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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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एक और का मत है: Raksha Bandhan symbolizes the traditional gender-defined role of the male as the protector of women, where women are seen as passive recipients of their destiny, and thus represent a regressive tradition of venerating the patriarchal masculine tradition. (रक्षाबंधन पुरुष की उस पारंपरिक, लिंग-आधारित भूमिका का प्रतीक है जिसमें उसे महिलाओं का रक्षक समझा जाता है।इसमें महिलाओं को अपने भाग्य की निष्क्रिय स्वीकारकर्ता के रूप में देखा जाता है। इसलिए आलोचनात्मक नज़र से यह परंपरा पितृसत्तात्मक पुरुषत्व के महिमामंडन तथा एक प्रतिगामी सामाजिक सोच का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होती है।)
रक्षा को अधीनता के अर्थ में लेना और उसे रक्षित की निष्क्रियता के अर्थ में लेने का वाम-वितंडा मुझे यह भी समझाता है कि क्यों ये लोग हमारी रक्षा-व्यवस्था में लगे लोगों चाहे वो आर्मी हो, पैरामिलिट्री फोर्स हो या पुलिस को लगातार गालियाँ देते रहते हैं?
रक्षाबंधन हमारी सामाजिक रक्षा-संरचना है जैसे सेनाएँ हमारी राष्ट्रीय रक्षा-संरचना।
और हम इस बात के लिए क्षमा-प्रार्थी क्यों हों कि हमें रक्षा का दायित्व एक पर्व की तरह स्मरण कराया जा रहा है।
खासकर तब जब हमारा ऐतिहासिक अनुभव यह रहा कि शत्रु ने हमारी स्त्रियों को अपना विशेष निशाना बनाया। न हम जौहर भूले, न 1886 का ब्रिटिश कैंटोनमेंट का आदेश, न 1947 का बँटवारा, न बांग्लादेश के बलात्कार और न कश्मीर की गिरिजा टिक्कू।
आप हमें ग़ाफिल करना ही क्यों चाहते हो? ताकि आक्रमणकारी की राह आसान हो जाये?
रक्षा बचाना है और बचाना अधीनता नहीं होता, अधीनता से प्रोटेक्ट करना होता है।
रक्षा को अधीनता के अर्थ में लेने के कारण ही आज मनुस्मृति के पाँचवें अध्याय के श्लोक १४७-१४८ को भारतीय बौद्धिक इतिहास के सबसे अधिक उद्धृत, सबसे अधिक विवादित और सम्भवतः सबसे अधिक अपपाठित (misread) वचनों में से एक बना दिया गया है
"पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थाविरे पुत्राः न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥" (मनुस्मृति ९.३, समानान्तर पाठ ५.१४७-१४८)
आधुनिक लोकप्रिय विमर्श में इस श्लोक को प्रायः स्त्री की दासता, उसकी बौद्धिक-नैतिक अपात्रता और पितृसत्तात्मक बन्धन के प्रमाण-वाक्य के रूप में उद्धृत किया जाता है। यह निबन्ध इस लोकप्रिय पाठ को चुनौती नहीं देता कि उसमें कोई आधार नहीं — बल्कि यह प्रश्न उठाता है कि क्या यह पाठ धर्मशास्त्रीय पद्धति, शब्द-व्युत्पत्ति, प्रासंगिक अवधारणाओं और मनुस्मृति के आन्तरिक सन्दर्भ-जाल के अनुरूप है, अथवा वह एक निश्चित हर्मेन्यूटिक (व्याख्या-पद्धति) की उपज है जो उन्नीसवीं शताब्दी के औपनिवेशिक और सुधारवादी विमर्श में गढ़ी गई।
हम Independence के अर्थ के लिए भी In
dependence क्यों रहेंगे?
