्तिका कहते हैं इसमें मूल ग्रन्थो के विषयो की केवल व्याख्या ही नहीं रहती पत्युत उसके विरोधी मतो भी सांगोपांग खंडन रहता है ।

उत्कानुक्तदुरूक्तानां चिन्ता प्रवर्तते ।
तं ग्रन्थ वार्तिकं पाहु: वार्तिकज्ञा: मनीषिण: ।।


ने हस्तामलक को ही भाष्य लिखने में समर्थ बतलाया , क्योंकि उनके सामने वेदांत के समय सिद्धांत हाथ के आंवले की तरह प्रत्यक्ष थे । आचार्य शंकर पद्यपाद के इस प्रस्ताव को सुनकर मुस्कराने लगे तथा उनका पूर्व चरित सुनाकर कहा कि वे निपुण अवश्य है , वेदांत के तत्वो में उनका प्रवेश गंभीर है , परन्तु  वे सदा समहित ( समाधि में लग्न ) चित रहा करते हैं , अतः उनकी प्रवृत्ति बाह्ला कार्यो में कथमपि नहीं होती । अतः तो उन्हें इस कार्य योग्य नहीं समझता । मेरी दृष्टि में तो समस्त शास्त्रों के तत्व  जानने वाला सुरेश्वर ही इस कार्य के सर्वथा योग्य है । उनके समान कोई दूसरा नहीं दीख पड़ता । परन्तु मैं अपने अधिकांश शिष्यों के मत विरूद्ध कार्य नहीं करूंगा । जब उनका आग्रह तुम्हारे ही लिए है तब तुम मेरे भाष्य के उपर वृत्ति बनाओ वार्तिक बनाने कार्य तो स्वयं सुरेश्वर ने स्वीकार कर ही लिया है 


सुरेश्वर के द्वारा आक्षेप - खण्डन - पद्यपाद से यह कहकर आचार्य ने सुरेश्वर से भी शिष्यों के इस आक्षेप को कह सुनाया तथा उनसे स्वतंत्र ग्रंथ लिखने के लिए कहा । शिष्य ने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य कर वेदांत तत्वों का प्रतिपादक  नैष्कर्म्य सिद्वि लिखा । आचार्य ने इस ग्रंथ  को देखकर विशेष हर्ष प्रगट किया  । सुरेश्वर ने केवल ग्रंथ लिखकर ही अन्य शिष्यों के आक्षेपो को निस्सार  प्रमाणित नहीं किया प्रत्युत्त युक्तियों के बल पर भी उनकी विरूद्ध उक्तियों  का भलीभांति खण्डन कर दिया । उनका कहना था का अवश्य ही मै पूर्वाश्रम में ग्रहस्थ था परन्तु संन्यास लेने पर कौन कहता है कि मुझमें ग्रहस्थ की वही प्राचीन कर्मानुरक्ति बनी हुई है । बालापन के बाद यौवन आता है तो बाल्यकाल की चपलता यौवन काल में भी बनी रहती है ? सच तो यह है कि जो अवस्था बीत गयी वह बीत गयी । मन ही बन्धन और मोक्ष का कारण है पुरूष चरित्र निर्मल होना चाहे वह ग्रहस्थ हो अथवा सन्यासी  ।

लोगों का यह आक्षेप या दोषारोपण कि मैं संन्यास का योग्य आश्रम नहीं मानता नितांत अययार्थ है। यदि इसे मैं आश्रम  नहीं मानता तो आपके साथ शास्त्रार्थ करने के अवसर पर मैं इसे ग्रहण करने की प्रतिज्ञा क्यो करता ? यह मेरी प्रतिज्ञा इस बात की साक्षिणी कि मेरा इस आश्रम में विश्वास पूर्ण तथा अटूट है शिष्यों  का यह आक्षेप  ठीक नहीं  कि भिक्षु लोग मेरे घर नहीं आते हैं - क्योंकि मैं उनके प्रति आदर सत्कार नहीं दिखलाता । इस आक्षेप खण्डन के लिए आप स्वयं प्रमाण है  । क्या मेरे घर में आपने प्रवेश नहीं किया था ? क्या मैंने आपकी उचित अभ्यर्थना नहीं कि ? मैं सच कहता हूं कि पराजय के कारण संन्यास नहीं ग्रहण किया है, अपितु वैराग्य उदय होने से। शंकर के उपर इन वचनों का बहुत प्रभाव पड़ा  परन्तु शिष्यों आग्रह मानकर सुरेश्वर से दो उपनिषदों भाष्यो पर वार्तिका लिखने के लिए उन्होंने कहा : (१) तैत्तिरीय उपनिषद् भाष्य के उपर , क्योंकि यह ग्रंथ आचार्य की अपनी तैत्तिरीय शाखा -तैतिरीय शाखा से संबंध था और 

१ अह ग्रही नात्र विचारणीय किं ये पूर्वे मन एव हेतु । 
बन्धे च मोक्ष च मनो विशुद्वो गृही भवद्वाऽप्युत मस्करी वा ।
शं० दि०0१३/५७।

१ वृहदारण्क उपनिषद पर क्योंकि यह भाष्य सुरेश्वर की अपनी शाखा काण्व शाखा से सम्बंधित था । यही अन्तिम ग्रंथ सुरेश्वर की अनुमप सर्वेश्रेष्ठ रचना है इस प्रकार इन्होंने वार्तिकों की रचना का वार्तिकाकार का नाम सार्थक किया । 

पद्यपाद की रचना - गुरु आज्ञा पाकर पद्यपाद ने शारिरिक भाष्य के उपर टीका बनायी जिसका पूर्व भाग पंचपादिका के नाम से और उतर भाग वृति के नाम से प्रसिद्ध है । पंचपादिका ब्रहासूत्र के उपर पहली टीका है जिसमें भाष्य के गूढ़ अर्थ का प्रतिपादन किया गया है पद्यपाद  ने इसे शंकर को गुरू दक्षिणा रूप में समर्पित किया । गुरू ने अ मेंपना अत्यंत हर्ष प्रगट किया ! कहते कि इन्होंने सुरेश्वर स्पष्ट ही कहा कि इस टीका के पांच पांच ही चरण प्रसिद्ध होंगे जिनमें केवल चतु सूत्री ( ब्रह्मसूत्र के आरंभिक चार सूत्र) का टीका ही विशेष विख्यात होगी । इस प्रकार आचार्य की अध्यक्षता में ग्रंथ प्रणयन का कार्य सुचारू रूप से चलता रहा । 



जय श्री कृष्ण 
दीपक कुमार द्विवेदी 

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