सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

इस्लाम ईसाईयत वामपंथ के अनूकूल औसत बुद्धि के लोग क्यों होते और हिंदू धर्म के दर्शन का सार

मैंने एक बार सुना था कि इस संसार के 99% लोग भीड़ के समान होते हैं, जिन्हें मात्र 1% लोग भेड़ों की भाँति हांकने का कार्य करते हैं। इसका कारण यह है कि ये 99% लोग सामान्य या औसत बुद्धि के होते हैं, और इन्हें नियंत्रित करना सरल होता है। इसी औसत बुद्धि का लाभ इस्लाम, ईसाई रिलिजन और मार्क्सवादी विचारधाराएँ उठाती हैं।

इस्लाम अपने औसत बुद्धि वाले अपने अनुयायियों के समक्ष काम, क्रोध, मोह और माया को अपने विस्तार के लिए सिद्धि के मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया है।

ईसाईयों ने अपने औसत बुद्धि वाले अनुयायियों के समक्ष ने अर्थ और दुःख को अपने विस्तार के लिए सिद्धि के मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया है।

मार्क्सवादी विचारधारा ने अपने औसत बुद्धि वाले अनुयायियों समक्ष मनुष्य की कमजोरियों और वासनाओं को अपने विस्तार के लिए सिद्धि के मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया है।

मनुष्य की बुद्धि इन सीमाओं से ऊपर बहुत कम उठ पाती है। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए तीन मार्गों का विधान किया था—ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग और भक्ति मार्ग।

1. ज्ञान मार्ग कुशाग्र बुद्धि गहन चिंतनशील व्यक्तियों के लिए था।

2. कर्म मार्ग सामान्य और व्यावहारिक प्रवृत्तियों वाले लोगों के लिए था।

3. भक्ति मार्ग औसत बुद्धि और सरल हृदय वाले व्यक्तियों के लिए था।

ये तीनों मार्ग एक-दूसरे के पूरक थे और सभी समान रूप से श्रेयस्कर माने गए। यही कारण है कि ज्ञान मार्ग के महान आचार्य आदि शंकराचार्य ने भक्ति मार्ग की महत्ता बताते हुए भज गोविंदम् जैसे प्रसिद्ध स्तोत्र रचे।

इसके साथ ही, हमारे मनीषियों ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार पुरुषार्थों का भी विधान किया। समाज में गुण और कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था बनाई, जो त्रिगुणात्मक सृष्टि (सत, रज और तम गुण) के सिद्धांत पर आधारित थी।

असुर प्रवृत्ति सदा तमोगुण प्रधान रही है। इसी कारण असुरों ने सृष्टि की संतुलित व्यवस्था को अस्थिर करने के प्रयास बार-बार किए।

कभी हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में।
कभी रावण, कंस और दुर्योधन के रूप में।
और आधुनिक काल में इस्लाम, ईसाई धर्म जैसे मजहबों और मार्क्सवादी विचारधारा के रूप में।

इन सबका उद्देश्य एक ही रहा है—सृष्टि की व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करना और इसे अपने स्वार्थों के अनुसार ढालना।

दुर्भाग्यवश, हम अपने मूल सिद्धांतों और परंपराओं से विमुख हो गए हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के कर्म सिद्धांत को भुला दिया।
सृष्टि के त्रिगुणात्मक स्वरूप और धर्म के चार पुरुषार्थों को समझने का प्रयास नहीं किया।
वर्ण व्यवस्था की महत्ता को पहचानने के बजाय उस पर प्रश्नचिह्न लगाने लगे।

हमारे प्राचीन सिद्धांत—साम, दाम, दंड और भेद—जो समाज और राष्ट्र संचालन के मूल आधार थे, उन्हें भी त्याग दिया। इन सिद्धांतों के बिना कोई भी शासन या व्यवस्था लंबे समय तक टिक नहीं सकती। इस उपेक्षा का परिणाम यह हुआ कि आज कोई भी हमें भेड़ों की भाँति हांक सकता है, और हम उसका अनुसरण करने लगते हैं।

बांग्लादेश के हिंदुओं पर अत्याचार के मामले में हिंदू समाज युद्ध की माँग कर रहा है। लेकिन यह समझना आवश्यक है कि वर्तमान समय में युद्ध कितना विनाशकारी हो सकता है।
आज हमारी अर्थव्यवस्था मात्र तीन ट्रिलियन डॉलर की है, और यह सेवा क्षेत्र पर आधारित है।
विनिर्माण क्षेत्र में हम बहुत पीछे हैं।
जबकि चीन की अर्थव्यवस्था 15 ट्रिलियन डॉलर और अमेरिका की 26 ट्रिलियन डॉलर है।

इस परिस्थिति में युद्ध हमारे लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। देश, राजनीति और कूटनीति केवल भावनाओं से नहीं चलती।

इस्लाम की समस्या का समाधान हिंदू समाज के पास ही है। हिंदू समाज को अपना क्षात्र धर्म पुनः स्मरण करना होगा। इस्लाम की जड़ को समाप्त करने के लिए उसके मूल सिद्धांतों को चुनौती देना और उसे नष्ट करना होगा।

यदि हमने अपनी परंपराओं और मूल्यों को संरक्षित नहीं किया, तो हमारा अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा। महाभारत एवं मनुस्मृति का महावाक्य है: "धर्मो रक्षति रक्षितः ।"
अर्थात, धर्म की रक्षा करोगे, तो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा।

दीपक कुमार द्विवेदी

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