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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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मेरठ के उत्तर पूर्व गढ़ मुक्तेश्वर में दत्ता जी शिंदे की छावनी लगी थी । भावुक मराठों के लिए गढ़ आना ही के पर्व जैसा ही था । दत्ता जी का लक्ष्य गंगा पार जाना था पर ये दक्खन की नदियों को पार करने जितना आसान नहीं था । इसके लिए पुल चाहिए था और पुल बनाने में दुश्मन रोहिला नजीब और उसके लोग ही पारंगत थे । दत्ता जी चाहते तो थे कि नजीब पुल बनवा दे पर नजीब बहुत शातिर था । उसे पता था कि पुल उसकी रियासत के लिए बर्बादी लेकर आएगा । इसीलिए वो न नुकुर में देरी कर रहा था ।
जनकोजीबाबा किसी भी हालत में नजीब से दोस्ती करना नहीं चाहते थे। दगाबाज से दोस्ती करना ही क्यों? दो पल की देरी हो गयी थी वरना शामली में ही उन्होंने नजीब के तीन तेरह, नौ बारह बजा दिये होते । दत्ताजी को भी उस षड्यन्त्र का पता चल गया था। उन्होंने सबको आड़े हाथों लिया। उसके बाद तो नजीब मसलत के लिए आने को तैयार ही नहीं हो रहा था। तब दत्ताजी ने एक नयी चाल चली। एक दिन एक ही क्षण उन्होंने सभी प्रमुख एवं खासमखास सरदारों को छावनी से बाहर भेज दिया।
मराठा सेना चार दिशाओं में झूमती निकल पड़ी। राह में आये हर गाँव में मराठा सैनिक टिड्डी दल के समान घुसे। अन्तर्वेद के गाँव उध्वस्त होने लगे, आग की लपटों और धुएँ से जंगल भर गये। एक दिन में तेरह सौ गाँव बेचिराग हो गये। मराठों के इस जहरी आक्रमण से नजीब के छक्के छूट गये। उनके साथ सुलह करने के अलावा कोई चारा उसके पास नहीं रहा। नजीब एक महीने में पुल बनाकर देने को तैयार हो गया।
मराठों ने नजीब से तीर्थस्थान हरिद्वार और ज्वालापुर की भी मांग की तो नजीब तैयार हो गया और कहने लगा कि पहले आप गंगा पार तो हो जाए मै दोनों शहर आपको दे दूंगा।
शुक्रताल मुजफ्फरनगर के पास पुल बनने लगा और मराठा सेना इंतजार करने लगी । इसी बीच करनाल के पास रुकी एक मराठा टोली ने नजीब की एक चिट्ठी पकड़ ली जिसमें नजीब का दुर्रानी को निमंत्रण था जो वो लगातार महीनों से भेज रहा था ।
चिट्ठी पाने के बाद छावनी सुलग उठी और शुक्रताल की तरफ कूच शुरू हो गया । शुक्रताल में पुल पूरी तरीके से रोहिल्लो के ही कब्जे में था और उन्होंने जगह जगह खंदक बनाकर पूरी तैयारी कर रखी थी । दत्ताजी नजीब से प्रतिशोध लेने के लिए अधीर हो गये थे। किन्तु शुक्रताल की चारों ओर रेती में तोपें लगाना, बारूद बिछाना, टेढ़ी खीर थी। तभी दिल्ली से जिवाजीराव शिन्दे तथा उनके पुत्र हणमन्तराव शिन्दे के नेतृत्व में दो हजार ताजा दम वाले घुड़सवारों की कुमक आ पहुँची।
एक दिन प्रातः युद्ध के इरादे से तो नहीं, किन्तु टोह लेने दो-तीन हजार मराठा सवार गंगा किनारे रपट करने निकले थे। जानराव वाबले, नारो जिवाजी भोइटे शंकर, जिवाजी शिन्दे, थे। दोपहर की और दत्ताजी शिन्दे आदि अनुभवी लोग भी उनके साथ में सभी लोग शुक्रताल के आस-पास आ गये। मराठों की गतिविधियाँ इतनी नजदीकी होती देखकर नजीब के सैनिकों ने शोर मचाया। नजीब ने तुरन्त आस-पास की सभी तोपों को तैयार रहने का आदेश दिया। झाड़ी के बाहर से दिखाई देनेवाले एक रोहिले को मराठी सेना के रावत ने अचूक निशाना साधकर ढेर कर दिया। इस पर यकायक झड़पें प्रारम्भ हो गयीं। झाड़ी में छिपीं रोहिलों की तोपें आग उगलने लगीं। मराठे सैनिक भूने जाने लगे। इस अचानक हमले से