सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

ज्ञान, सहजता सरलता और विस्तार देती है।

ज्ञान, सहजता सरलता और विस्तार देती है।
सूचनाओं का एकत्रीकरण अहंकार देता है।
बहुत समय से इस देश में सूचनाओं का एकत्रीकरण ही ज्ञान का पर्यायवाची बना हुआ है। इसलिए इस देश में ज्ञानी कम और अहंकारी ज़्यादा उत्पन्न हुए हैं। 
शास्त्र, शास्त्रार्थ, प्रमाण, श्लोक, संदर्भ, प्रसंग, ये सब चोचले यह दिखाने के लिए ही पाले जाते हैं की मेरे पास सूचनाओं का एकत्रीकरण तुमसे ज़्यादा है। 
अहंकार से भरे ये लोग सहजता, सरलता, विस्तार, एकात्मकता, प्रेम, लगाव और इन सबका समुच्चय समदर्शिता के दर्शन से कोसो दूर बैठे गप्प पर गप्प हांक रहे हैं और सुदूर जंगल में एक कोलनी, एक भीलनी पेड़ को एक लोटा जल चढ़ाकर शुद्ध भाव का हिंदुत्व जी रही है। 
जिसने कभी वेद, लबेद, पुराण, उपनिषद, दर्शन का नाम भी नहीं सुना, जिन्हें नहीं मालूम की वैष्णव, शैव, तंत्र, शाक्त क्या होते हैं वह भी बिना किसी अहम भाव के प्रकृति से तादात्म्य बनाकर पूर्ण भाव के हिंदू हैं। 
इधर किताब, उद्धरण, संस्कृत, परम्परा, व्याकरण के नाम पर अपने अपने अहंकार की लड़ाई में मदमस्त संत कहे जाने वाले हिंदुओं की ठेकेदारी लेने के लिए पागल बने हुए हैं। 
कुछ कथावाचक लोग आदिवासी क्षेत्रों में कथा करने जा रहे हैं, आप इस भाव से मत जाइए की आप उनको हिंदुत्व सिखाने जा रहे हैं, आप हालचाल लेने के भाव से जाइए। उनसे भी सीख कर आइए। कुछ वह कहें, कुछ आप कहें। जो उन्होंने कहा वह बाक़ी लोगों को भी सुनाएँ। 
हिंदू धर्म को परिभाषित करने की ज़िद, बाधने की जिद, ठेकेदारी की जिद अनुचित बात है। सबको उनके हिस्से का श्रेय दीजिए। यह किसी जाति विशेष, नस्ल विशेष की ठेकेदारी नहीं है।
एक संथाल समुदाय की माता आज राष्ट्रपति हैं। बाबा जगन्नाथ के लिए सड़क पर लेट गयीं। कितने और जाति के राष्ट्रपति बने होंगे, क्या उन्होंने इस स्तर की श्रद्धा दिखाई?
कभी नहीं दिखाई। आप श्रद्धा की ठेकेदारी मत करिए।
अभी एक मंदिर की तस्वीर लोग साँझा कर रहे है जिसमें सूर्य की रोशनी सीधे विग्रह पर गिर रही है। लेख लिखने वाले ने लिख दिया यह है हमारे ब्राह्मणों का विज्ञान।
क्या वाक़ई यह लिखना उचित है??
अगर वह मंदिर वर्ण व्यवस्था के अनुसार बना मान लें, तो किसी क्षत्रिय राजा ने बनवाया होगा, वैश्यों के टैक्स से, शूद्रों के परिश्रम और विज्ञान से, मंदिर बना होगा तो उसकी परम्परा की जिम्मेदारी ब्राह्मणों के पास आयी होगी। सबके सहयोग से बना, और उस रोशनी के विज्ञान का श्रेय देना है तो फिर शूद्र शिल्पियों के अतिरिक्त किसके पास जाएगा?
लेकिन श्रेय की यह जिद की हमारे अतिरिक्त कोई नहीं। यह अनुचित है। सबका यह धर्म है। सबने मिलकर पोषित किया है। सबने इसके लिए क़ीमत दी है। 
हाँ, बहुतों से तो विदेशियों को छोड़िये, अपने ही लोगों ने हिंदू होने की क़ीमत वसूली फिर भी वो बने हुए हैं अडिग। 
वह बहुत धमकी देते हैं तो बौद्ध मत का देते हैं वह भी हिंदू धर्म का ही हिस्सा है। किसी भी तरह से हिंदू धर्म के बाहर बौद्ध मत नहीं जा सकता। जो परसों वर्णाश्रम मत के थे वहीं कल बौद्ध थे, जो कल बौद्ध थे वहीं आज वर्णाश्रम मत में हैं। हिंदू धर्म को कभी नहीं छोड़ा। उनका श्रद्धा स्थान सदैव भारत बना रहा। 
यदि आप वास्तव में धार्मिक बनने का दावा करते हैं, ज्ञानी होने का दावा करते हैं, हिंदू होने का दावा करते हैं, तो आपको अपना मैं छोड़ना होगा, अपने आपको विस्तृत करना होगा, अपनी प्रथम एवं आख़िरी पहचान हिंदू बनानी पड़ेगी। आपको ख़ुद को सबके बराबर में स्वीकारना होगा, सबको धर्म का स्टेकहोल्डर समझना होगा, सबके जीवनयात्रा को इस धर्म की यात्रा में स्वीकारना होगा। 
हिंदू धर्म को किताब, मत, जाति, क्षेत्र, भाषा से अलग करिए। इसे भारत भूमि से उत्पन्न सभी मतों का समुच्चय स्वीकार करिए। अपने मत को मानते हुए सबके मत को उसके मत के अनुसार मानने देने के लिए तैयार होइए। 
इस भाव का हिंदुत्व ही हमें एकीकृत करके मज़बूत राष्ट्र बनाने में मदद करेगा। 
उससे बढ़कर समदर्शी बनना होगा और यह स्वीकार करना होगा की सभी हिंदू जन्म से एक हिंदू के रूप में बराबर हैं, न कोई छोटा, न कोई बड़ा।

डॉ भूपेन्द्र सिंह
लोकसंस्कृति विज्ञानी 

टिप्पणियाँ