हम अपने श्लोकों को अपनी परंपरा के भीतर से — मेधातिथि, कुल्लूकभट्ट, गोविन्दराज जैसे भाष्यकारों की दृष्टि से — पढ़ेंगे न कि उन मूर्खों के हिसाब से जिन्हें यही नहीं पता कि शब्द संस्कृति का वाहक होता है। संस्कृत भाषा-मीमांसा की पहली शर्त ही यह है कि किसी शब्द का अर्थ उसके आधुनिक भाषा-प्रतिरूप (cognate) से नहीं, अपितु शास्त्रीय प्रयोग-परम्परा से निर्धारित हो। 'स्वातन्त्र्य' शब्द 'स्व' + 'तन्त्र' से निष्पन्न है — 'तन्त्र' का मूल अर्थ है व्यवस्था, ताना-बाना, संचालन-प्रणाली (जैसे 'तन्त्र' शब्द राजतन्त्र, यन्त्र-तन्त्र आदि में प्रयुक्त होता है)। अतः 'स्वतन्त्र' का शाब्दिक अर्थ है — जिसका अपना संचालन-तन्त्र स्वयं में हो, जो किसी अन्य व्यवस्था-तन्त्र पर निर्भर न हो।
आधुनिक अंग्रेज़ी के "independence" या "freedom" शब्द का जो राजनैतिक-वैयक्तिकतावादी (individualist) अर्थ-वलय बीसवीं शताब्दी के मानवाधिकार-विमर्श और उन्नीसवीं शताब्दी के उदारवादी (liberal) राजनैतिक दर्शन से निर्मित हुआ है, उसे यथावत् 'स्वातन्त्र्य' शब्द पर आरोपित करना कालविपर्यय (anachronism) है। धर्मशास्त्रीय वाङ्मय में 'स्वातन्त्र्य' का प्रयोग प्रायः दो अर्थों में मिलता है:
१. प्रशासनिक/आर्थिक स्वायत्तता — किसी इकाई (व्यक्ति, परिवार, राज्य) का पृथक्, असम्बद्ध, पूर्णतः आत्मनिर्भर निर्णय-केन्द्र होना।
२. कर्तृत्व-भाव — यज्ञ-मीमांसा में 'स्वतन्त्र कर्ता' उस व्यक्ति को कहा जाता है जो किसी कर्म का प्रधान अधिकारी हो, चाहे वह अन्य सहायकों पर निर्भर ही क्यों न हो।
मेधातिथि (नवीं शताब्दी, मनुस्मृति के प्राचीनतम उपलब्ध भाष्यकार) इस श्लोक की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि यहाँ 'स्वातन्त्र्य' का निषेध कर्तृत्व का निषेध नहीं, अपितु असहाय, असम्बद्ध, पारिवारिक तन्त्र से विच्छिन्न एकाकी अस्तित्व का निषेध है। उनकी दृष्टि में यह श्लोक स्त्री की बुद्धि, नैतिक क्षमता या निर्णय-शक्ति पर कोई टिप्पणी नहीं करता — यह केवल यह कहता है कि पारिवारिक-सामाजिक संरचना में स्त्री को कभी भी असंरक्षित, निराश्रित नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
त्रिविध रक्षा-सूत्र दायित्व की भाषा है, बहिष्करण की नहीं। श्लोक की सम्पूर्ण संरचना पर ध्यान दें — यह तीन जीवन-अवस्थाओं (कौमार, यौवन, स्थाविर/वार्धक्य) में तीन भिन्न पारिवारिक कर्ताओं (पिता, भर्ता, पुत्र) के कर्तव्य की उद्घोषणा है, स्त्री के किसी अधिकार-हरण की नहीं। व्याकरणिक दृष्टि से देखें तो श्लोक के तीन चरणों में क्रिया 'रक्षति' का कर्ता पुरुष है — पिता रक्षति, भर्ता रक्षति, पुत्राः रक्षन्ति। अर्थात् यह श्लोक मूलतः पुरुष के दायित्व-वाचक वाक्यों की शृंखला है, जिसका समापन-वाक्य ('न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति') उन दायित्वों का सारांश-कथन (summary statement) है, स्वतन्त्र निषेधाज्ञा नहीं।