मराठे कुछ समय के लिए तो सहम-से गये। किन्तु दूसरे ही क्षण वे अपने-अपने घोड़ों से नीचे कूदे और घोड़ों की आड़ से गोली का जवाब गोली से देने लगे। रोहिले बड़ी आग बरसा रहे थे। तोपों की मार से पर घोड़े गेंद की भाँति उछलकर धड़ाम से नीचे गिरने लगे। आग में अधभुने घोड़े आ सामनेवाले दोनों पैर उठाकर पिछले पाँवों पर नाचने, हिनहिनाने लगे। हिनहिनाना डरावना था और उनकी वेदनाओं को साफ जाहिर करता था। झाड़ी से सूँ-से करते आनेवाले रोहिलों के तीर मराठा वीरों को धराशायी करने लगे।
इस अचानक प्रारम्भ युद्ध के कारण दत्ताजी को भी चाव चढ़ा। रणोन्माद में उन्होंने जोश के साथ एक तरफ से उस आग में छलाँग लगायी। सामने पड़नेवाले हर तोपची की गर्दन उतारना शुरू कर दिया। अचानक युद्ध प्रारम्भ होने तथा दत्ताजी के आग में कूद पड़ने का समाचार रिसालेवाले हरकारों ने जनकोजी को दिया। जनकोजी भी 'हर हर महादेव' की रणगर्जना करते हुए तेजी से दौड़ते आये और उन्होंने भी दत्ताजी की बगल से आग में प्रवेश किया। पाँच पचास रोहिले दत्ताजी पर पिल पड़े थे। दत्ताजी की अकेली तलवार उनसे लोहा ले रही थी। उनकी सहायता के लिए आये जनकोजी ने भी रोहिलों का कत्लेआम शुरू कर दिया। गाजर मूली की तरह रोहिलों के सिर धड़ों से उतरने लगे। तभी एक रोहिले ने बीच ही में कूदकर जनकोजी के घोड़े की लगाम पकड़ ली। और दूसरे हाथ से उन पर वार किया। बार उनकी भुजा में कुछ फिसलता-सा लगा और उनके झब्बे की धज्जियाँ उड़ गयीं। बेभान जनकोजी ने अपनी विशाल तलवार उस पर ऐसे चलायी कि उस रोहिले की पता नहीं कितनी बोटी-बोटियाँ उड़कर वह ढेर हो गया।
मराठों ने रोहिलों की एक बाजू तोड़कर उनका तोपखाना शान्त कर दिया। बेभान विजयी मराठा घुड़सवार तेजी से आगे बढ़े। झाड़ी की भीतरी झुरमुट में खोद रखा खन्दक किसी को दिखाई नहीं दिया। मराठों के घोड़े अपने सवार समेत खन्दक में जा गिरने लगे। खन्दक की खाई से चीखने, कराहने की दर्दभरी आवाजें उठने लगीं। तेजी से बेभान होकर उधर लपके कोई साठ-सत्तर सवार खन्दक में गिरकर मर गये। खन्दक में घोड़ों की लाशों का तो ढेर लग गया।
उधर दूसरी ओर घुड़सवारों में घमासान छिड़ गया। जंजाली, सुतरनाली, करनाली आदि बन्दूकों के गोलों, बाणों की बौछार-सी होने लगी। दोनों पक्ष के सैनिक एक-दूसरे के रक्त के प्यासे होकर पराक्रम की पराकाष्ठा करने लगे। दत्ताजी की नीली घोड़ी सुतरनाली गोली लगकर मारी गयी। उसके गिरने से पहले ही दत्ताजी फुर्ती से उस पर से कूद पड़े। एक रावत ने उन्हें अपना घोड़ा दिया। तभी अँधेरा होने लगा। लड़ाई अपने-आप रुक गयी। घायल दत्ताजी और जनकोजी अपनी छावनी में लौट आये। नजीब के पचास रोहिले इस लड़ाई में मारे गये। अचानक शुरू हुए इस छोटे युद्ध में मराठों को भारी हानि उठानी पड़ी। तोपों की मार के चलते सैनिकों से ज्यादा घोड़े मारे गए ।
दो ही दिन पहले छावनी में ताजा कुमक लेकर पधारे तथा छावनी को उत्साह और हिम्मत दिलानेवाले सरदार जिवाजी शिन्दे और उनके पुत्र हणमन्तराव दोनों इस लड़ाई में खेत रहे थे।
नुकसान मराठों का हुआ था पर डर नजीब को लग गया । उसे लगा कि मराठे अब उसे जल्द ही खा जायेंगे । उसने दुर्रानी और अवध के नवाब के सामने फिर से गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया । मजहब की दुहाई देने लगा और उन्हें बुलाने के लिए सब कुछ करने को तैयार हो गया ।
निखिलेश शांडिल्य जी
क्रमशः
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