यह पठन-भेद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यदि हम श्लोक को पुरुष-दायित्व-केन्द्रित पाठ के रूप में पढ़ें — जैसा कि इसकी वाक्य-रचना वस्तुतः संकेत करती है — तो इसका निहितार्थ यह होगा: "किसी भी स्त्री को जीवन के किसी भी चरण में असुरक्षित, निराश्रित, संरक्षणहीन नहीं छोड़ा जाना चाहिए; यह उत्तरदायित्व सम्बन्धित पुरुष-सम्बन्धियों पर बाध्यकारी है।" यह पाठ स्त्री को "अयोग्य" घोषित नहीं करता — यह पुरुष को उत्तरदायी ठहराता है।
यहाँ एक तुलनात्मक दृष्टान्त सहायक होगा। आधुनिक कल्याणकारी राज्य (welfare state) के सिद्धान्त में जब यह कहा जाता है कि "कोई भी नागरिक भूखा न सोए, राज्य का यह दायित्व है," तो इसका अर्थ यह नहीं निकाला जाता कि नागरिक भोजन प्राप्त करने में "अयोग्य" है — अपितु यह राज्य के दायित्व की उद्घोषणा है। इसी प्रकार, मनुस्मृति का यह श्लोक परिवार-तन्त्र को एक सामूहिक सुरक्षा-व्यवस्था (mutual security system) के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसमें प्रत्येक सदस्य — चाहे स्त्री हो या पुरुष — किसी न किसी रूप में अन्तर्सम्बद्ध (interdependent) है।
च धर्मशास्त्रीय दृष्टि में पुरुष भी एकाकी, असम्बद्ध 'स्वतन्त्र' अस्तित्व के रूप में परिकल्पित नहीं है। गीता का सुप्रसिद्ध वचन "योगक्षेमं वहाम्यहम्" (९.२२) इस बात का प्रतीक है कि सम्पूर्ण भारतीय चिन्तन-परम्परा में 'रक्षा' और 'निर्वाह' का सिद्धान्त केवल स्त्री तक सीमित नहीं — यह एक सार्वभौमिक पारिवारिक-सामाजिक व्यवस्था का अंग है, जिसमें ब्राह्मण गृहस्थ पर, वानप्रस्थ पुत्र पर, शिष्य गुरु पर, प्रजा राजा पर निर्भर मानी गई है।
आश्रम-व्यवस्था स्वयं इस बात की साक्षी है कि 'स्वातन्त्र्य' (पूर्ण आत्मनिर्भरता) का आदर्श पुरुष के लिए भी जीवन के केवल एक ही चरण — संन्यास — में स्वीकृत है। ब्रह्मचारी गुरु-आश्रित है, गृहस्थ परिवार और समाज के प्रति बद्ध है, वानप्रस्थ पुत्र पर निर्भर होने लगता है। यदि 'स्वातन्त्र्य' का निषेध स्त्री के लिए अपमानजनक माना जाए, तो संगति की दृष्टि से यह भी मानना होगा कि सम्पूर्ण गृहस्थाश्रमी पुरुष-समाज भी 'अस्वतन्त्र' — अर्थात् परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायी — घोषित है। अन्तर केवल इतना है कि पुरुष का यह उत्तरदायित्व-सूत्र भिन्न कर्तव्यों (यज्ञ, अध्ययन, प्रजापालन) के रूप में वर्णित है, स्त्री का त्रिविध आश्रय-सूत्र के रूप में।
यदि मनुस्मृति स्त्री को पूर्णतः अधिकारविहीन, निर्णय-शक्तिहीन प्राणी मानती, तो स्त्रीधन (स्त्री के व्यक्तिगत स्वामित्व की सम्पत्ति) की संकल्पना का औचित्य नहीं बनता।
याज्ञवल्क्यस्मृति (२.१४३-१४६) और स्वयं मनुस्मृति (९.१९४) में स्त्रीधन के छह प्रकार — अध्यग्नि (विवाहाग्नि में प्राप्त), अध्यावाहनिक (विवाह-यात्रा में प्राप्त), प्रीतिदत्त (स्नेहवश प्राप्त), भ्रातृ-मातृ-पितृदत्त आदि — गिनाए गए हैं, जिन पर स्त्री का स्वतन्त्र, अबाधित, पैतृक या वैवाहिक परिवार के हस्तक्षेप से मुक्त स्वामित्व-अधिकार मान्य किया गया है। कात्यायनस्मृति तो यहाँ तक कहती है कि पति भी बिना पत्नी की अनुमति के स्त्रीधन का उपयोग नहीं कर सकता, और यदि करे तो उसे ब्याज सहित लौटाना होगा।
यह तथ्य 'न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति' के उलटखोपड़ी पाठ के साथ प्रत्यक्ष विरोधाभास में खड़ा प्रतीत होता है — किन्तु 'संरक्षण-सूत्र' वाले पाठ के साथ पूर्णतः संगत बैठता है। स्त्रीधन की व्यवस्था दिखाती है कि धर्मशास्त्र स्त्री को आर्थिक कर्तृत्व-शक्ति से युक्त, स्वतन्त्र सम्पत्ति-अधिकार-सम्पन्न व्यक्तित्व के रूप में मान्यता देता है — केवल उसे पारिवारिक संरक्षण-तन्त्र से बाहर, असंरक्षित नहीं छोड़ता।
धर्मशास्त्रीय पद्धति का एक मूल सिद्धान्त यह है कि किसी एक स्मृति-वचन को सम्पूर्ण परम्परा से विच्छिन्न कर नहीं पढ़ा जा सकता — 'श्रुति-स्मृति-सदाचार' की समवायी दृष्टि आवश्यक है। वैदिक साहित्य में गार्गी वाचक्नवी (बृहदारण्यक उपनिषद्, जो याज्ञवल्क्य से दार्शनिक विवाद में सीधे प्रश्न करती हैं), मैत्रेयी (जो आत्मविद्या पर पति से गम्भीर दार्शनिक संवाद करती हैं), लोपामुद्रा, घोषा, अपाला जैसी ऋषिकाएँ (जिनके नाम पर स्वयं ऋग्वेद के सूक्त हैं) — ये सभी उस सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की साक्षी हैं जिसमें स्त्री का बौद्धिक-आध्यात्मिक कर्तृत्व अस्वीकृत नहीं, अपितु सम्मानित था।
महाभारत में द्रौपदी का राजसभा में प्रश्न-कौशल, कुन्ती का रणनीतिक-राजनैतिक विवेक, सावित्री की तार्किक दृढ़ता (जो स्वयं यमराज से शास्त्रार्थ कर पति का प्राण पुनः प्राप्त करती हैं) — ये सभी आख्यान इस बात के प्रमाण हैं कि यदि 'न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति' का अर्थ स्त्री की बौद्धिक-नैतिक अक्षमता होता, तो सम्पूर्ण महाकाव्य-परम्परा में स्त्री-चरित्रों को इतनी तार्किक-नैतिक प्रभुता (agency) नहीं दी जाती। सावित्री-उपाख्यान में तो स्वयं यमराज सावित्री के तर्क-कौशल से प्रसन्न होकर वर देते हैं — यह प्रसंग स्त्री-बुद्धि के प्रति परम्परा के गहन सम्मान का प्रतीक है, न कि उसके निषेध का।
मनुस्मृति के परवर्ती भाष्यकार गोविन्दराज (द्वादश शताब्दी) और कुल्लूकभट्ट (चतुर्दश शताब्दी) भी इस श्लोक की व्याख्या में मेधातिथि की दिशा का ही अनुसरण करते हैं — अन्तर केवल बल-बिन्दु (emphasis) का है। कुल्लूकभट्ट "रक्षा" शब्द पर विशेष बल देते हुए कहते हैं कि यह श्लोक पितृ-पति-पुत्र के प्रति एक 'रक्षा-यज्ञ' (protective duty as sacred obligation) की स्थापना करता है — अर्थात् स्त्री की रक्षा को धार्मिक कर्तव्य (न कि सामाजिक विशेषाधिकार) के स्तर पर प्रतिष्ठित करता है। यदि रक्षा न करने को अधर्म कहा गया है, तो यह श्लोक वस्तुतः स्त्री-अधिकार-रक्षा का एक प्राचीन प्रारूप (ancient prototype of a protective-rights framework) कहा जा सकता है, चाहे उसकी भाषा-शैली आधुनिक अधिकार-विमर्श से भिन्न हो।
अब हम क्यों सर विलियम जोन्स के १७९४ में प्रकाशित मनुस्मृति के अंग्रेज़ी अनुवाद ("Institutes of Hindu Law") — "a woman must never be independent" को मानें जो मूल श्लोक की सूक्ष्म वाक्य-रचना (पुरुष-दायित्व-केन्द्रित त्रिपदी) को पूर्णतः विलुप्त कर एक सरल, स्वतन्त्र निषेधाज्ञा में परिवर्तित कर देता है।
क्या यह अनुवाद-पद्धति संयोगवश थी? ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रशासनिक तन्त्र को हिन्दू विधि-व्यवस्था को संहिताबद्ध (codify) करने के लिए एक ऐसे ग्रन्थ की आवश्यकता थी जो अंग्रेज़ी कॉमन लॉ की श्रेणियों में अनूदित हो सके — और इस प्रक्रिया में संस्कृत की बहुअर्थी, प्रासंगिक (contextual), भाष्य-सापेक्ष भाषा को एक-अर्थी, निरपेक्ष, संहिताबद्ध विधि-वाक्यों में संकुचित किया गया। जेम्स मिल के "History of British India" (१८१७) में इस अनूदित श्लोक का उपयोग हिन्दू समाज को "बर्बर", "स्त्री-विरोधी" सिद्ध करने तथा इस प्रकार औपनिवेशिक शासन को सभ्यताकारी (civilizing) मिशन के रूप में न्यायोचित ठहराने के तर्क-जाल में किया गया।
यह ऐतिहासिक तथ्य हमें एक कार्यविधिक निष्कर्ष तक पहुँचाता है: जब हम आज इस श्लोक की भर्त्सना करते हैं, तो प्रायः हम मूल संस्कृत श्लोक की नहीं, अपितु उसके एक विशिष्ट, राजनैतिक रूप से प्रेरित, औपनिवेशिक अनुवाद की भर्त्सना कर रहे होते हैं — जो स्वयं भारतीय भाष्य-परम्परा (मेधातिथि, कुल्लूक, गोविन्दराज) से विच्छिन्न होकर रचा गया।
यह श्लोक-विवाद तभी उचित सन्दर्भ में समझा जा सकता है जब इसे समकालीन विश्व-सभ्यताओं की विधिक स्थिति के साथ तुलना में देखा जाए। रोमन विधि में 'पेट्रिआ पोटेस्तास' (patria potestas) के अन्तर्गत स्त्री सम्पूर्ण जीवन पितृ अथवा पति के 'मानुस' (manus) के अधीन रहती थी, उसे स्वतन्त्र सम्पत्ति-स्वामित्व का अधिकार प्रायः नहीं था। प्राचीन एथेन्स में स्त्री को विधिक व्यक्तित्व (legal personhood) ही प्राप्त नहीं था — प्रत्येक स्त्री को आजीवन एक 'क्यूरियोस' (kyrios, संरक्षक पुरुष) के अधीन माना जाता था, चाहे वह पिता हो, पति हो या पुत्र।
भारत पितृपक्ष का देश है, पितृसत्ता का नहीं।
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